माता सीता जन्मदिवस /वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को सीता नवमी

दिंनाक: 24 Apr 2018 17:27:26


भोपाल(विसंके). वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी इस तिथि को सीता नवमी या जानकी नवमी के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन देवी सीता महाराज राजा जनक को एक कलश में मिलीं थी। देवी सीता कलश में कैसे आईं और कैसे उनका नाम सीता पड़ा इसकी एक रोचक कहानी है। 

मिथिला नरेश राजा जनक की कोई संतान नहीं थी। राजा जनक इस बात से काफी दुखी थे। इसी बीच मिथिला में भयंकर अकाल पड़ गया। अकाल से जनता की रक्षा के लिए ऋषियों की सलाह पर महाराज जनक ने यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ की पूर्णाहुति में महाराज जनक को अपने हाथों से खेल में हल चलाना था। 

महाराज जनक ने खेल में हल चलाना शुरू किया तो अचानक किसी धातु से उनके हल का नोक जिसे 'सित' कहते हैं टकराया। काफी प्रयास करने पर भी वहां से हल हटा नहीं। इसके बाद उस स्थान की खुदाई की गई और वहां से एक कलश निकला। 

कलश का ढक्कन जैसे ही हटाया गया उसके अंदर नवजात कन्या मुस्कुराती नजर आईं। सभी इस अद्भुत दृश्य को देखकर हैरान थे। उस समय अचानक से बादल भी छा गए और वर्षा होने लगी। अकाल का साया हट गया। राजा जनक उस कन्या को अपने साथ ले आए और सित के कलश से कन्या प्राप्त हुई थी इसलिए कन्या का नाम सीता रखा गया। राजा जनक ने इस कन्या को ईश्वर का वरदान मानकर अपनी पुत्री की तरह पाला। 

इस स्थान पर भूमि से निकली थीं देवी सीता 

जिस स्थान पर देवी सीता भूमि से प्रकट हुई थीं वह स्थान बिहार के सीतामढ़ी शहर से करीब 2 किलोमीटर दूर है जिसे पुनौरा धाम के नाम से जाना जाता है। यहां के सीता कुंड के बारे में कहा जाता है कि यहीं से देवी सीता भूमि से प्रकट हुई थीं। यहां रामनवमी और सीता नवमी के अवसर पर विशेष उत्सव का आयोजन किया जाता है। 

कलश में कहां से आईं सीता 

देवी सीता के कलश से उत्पन्न होने के विषय में अद्भुत रामायण में ऐसी कथा मिलती है कि देवी सीता रावण की पुत्री थी। इनके उत्पन्न होने पर यह भविष्यवाणी की गई थी कि अगर यह लंका में रहीं तो लंका का सर्वनाश हो जाएगा। रावण इस डर से देवी सीता को एक कलश में रखकर मिथिला की भूमि में दबा दिया। लेकिन काल की ऐसी गति हुई, रावण स्वयं सीता को अपने साथ लंका ले गया और उसका विनाश हो गया। 

जननी नवमी व्रत की तैयारी 
जानकी नवमी के व्रत की तैयारी और साज-सज्जा ऐसे की जाती है कि जन्मदिवस जैसा माहौल लगे। इसके लिए 4 स्तंभों का मंडप तैयार किया जाता है। इस मंडप में भगवान राम, माता सीता, राजा जनक, माता सुनयना, हल, पृथ्वी और कलश की पूजा की जाती है। इस दिन रामायण पाठ का वैसा ही पुण्य प्राप्त होता है जैसा रामनवमी के दिन पाठ करने से मिलता है।