शम्बूक वध - एक बहुत बड़ा झूठ

दिंनाक: 17 Apr 2018 18:05:30


भोपाल(विसंके). इस पृथ्वी पर जिसे पुण्यभूमि की संज्ञा दी जा सकती है, वह देश है भारतवर्ष. यहाँ क्षमा, धैर्य, दया, शुद्धता आदि सद्वृत्तियों का निरन्तर विकास हुआ है. ये मानव जाति का कल्याण करने वाली सद्वृत्तियां हैं, यहाँ आध्यात्म और आत्मा के बारे खोज की गयी है. इस देश की संस्कृति व संस्कारों में व्यक्ति पला बढा है, इसी संस्कृति और संस्कारों से ओतप्रोत महापुरूषों महानायकों ने चारों और उसकी महक फैलायी है जिस गंध में भारतीयता निहित है, यही संस्कृति आकर्षण का केन्द्र सदियों से बनी रही है इसी ने औरों को भी अपनी तरफ खींचा है.
संविधान की धारा (1) में इस देश का नाम ‘‘इण्डिया‘‘ देट इज “भारत‘‘ लिखा है. इंडिया शब्द का उच्चारण करने से न तो आत्मा में गौरव के भाव का निर्माण हो सकता है न ही सांस्कृतिक इतिहास का बोध हो सकता है. ‘‘इंडिया‘‘ शब्द तो विदेशियों द्वारा दिया गया नाम है.

