कर्नाटक का एक मठ ऐसा भी जहाँ सत्ता के लिए राजनेता टेकते हैं माथा – डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिंनाक: 10 Apr 2018 17:57:37


कर्नाटक राज्‍य में कहने को तो यहाँ मंदिर और मठों की संख्‍या उंगलियों में गिनने में आने से भी ज्‍यादा है, लेकिन इस विविध पंथ, धर्म एवं दर्शक के प्रदेश में 30 जिलों में 600 से ज्यादा बड़े मठ हैं। जिसमें कि अत्‍यधिक मान्‍य राज्य में लिंगायत समुदाय के 400 मठ, वोकालिगा समुदाय के 150 मठ और कुरबा समुदाय के 80 से ज्यादा मठ हैं। इन सब के बीच एक मठ कर्नाटक का ऐसा भी है जहाँ लोकसभा, विधानसभा या नागरिक निकाय चुनाव ही क्‍यों न हो, हर राजनेता इस मठ में अपनी सफलता सुनिश्‍चित करने के लिए एक बार माथा टेकने जरूर जाता है। 


यह इसकी विशेषता और मान्‍यता ही कही जाएगी कि देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक सभी अब तक यहाँ माथा टेक चुके हैं। वहीं स्‍थानीय स्‍तर पर और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्‍य में सोनिया गांधी, रामकृष्ण हेगड़े, राहुल गांधी, अमित शाह, सिद्धरमैया, बीएस येड्ड‍ियूरप्‍पा, एचडी देवेगौड़ा से लेकर कुमारस्वामी तथा ऐसे ही सभी बड़े-छोटे राजनेता यहाँ नितरोज मठ में स्‍वामीजी का आशीर्वाद लेने आते हैं। येड्ड‍ियूरप्‍पा जब मुख्यमंत्री थे, तब वे हर हफ्ते मठ का दौरा करते थे और राज्‍य में समाज कार्यों को दिशा देने के लिए महंत से निर्देश लेते थे । यह मठ है कर्नाटक का सिद्धगंगा मठ जितना प्राचीन यह मठ है, उसकी परंपराएं भी आज तक उतनी ही अक्षुण हैं।  बेंगलूरु के समीप तुमकुर ज़िले में स्थित है ये ‘श्री सिद्धगंगा मठ’। 

गोसाल सिद्धेश्वर स्वामी ने की थी स्‍थापना 

इस मठ की स्थापना 12 वीं शताब्‍दी में विख्यात समाज सुधारक बसवेश्वर के समय के एक प्रसिद्ध आध्यात्मिक विद्यापीठ ‘शून्य सिंहासन’ के गोसाल सिद्धेश्वर स्वामीजी द्वारा की गई थी। यहाँ से जुड़े लोग अपने व्यावहारिक जीवन को श्री जगज्योति बसवेश्वर के सिद्धान्तों और शिक्षाओं जिसमें कि माना जाता है कि  ‘कर्म ही पूजा है’ के आधार पर जीते हैं। इस मठ की एक विशेषता यह भी है कि यह जितना प्राचीन है उतना ही अधुनातन है, जैसे कि एक ओर जहाँ शिवरात्रि का पावन पर्व बहुत उत्साह और हर्ष के साथ मनाया जाता है तो दूसरी ओर कई दशकों से यहाँ आयोजित होने वाली कृषि और औद्योगिक प्रदर्शनियों ने बहुत-से किसानों, छात्रों, उद्योगपतियों और लोगों को नवीनतम प्रौद्योगिकी के विषय में जानने और उसे सीखने में सहायता की है।

डॉ. शिवकुमार स्वामी हैं वर्तमान महन्‍त  

इस मठ के प्रमुख, श्री शिवकुमार स्वामीजी आज उस वैदिक मंत्र को भी यर्थाथ रूप देते यथावत दिखते हैं जिसमें कि 100 वर्ष आनंदमयी आयु की कामना की गई है। वास्‍तव में जब अथर्ववेद का ऋषि कहता है कि पश्येम शरदः शतम्, जीवेम शरदः शतम्, बुध्येम शरदः शतम्, रोहेम शरदः शतम्, पूषेम शरदः शतम्, भवेम शरदः शतम्, भूयेम शरदः शतम्, भूयसीः शरदः शतात्, (अथर्ववेद, काण्ड 19, सूक्त 67) तब वह हर मनुष्‍य के लिए कम से कम शतायु जीवन की कामना करता है। अर्थात् हम सौ वर्षों तक आंखों की स्पष्ट ज्योति से देखें, सौ वर्षों तक हम जीवित रहें, सौ वर्षों तक हमारी बुद्धि सक्षम बनी रहे, सौ वर्षों तक हमारी उन्नति होती रहे, सौ वर्षों तक हमें पोषण मिलता रहे, हम सौ वर्ष स्‍वस्‍थ एवं पवित्र बने रहें, कुत्सित भावनाओं से मुक्त रहें और सौ वर्षों से भी आगे ये सब कल्याणमय बातें होती रहें । 

