किसने कहा कि पुष्यमित्र शुंग के काल में ब्राह्मण और दलित जैसा विभाजन था -विवेक भटनागर

दिंनाक: 11 Apr 2018 18:23:18

भोपाल(विसंके). यह विभाजन मुसलमानों और अंग्रेजों की देन है। वे अपने शासनकाल के दौरान हमारी वर्ण व्यवस्था को समझ ही नहीं सके। मुस्लमानों को शेख सैयद, मुगल व पठान जैसे विशेषणों वाली जाती व्यवस्था की आदत थी और अंग्रेजों में स्टूअर्ट, बार्बू, हेनरी और जैसी उच्च जाति व्यवस्था की। ऐसे में जब भारत को कोई बंधन युक्त जाति व्यवस्था नहीं दिखी तो उन्हें कर्म के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य और शुद्र जैसी कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था समझ ही नहीं आई। उन्होंने इसे अपनी संस्कृति के अनुसार कमर्णा के स्थान पर जन्मना बना दिया। वरना हमारे शास्त्रोक्त विधान के अनुसार जन्म से हर व्यक्ति ही शूद्र है। कर्म से वह वर्ण को प्राप्त करता है। उसी के अनुसार उसका शिक्षण और उपनयन होता है। ऐसे स्वतंत्र और लोकतांत्रिक समाज को 1000 वर्ष की गुलामी ने सवर्ण और दलित में बदल दिया। 

ऐसा क्या है कि दलितों की जातियां और अल अटक (गोत्र) सवर्णों जैसी है - 

अगर दलित और सवर्ण में अपृश्यता का भाव या विभाजन होता तो दलितों को शुक्ला, सिन्हा, चैहान, राठौड़ आदि प्रकार के सवर्णों की अल अटक दलितों की जातियां को प्रयोग में नहीं लाने दी जाती।

विभाजन की जो रेखा खींची गई है, उसे तोड़ा जाए। न तो कोई सवर्ण है और न ही कोई दलित। सारा झगड़ा सत्ता और धन का है। पहले भी था, आज भी है। जब नन्दों ने देश पर शासन किया तो वे कथित रूप से दलित थे और सत्ता के शीर्ष पर काबिज हुए। इसी प्रकार बंगाल का पाल शासक भी गौड़ों की सत्ता के नष्ट होने पर सामान्य जन से निकल कर सत्ता पर काबिज हुआ। अग्नि कुल का सिद्धान्त तो स्पष्ट रूप से सामान्य जन से यौद्धा तैयार करने का है। इसको गलत ढंग से देश के सामने रख कर अंग्रेजों और कम्युनिस्टों ने विभाजन की जो रेखा खींची है, उसे अब तोड़िये। कम से कम अपने-अपनों से अलग ना हो। कानून अगर न्याय संगत हो तो सही है, लेकिन वोटों की राजनीति के लिए बनाया गया तो फिर गलत है। तुष्टीकरण से हम गृहयुद्ध की और बढ़ रहे हैं। एक और मुस्लिम आतंकवाद मुँह बायें खड़ा है और दूसरी और सवर्ण दलित के मसले में हमें विभाजित किया जा रहा है। क्या सही है यह सिर्फ हम ही बता सकते हैं। कोई और नहीं।

गाय को नहीं मारने के लिए नियम धर्म की देन है। यह पूर्ण रूप से उस वर्ण के लिए थी जो श्रम पर अपना जीवन यापन करता था। प्रथम तीन वर्ण बु​द्धिबल और द्वितीयक स्तर के श्रम में लगे थे। वहीं चौथा वर्ण शारीरिक श्रम करता था। वहीं खेतों से लगा कर बाड़ों का मालिक था। हमारे यहां पर दास प्रथा का विधान ही नहीं था। किसी अंग्रेज ने यह नहीं बताया कि आश्वलायन गृह सूत्र के अनुसार राज्य की पूंजी का सबसे बड़ा अधिकारी चौथा वर्ण ही था और वह सबसे धनी भी था। ब्राह्मण भी उसकी भिक्षा पर और क्षत्रीय उसके दिए कर पर जीवित था। फिर ऐसा क्या हुआ कि मुसलमानों और अंग्रेजों ने इसे दास बना दिया। इस पर अध्ययन करिये। न की अपनों से लड़िये।

वैसे तो अश्पृश्यता का विषय घर में ही होता था। घर के पुरूष चूंकि बाहर काम करते थे, अतः उनका चौके में प्रवेश ही वर्जित था। यह मैंने मेरी दादी के दौर में देखा है। हम भी चौके में नहीं जा सकते थे। पाखाने में जाने के वस्त्र ही अलग थे। उन्हें पहन कर शौच के लिए जाते थे और स्नान करके दूसरे वस्त्र धारण किए जाते थे। ऐसे में कर्म के अनुसार शुचिता के भी नियम बनाए गए। सभी नियम स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर बनाए गए थे, लेकिन एक साथ एक ही स्थान पर हंगने वाले अंग्रेजों और मटकों में हंगने वाले तुर्कों, मुगलों और शेखों को यह व्यवस्था कब समझ में आती। मैला ढोने की प्रथा तुर्क भारत में लेकर आए। हम तो घरों में पाखाने बनाते ही नहीं थे। शौच के लिए व्यवस्था अलग से की गई थी। यह गांव से बाहर होती थी। ऐसे में हमारे यहां पर अस्पृश्य और छुआछूत जैसे विषय भी अंग्रेजों और मुस्लमानों की देन है।

रामराज्य का मतलब समानता से है। यह समानता हमें हमारे राज्य में दण्ड का विधान दिलाता है। ऐसे में इस विधान की गलत व्याख्या कर हमें लड़ाने वालों को सिस्टम से बाहर करने की जरूरत है न कि जात पांत और सवर्ण दलित में फंसने की। वैसे तो शाब्दिक रूप से दलित शब्द ही गलत है। दलित तो अनाज और दाल हो सकती है। इंसान का दलन नहीं दमन होता है। फिर वह भले किसी वर्ण, जाति और पंथ का हो। संविधान धर्म निरपेक्ष नहीं पंथ निरपेक्ष है। हमारे यहां पर धर्म और पंथ में अन्तर है लेकिन अंग्रेजों के पास इसके लिए सिर्फ एक ही शब्द है रिलीजियन। इसलिए वह धर्म और पंथ में फर्क नहीं कर पाए और हम उसमें फंस कर रह गए। अब इससे बाहर आएं और देश को गृहयुद्ध में झोकने का कुकर्म करने से बचें।

समाचार पत्रों में यह दम नहीं कि सच को सामने रख सकें।

साभार - (वरिष्ठ पत्रकार विवेक भटनागर की वॉल से)