जाने किडनी के बारें में – अशोक बरोनिया

दिंनाक: 11 Apr 2018 17:06:26


भोपाल(विसंके). किडनी बीन के आकार वाला आर्गन है जो रीढ़ के दोनों तरफ होती है। ये आंत के नीचे और पेट के पीछे की तरफ होती है। सामान्यतः किडनी 4-5 इंच की होती है। इसका मुख्य काम खून की सफाई होता है। ये वेस्ट को दूर करती है, शरीर का फ़्लूड संबंधी संतुलन बनाने के अलावा इलेक्ट्रोलाइट्स का सही स्तर बनाए रखती है। शरीर का खून दिन में कई बार इनसे होकर गुजरता है। खून किडनी में पहुचता है, वेस्ट दूर होता है और जरूरत पड़ने पर नमक, पानी और मिनरल का स्तर एडजस्ट होता है। वेस्ट पेशाब में बदलता है और शरीर से बाहर निकल जाता है। यह भी संभव है कि किडनी अपने सिर्फ 10 फीसदी स्तर पर काम कर रही है और शरीर इसके लक्षण भी न दे। ऐसे में कई बार किडनी के गंभीर इंफ़ेक्शन और फेल होने से जुड़ी दिक्कतों के बारे में काफी देर से पता चल पाता है। हर किडनी में लाखों छोटे फिल्टर होते हैं जिन्हें “नेफ़्रोन” कहा जाता है। अगर खून का किडनी में जाना बंद हो जाता है तो उसका वह हिस्सा काम करना बंद कर सकता है। इससे किडनी फ़ेल हो सकती है। किडनी ट्रांसप्लांट उस प्रक्रिया का नाम है जिसमें एक व्यक्ति की किडनी निकाल कर दूसरे व्यक्ति के शरीर में डाली जाती है, जिसकी किडनी ने काम करना बंद कर दिया हो या खराब होने वाली है। सामान्यतः क्रोनिक किडनी डिसीज़ या किडनी फ़ेल होती है तो ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है। कई बार ऑपरेशन करने से पहले डायलिसिस किया जाता है। यह खून साफ़ करने से जुड़ी प्रक्रिया है जो ट्रांसप्लांट से पहले जरूरी होती है। लेकिन इसमें परेशानी होती है और समय लगता है। जिसे नई किडनी मिलती है, उसे निम्न सावधानियाँ बरतनी होती हैं - धूम्रपान छोड़ना जरूरी है, सेहतमंद डाइट लेना आवश्यक है, मोटे हैं तो वजन घटाना और इंफ़ेक्शन से बचाव। कौन किसे किडनी दे सकता है? जिसकी दोनों किडनी सेहतमंद हों वही अपनी एक किडनी डोनेट कर सकता है। सामान्यतः डोनर जान पहचान का होना अच्छा रहता है। किडनी स्वेच्छा से देने वाला होना चाहिए। मरीज और डोनर का ब्लड ग्रुप एक रहे तो अच्छा रहता है। डोनर का ब्लड ग्रुप ओ(o) होने पर भी यह काम करेगा क्योंकि इसे “यूनिवर्सल डोनर ब्लड ग्रुप” माना जाता है।