यहाँ इस मठ के स्‍वामी आज अपनी 111 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुके हैं। 1 अप्रैल 1907 के पैदा हुए शिवकुमार स्वामी 1930 में लिंगायत साधु बने थे । उसके बाद जब वे इस मठ के प्रमुख हुए तो उन्‍होंने अपनी चली आ रही परम्‍परा का अनुसरण करते हुए अधुनातन का भी समावेशी विकास किया । उनके संरक्षण में मठ के सभी स्वामियों ने प्राचीन वैदिक शिक्षा के साथ आधुनिक शिक्षा का ज्ञान प्राप्‍त किया है। यही कारण है कि अनेक भारतीय भाषाओं के साथ विदेशी भाषाओं का ज्ञान यहाँ के संतों को है, इसीलिए ही यहां से जुड़े सभी स्‍वामी बड़े वि‍द्वान माने जाते हैं।  

ज्ञान के प्रसार के साथ सेवा ही मठ का मुख्‍य कार्य 

इतना ही नहीं तो डॉ. शिवकुमार स्वामी ने जो 52 साल पूर्व गरीब बच्चों के लिए मठ में आवासीय विद्यालय आरंभ किया था, वह वर्तमान में बढ़ते-बढ़ते 1500 से अधिक बच्‍चों को शिक्षा देने का मुख्‍य केंद्र बन गया है। यहां अध्‍ययन के लिए आने वाले किसी भी विद्यार्थी से उसकी जाति और धर्म नहीं पूछा जाता है, सभी को यहां समान रूप से प्रवेश मिलता है। इस एक गुरुकुल से समय के साथ समूचे कर्नाटक और इस राज्‍य के बाहर देशभर में कई स्‍थानों पर नए शिक्षा केंद्र भी आज खड़े हो गए हैं, यदि उनकी संख्‍या भी इससे जोड़कर देखें तो वह कई हजार में पहुंच जाती है।  यहाँ स्‍वामीजी की प्रेरणा से मठ से जुड़े भक्‍त अपना योगदान चंदे के रूप में देने के साथ ही विविध सामग्री के जरिए और आवश्‍यक तकनीकि उपकरण, सेवा कार्यों में स्‍वयं को समर्पित कर दे रहे हैं। यही कारण है कि यह मठ चहुंओर वैदिक ऋचाओं और आधुनिक शिक्षा के प्रवाह के साथ सफल मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज भी चला रहा है। 

मठ ने रखा है स्‍वयं को राजनीति से दूर

कहने को तो राज्‍य में लिंगायत समुदाय के 400 से अधिक छोटे-बड़े मठ हैं, लेकिन अन्य लिंगायत साधुओं की तुलना में ‘श्री सिद्धगंगा मठ’ और इसके प्रमुख डॉ. शिवकुमार स्वामी ने अपने को राजनीति से दूर रखा है। स्वामीजी की रुचि किसी प्रकार की पार्टी या राजनीति में नहीं है, लेकिन यह एक तथ्‍य है कि यदि समूचे कर्नाटक और राज्‍य के बाहर इनको मानने वालों के बीच किसी नेता को लेकर स्‍वामीजी का आशीर्वाद मिलने का संदेश उनके भक्‍तों तक पहुंच जाए तो उस नेता और उसकी राजनीतिक पार्टी का कर्नाटक में जीतना पक्‍का मान लिया जाता है। अभी हाल में जब लिंगायतों को धर्म आधारित अल्पसंख्यक का दर्जा देने की बात आरंभ हुई तो स्‍वामीजी ने अपने को इससे अलग रखा। हालांकि उनके कुछ शिष्य साधुओं ने सिद्धारमैया के इस कदम की तारीफ की है, परन्‍तु 800 साल पुराने इस मठ के महंत अपने शिष्‍यों की इस बात से कोई इत्तिफाक नहीं रखते हैं। शायद यही कारण है कि यह मठ और उसके स्‍वामी डॉ. शिवकुमार कर्नाटक में सबसे ज्यादा पूजे जाने वाले महंत भी हैं और कईयों के लिए  जीते-जागते चलते-फिरते भागवान भी।