डॉ. भीमराव अम्बेडकर, ब्राहम्ण और संस्कृत -रीतेश दुबे

दिंनाक: 11 Apr 2018 19:16:40


भोपाल(विसंके). भारतीय वाड्ग्मय कहता है ‘‘जन्म जायते शूद्र‘‘ अर्थात् हर व्यक्ति जन्म से शूद्र होता है एवं कर्म ओैर गुण से ही ब्राहम्ण बनता अतः हमारी संस्कृति में मनुष्य का जन्म से नहीं कर्म व गुण से महान होना बतलाया गया है। ऐसी महान विचार वाली संस्कृति पर मुगलों के आने के बाद अनके कुरीतियां हावी हुई जिनमें प्रमुख कुरीती थी जाति प्रथा कि, लेकिन समय के साथ साथ इस देश में अनेक समाज सुधारकों ने जन्म लिया जिनमें डॉ. भीमराव राम जी अम्बेडकर का नाम भी शामिल है। आम तौर पर यह माना जाता है कि डॉ. अम्बेडकर ब्राहम्ण विरोधी थे. समाज सेवक व राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के प्रचारक दत्तोपन्त बा. ठेंगडी की डॉ. अम्बेडकर पर लिखी गई पुस्तक ‘‘डॉ. अम्बेडकर और सामाजिक क्रांति की यात्रा‘‘ में ऐसे अनेक प्रसंग उल्लेखित है, जिनसे यह स्पष्ट होता है कि डा.अम्बेडकर की सफलता में अनेक ब्राहम्णों का योगदान था। डॉ. अम्बेडकर का वास्तविक उपनाम सकपाल था, लेकिन आंबवडे ग्राम के नाम से उनके कुल ने आंबवडेकर उपनाम रख लिया, डॉ. अम्बेडकर ने अपनी आत्मकथा में भी उल्लेखित किया है कि उनके विद्यालय में अम्बेडकर नाम के एक ब्राहम्ण शिक्षक थे, ये शिक्षक बाबा साहब को अपने साथ बैठाकर भोजन कराते थे। उन शिक्षक ने बाबा साहब को उपनाम अम्बेडकर दिया। जब डॉ. अम्बेडकर हाई स्कूल में थे, तब उन्हें पेंडसे नामक ब्राहम्ण शिक्षक पढाते थे, वे भी बाबा साहब से स्नेहपूर्ण व्यवहार करते थे, एक दिन वर्षा हो रही थी। बाबा साहब विद्यालय  पहुँच तब तक पूरी तरह तरबतर हो चुके थे, शिक्षक पेंडसे ने अपने बालक के साथ उन्हें घर पर भेजा और भोजन आदि की व्यवस्था की।


मुम्बई के एलफिंस्टन हाई स्कूल में एक दिन बाबासाहब को श्यामपट पर लिखने के लिए कहा गया,तब कक्षा के कुछ विधार्थीयों ने आपत्ति करने हुये कहा कि श्यामपट के पीछे भोजन के डिब्बे रखे है जो अम्बेडकर के श्यामपट के पास जाने से अपवित्र हो जायेगें, गणित के शिक्षक ने आपत्ति करने वाले विधार्थीयों से कहा कि बाबा साहब श्यामपट पर लिखेंगे आप चाहे तो अपने डिब्बे वहाँ से हटा ले। गणित के शिक्षक भी ब्राहम्ण थे। विल्सन हाई स्कूल में महार जाति के पहले मैट्रिक पास करने वाले विधार्थी के रूप में ब्राहम्ण शिक्षक कृष्णाजी अर्जुन केलुस्कर ने भीमराव का सम्मान किया था और केलुस्कर ने उनके पढने के प्रति रूचि को देखते हुये ,बुद्व पर लिखी अपनी मराठी पुस्तक आर्शीवाद स्वरूप भेंट की थी, यही से बाबा साहब के मन बुद्ध और बौद्ध धर्म की प्रति आस्था के बीज रोपित हुये।

महार सत्याग्रह के कारण चवदार ताल को ब्राहम्ण अशुद्ध हुआ, मानते थे, उस समय महार के ही प्रमुख ब्राहम्ण पीपी बापूराव जोशी बाबा साहब के प्रबल समर्थक थे,  उच्चवर्णीय हिन्दू तालाब को शुद्ध करना चाह रहे थे, परन्तु उसके पूर्व ही बापूराव जोशी ने ताल में कई ब्राहम्णों के साथ स्नान कर, बाबा साहब के सामाजिक समरसता के उद्धेश्य में नैतिक सहयोग दिया।

महाबोधि के सोसायटी के अध्यक्ष जो कि एक बंगाली ब्राहम्ण थे वे एक पत्र प्रकाशित किया करते थे। संसार भर के बौद्धों में उनका पाठक वर्ग था। लेकिन उसके संपादक ब्राहम्ण होने के कारण बाबासाहब उस पत्र में आलेख देने के लिये उत्सुक नहीं थे, लेकिन फिर उन्होनें 6500 शब्दों का एक लेख उस पत्र को भेज दिया, वह प्रसिद्ध लेख था ‘‘ दि बुद्व एण्ड दि फयूचर आफ हिज रिलिजन‘‘ । सोसायटी के अधिकृत मुखपत्र ‘महाबोधि‘ के अप्रैल मई 1950 के विशेषांक में यह लेख प्रकाशित हुआ जो मील का पत्थर बना।

हिन्दू कोड बिल के मार्गदर्शक का काम करते समय बाबासाहब के साथ विचित्र स्थिति हुई उस समय उनका साथ देने वाला कोई नहीं था। तब दो ब्राहम्ण सांसद ह्रदयनाथ कुंजरू ,और न.वि.गाडगिल ने ही उस बल के समर्थन में लोकसभा में जोरदार भाषण दिया।

संस्कृत भाषा के प्रति भी डॉ.अम्बेडकर के मन में आदर था, उन्हें संस्कृत को सीखने की बेहद आकांक्षा थी, बहुत कम लोग जानते है कि संविधान समिति में राष्ट्रभाषा व राज्य व्यवहार की अधिकृत भाषा से सम्बन्धित अनुच्छेद में संस्कृत को पर्यायी भाषा रखने का रखने के बारे में जिन्होनें संशोधन सुझााये थे, उनमें डॉ.भीमराव अम्बेडकर के साथ लक्ष्मीकांत मैत्र, टी.टी. कृष्णामाचारी, डॉ.बालकृष्ण केसकर व प्रो. नाजीरुद्दीन अहमद तथा मद्रास, त्रिपुरा, मणिपुर, प्रान्तों के सदस्य थे। डॉ.अम्बेडकर की इच्छा थी संस्कृत राष्ट्रभाषा मातृभाषा बनें, लेकिन संस्कृत भाषा के विषय में सुझाये गये संशोधन को स्वीकार नहीं किया गया। संविधान की आठवी अनुसूची में उसे मात्र एक भारतीय भाषा का स्थान दिया गया। डॉ.अम्बेडकर का संस्कृत के प्रति समर्पण इस प्रसंग से समझा जा सकता है कि जब राष्ट्रभाषा पर केन्द्रीय कक्ष में विविध समूहों में चर्चा चल रही थी, तब लोगो को यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि इस चर्चा के समय डॉ.अम्बेडकर और लक्ष्मीकांत मैत्र आपस में त्रुटिहीन संस्कृत में संभाषण कर रहे थे । डॉ. भीमराव अम्बेडकर किसी एक जाति या समाज के लिये ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानवता और भारतीयता के लिये एक आदर्श थे।