इस देश का वास्तविक नाम तो भारत वर्ष अथवा हिन्दुस्थान है. आखिर संविधान निर्माताओं ने इस पर विचार क्यों नहीं  किया ? प्रत्येक देश की अपनी पहचान होती है, उसका इतिहास होता है, उसकी संस्कृति होती है उसी के अनुकूल उसका नाम होता है. “इंडिया देट इज भारत” के स्थान पर “भारत देट इज इंडिया” भी तो रखा जा सकता था. इंडिया शब्द का उच्चारण करने से तो गुलामी के काल की दुर्भाग्य पूर्ण मनोवृत्ति ही सामने आती है. एक प्रमुख संविधान वेत्ता का कहना है कि यदि आप तीन ब्रिटिश दस्तावेजों 1935 का भारत सरकार एक्ट, 16 मई 46 का केबिनेट मिशन प्लान और 1947 में ब्रिटिश संसद द्वारा पारित भारतीय स्वाधीनता एक्ट को सामने रख लें तो पता चल जाएगा कि संविधान का तीन चौथाई भाग इन तीन दस्तावेजों से लिया गया है. भारत ने ब्रिटेन से संसदीय लोकतंत्र प्रणाली को हासिल किया है. सन् 1860 में प्रारंभ की गयी (रविवार अवकाश) छुट्टी भी अंग्रजों द्वारा प्रारंभ की गयी थी, जो आज भी अनावश्यक होते हुए भी जारी रखी गयी है. फ्रांस में हुयी क्रांति के बाद गाड के साथ तालमेल स्थापित करने के लिए इंगलैण्ड में सन् 1790 में कानून बनाकर यह अवकाश प्रारंभ किया गया था. जो बाद में हमारे देश पर भी लादा गया. अंग्रजों ने शिक्षा का प्रसार नहीं किया बल्कि पाश्चात्य ऑग्ल मूल्यों को हमारे देश पर थोपने का काम किया है. उन तमाम व्यवस्थाओं में परिवर्तन करना चाहिए जो हमारी परम्पराओं और धर्म के आधार पर न हों ताकि देश की सवा सौ करोड जनता को लाभ हो सके. सदियों से प्रत्येक छोटे बडे मांगलिक कार्यो का प्रारंभ में हम भारत के लोग ‘जमबूद्वीप आर्यावर्ते भारत खंडे कहते हुए संकल्प लेते हैं. भारत विश्व का प्राचीन राष्ट्र है. इंडिया जो भारत है पारित करवाकर तत्कालीन सत्तारूढ कॉग्रेस जनों ने अच्छा नहीं किया. एक हजार साल की पराधीनता से हमारे देश ने अपना सब कुछ खो दिया अॅग्रेजों से लडते समय सारे भारत ने भारत माता की जय का नारा लगाया था. 26 जनवरी 1950 भारत के लिए महत्वपूर्ण दिन है. इस दिन स्वतंत्र भारत का अपना संविधान लागू हुआ था. विश्व में सबसे बडे लोकतांत्रिक देश के रूप में स्थापित भारत का यह संविधान एक जीवित दस्तावेज माना जाता है. हमारा स्वतंत्रता संग्राम मानवता के मौलिक अधिकारो के आदर्शों और सद इच्छाओं को लेकर चला था. संविधान निर्माता बाबा साहब अम्बेडकर सहित संविधान सभा के समस्त सदस्यों की यही राय थी कि उनके द्वारा बनाया गया संविधान समय की मांग के अनुसार बदलता रहे ताकि इन स्वप्न दृष्टियों की परिसंकल्पनायें साकार हो सके जिन्होने भारत माता के वैभवशाली अतीत को पुनः स्थापित कर नये निर्माण की नींव रखी थी. भारत को कमजोर बनाने वाले तत्वों से मुक्त करने के लिए वर्तमान में संविधान में संशोधन की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है. वर्तमान में कतिपय आंतरिक एवं बाह्य गंभीर समस्यायें हैं जिनका समाधान संविधान में सार्थक संशोधन ही है.  बार बार चुनावों की खिचडी पकाकर एक सशक्त सरकार को प्राप्त करना कठिन होता है. इसके अभाव में वैश्विक स्तर पर मिल रही चुनौतियों से कैसे निपटा जा सकेगा. एक ठोस संप्रभु सरकार की नितांत आवश्यकता होती है. उन चुनौतियों से निपटने के लिए भारत को विश्व के सामने अपनी व्यवहार कुशलता का प्रदर्शन भी करना होता है. साथ ही कुशल राजनीतिक संस्कृति भी तैयार करनी होती है जिसका अभी कुछ वर्षों पहले तक अभाव खटकता रहा है. क्योंकि वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था पश्चिमी देशों से प्राप्त की थी. अब बदलाव अपरिहार्य हो रहे हैं. उन पर विशेष ध्यान दिये जाने की जरूरत है. एक बडा लाभ यह भी है कि पंचायत स्तर से लेकर संसद तक के चुनाव एक साथ कराने से देश के व्यर्थ खर्च हो जाने वाले रूपयों को बचाकर उनका उपयोग विकास कार्यों में किया जा सकेगा. बार बार अध्यापकों, कर्मचारियों एवं अधिकारियों को चुनाव कार्य में नहीं लगाना पडेगा अनेक प्रकार के कार्य जो चुनाव के समय बाधित हो जाते थे, वे सारे कार्य बिना बाधा के चलते रहेंगे. भारतीयता लोकतंत्र परिपवक्वता की सीढी पर आगे बढा है. सन् 1975 के दुर्भागयपूर्ण आपातकाल के दाग छोड दें तो इस लोकतंत्र ने कई नये नये कामों को सफलतापुर्वक अंजाम तक पहुंचाया है. उसी श्रृखंला में यह कार्य भी सफलता की ओर अग्रसर होगा. आज राजनैतिक विश्वसनीयता जमीन के गहरे तल पर धँसी महसूस हो रही है. लोकतंत्र सच और झूठ के बीच झूलता नजर आ रहा है. झुठ और फरेब ही हावी है, ताकत तो जनता के हाथों है यह सिर्फ कहने की बात रह गयी है. राजनीति में   झूठे, स्वार्थी और मक्कार लोग हावी है. राजनीतिक दलों में स्वयं आंतरिक लोकतंत्र का अभाव है. वंशवाद, भाई भतीजावाद, बाहुबल, धनबल, गुटबाजी इतनी हावी है कि प्रतिभा सम्पन्न और देशभक्त व्यक्ति को कही ठौर ठिकाना ही नहीं मिल पाता.

भारत के परिपेक्ष्य में पलायन, गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा स्वास्थ्य ढांचे का खोखलापन, अन्नदाता किसान द्वारा आत्महत्या, शहरी कूडा कर्कट की बढती समस्यायें कागजों पर है. समस्याये मुँह बायें खडी है. तात्कालिक समाधान के अभाव में घातक भी साबित हो सकती हैं.