20 अप्रैल/ जयंती विशेष: जानिए शंकर से शंकराचार्य बनने की कहानी, छोटी उम्र में पा लिया था महाज्ञान

दिंनाक: 20 Apr 2018 15:42:46


भोपाल(विसंके). शंकराचार्य का जन्म सन् 788 ई. में केरल के कालपी (काषल) नाम के गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम शिवगुरु और माता का नाम सुभद्रा था। शंकराचार्य के पिता भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। विवाह के बाद लंबे समय तक जब उनके यहां संतान नहीं हुई तो शिवगुरु और सुभद्रा ने शिवजी की तपस्या की। तब भगवान शिव इनके सपने में आए और वर मांगने को कहा। शिवगुरु ने भोलेभंडारी से ऐसी संतान की मांग की जो दीर्घायु और सर्वज्ञ (जिसे हर विषय का ज्ञान हो) हो, जिसकी ख्याति दूर-दूर तक फैले और युगों तक बरकरार रहे। 



इस पर भगवान शिव ने कहा यदि तुम्हारी संतान दीर्घायु होगी तो सर्वज्ञ नहीं होगी और सर्वज्ञ होगी तो दीर्घायु नहीं होगी। इस पर शिवगुरु बोले कि उन्हें सर्वज्ञ संतान चाहिए। कुछ समय बाद जब शिवगुरु के यहां पुत्र का जन्म हुआ तो उन्होंने उस बच्चे का नाम शंकर रखा। क्योंकि वह भगवान भोलेनाथ के आशीर्वाद से प्राप्त हुए थे। 

शंकर से शंकराचार्य बनने की कहानी
जब शंकर 3 वर्ष के थे तभी इनके पिता का देहांत हो गया था। बेहद प्रतिभाशाली होने के कारण शंकर 6 वर्ष की उम्र में ही प्रखांड पंडित हो गए थे। इन्होंने सभी वेदों और शास्त्रों का अध्ययन कर लिया था। मात्र 16 साल की उम्र तक ये 100 से अधिक ग्रंथों की रचना कर चुके थे। फिर ये अपनी माता से सन्यासी बनने के लिए अनुमति मांगने लगे। लेकिन माता सुभद्रा इसके लिए तैयार नहीं थी। फिर अपनी निरंतर हठ से इन्होंने माता को सन्यास के लिए मना लिया। इन्होंने पूरे भारत का भ्रमण किया और सनातन धर्म की परंपराओं को पुन: जीवित किया। सनातन धर्म के प्रचार के लिए इन्होंने 4 मठों की स्थापना की। आज भी इन मठों के गुरुओं को शंकराचार्य की उपाधि प्राप्त होती है। ये मठ या पीठ देश के इन राज्यों में स्थित हैं- ज्योतिष पीठ, बद्रीनाथ- उत्तराखंड (हिमालय में स्थित) गोवर्धन पीठ, पुरी-उड़ीसा में। शारदा पीठ, द्वारिका-गुजरात में और श्रृंगेरी पीठ, मैसूर- कर्नाटक में स्थित है। इनके ज्ञान और कार्यों के आधार पर इन्हें आचार्य कहा जाने लगा और जनमानस के बीच ये शंकर+आचार्य= शंकराचार्य के रूप में प्रसिद्ध हुए। 

आदि शंकराचार्य ने यद्यपि मात्र 32 वर्ष की आयु पाई, लेकिन इतने से जीवन काल में उन्होंने वैदिक संस्कृति की रक्षा के लिए जो प्रयास और पुरुषार्थ किए, उसकी जगत वंदना करता है। वैदिक पंरपरा को अक्षुण्ण रखने के लिए देश के चारों कोनों में चार आधार केंद्रों (बद्रीनाथ, रामेश्वरम, जगन्नाथ पुरी और द्वारिका मठ) की स्थापना की। सांस्कृतिक जागरण से लेकर राजधर्म को सही दिशा देने और अध्यात्म साधना के शिखर पर आरुढ़ होकर राष्ट्रीय एकता की स्थापना के प्रयास अनवरत चलाते हुए उन्होंने भारत भर में धर्म और अध्यात्म का जयघोष किया।

आचार्य शंकर के समय में महात्मा बुद्ध का दिव्य तत्व दर्शन अपना मूल स्वरूप खो चुका था। सीमाओं पर आक्रांताओं की ललचाई दृष्टि पड़ चुकी थी। ऐसे समय में देश की मनीषा को झकझोरते हुए उन्होंने वैदिक धर्म के प्रचार के लिए चिद्विलास, विष्णु गुप्त, हस्तामलक, समित पाणि, ज्ञानवृन्द, भानु गर्भिक, बुद्धि विरंचि, त्रोटकाचार्य, पद्मनाम, शुद्धकीर्ति, मंडन मिश्र, कृष्ण दर्शन आदि विद्वानों को संगठित किया और भारत भर में धर्म सुधार की हलचल मचा दी।