धुंध और तनाव फैलाकर प्रगति रोकने की साजिश-रमेश शर्मा

दिंनाक: 25 Apr 2018 17:08:24
भोपाल(विसंके). अदालत का एक और फैसला आया। मक्का मस्जिद ब्लास्ट में असीमानंद एवं सभी आरोपी निर्दोष छूटे। इससे पहले इसी प्रकार के दो और प्रकरणों में ऐसा हुआ। इसके अलावा कठुआ बलात्कार कांड के आरोपियों ने नारको टेस्ट की मांग की? उन्होंने यह टेस्ट दोनों का मांगा है। स्वयं का और उन लोगों का भी जिन्होंने उन्हें आरोपी बताया। तमाम घटनाओं में यह दोनों घटनाएं ऐसी रही जिनकी पहली सूचना ने देश में सामाजिक विद्वेष और सद्भाव बिगाडऩे का काम किया। अब असीमानंद और सभी आरोपी छूट गए हैं। आरोपों के पक्ष में एक भी तथ्य नहीं मिला लेकिन वैमनस्यता के बीच जो लोगों के दिलों में बैठ गया था वह जड़ से समाप्त नहीं हुआ। इसी प्रकार कटुआ का प्रकरण भविष्य में क्या आकार लेगा। लेकिन कम से कम आज इस प्रकरण ने हिंदु समाज पर उस आक्षेप लगने की अगली कड़ी के रूप में काम किया है जो मक्का मस्जिद ब्लास्ट के समय लगा था। प्रचार किया गया था भगवा आतंकवादÓ। इस तरह के प्रकरण एक धुंध फैलाते हैं, तनाव पैदा करते हैं और देश की तरक्की को रोककर पीछे ले जाते हैं।
धुंध को फैलाकर सत्य को ढकने की घटनाओं से दुनिया का इतिहास भरा है। कोई ऐसा देश नहीं जहां ऐसी साजिशें न हुई हों। इसके दो ही उद्देश्य होते हैं जो देश अथवा सत्ता विरोधी लोग करते है। कई बार दुश्मन देश अपने एजेंष्टों से उन नागरिकों को गुमराह करके अपना वाहक बना लेते हैं जो सोचते कम है या किसी लालच से, स्वार्थ से बात मान लेते हैं। दूसरे वे जो सत्ता में परिवर्तन चाहते हैं। दूसरे को हटाकर खुद पाना चाहते है। ऐसा राजशाही में भी होता है और आधुनिक प्रजातंत्र में भी।
भारत के अतीत में भी ऐसे प्रयोग हुए है और एक से अधिक बार हुए हैं। ऐसा ही प्रयोग एक बार फिर दोहराने का प्रयत्न होने लगा है। यह प्रयत्न उन विधानसभा चुनावों की पृष्ठ भूमि में हैं जो अगले साल लोकसभा चुनावों में सत्ता और सत्तारुढ़ दल की साख तय करने वाले हैं। किसी ने कहा है कि जब करने के लिए कुछ न सूझे तो इतनी धुंध फैला दो कि सत्य साफ दिखाई न दे। बिल्कुल यही कोशिश पूरे देश में चल रही है। एक खास मिशन की धुंध फैलाने का प्रयत्न हो रहा है। इसकी तीव्रता इतनी प्रबल है, शोर इतना तीव्र है कि सत्य को समझने का प्रयत्न करने वाले मस्तिष्क के तंतु एकदम जड़ हो जाते हैं और दिमाग वहीं सोचने लगते हैं, जुबान वही, बोलने लगती है जैसा धुंध फैलाने वाले चाहते है। यह धुंध दो प्रकार की फैलाई जा रही है। एक तो घटनाओं के अतिरेक प्रचार और और दूसरी एकदम असत्य एवं तथ्यों को तोड़ मरोड़कर। सरकार को उन बातों के लिए भी कटघरे में खड़ा किया जा रहा है जिनसे सरकार का कोई लेना देना नहीं। यदि हम पिछले एक वर्ष औसत निकाले तो औसतन एक सप्ताह में नई बात आ रही है। यह वे बातें हैं जो केवल प्रचार तक सीमित है और समाज एवं सरकार दोनों इसमें उलझने से देश की प्रगति बाधित हो रही हैं एवं संसार में भारत की साख घट रही है।
उदाहरण के लिए दो बातों का ताल्लुक सीधा सुप्रीम कोर्ट है। सरकार से कोई लेना देना नहीं लेकिन हमला सरकार की छवि पर किया गया। पहला प्रकरण सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीशों द्वारा मीडिया के सामने आना, अपनी शिकायत रखना और प्रकरणों के बंटवारे पर आपत्ति प्रगट करना। यह सुप्रीम कोर्ट का नितांत अंदरुनी मामला है। इसमें सरकार क्या कर सकती है लेकिन मीडिया प्रचार और कुछ राजनैतिक दलों द्वारा सीधा सरकार को कटघरे में लेने की कोशिश की गई। दूसरे प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति, जनजाति कानून के दुरुपयोग पर फैसला दिया। ऐसा पहली बार नहीं हुआ। इससे पहले भी अनेक कानूनों के दुरुपयोग रोकने के निर्देश आए। लेकिन पूरे देश में इन वर्गों को लामबंद करके सरकार के खिलाफ आंदोलित किया गया। बंद के आव्हान हुए तोडफ़ोड़ हिंसा और इतना तनाव कि पूरा देश उसी में डूबा रहा। यह अभी भी जारी है। देश में वर्ग संघर्ष कराने की साजिश की जा रही है।
दक्षिण में एक पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या हुई। पत्रकारिता के साथ साथ वामपंथी विचारों को सीधा भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जोडऩे की कोशिश की गई। कोई हफ्ते भर तक प्रचार चला। बाद में हुई जांच में आरोपी पकड़ा गया और हत्या का कारण नितांत व्यक्तिगत निकला। बलात्कार और हत्या की एक घटना कश्मीर के कठुआ में हुई। निसंदेह घटना अमानवत्व की पराकाष्ठा है लेकिन कहा गया कि अपराधियों ने वारदात को अंजाम देने के बाद जयश्रीराम के नारे लगाए। निसंदेह यदि नारा लगाया गया है तो यह उन तत्वों की चाल है जो देश में अशांति और अराजकता फैलाना चाहते है। इसको समझने के लिए हमें कहीं दूर नहीं जाना। भारत में ही अतीत की कुछ घटनाओं पर नजर डालना है। कुछ वर्ष पहले ही पं. बंगाल के एक चर्च में एक सीनियर सिटीजन के साथ दुराचार और लूट की घटना हुई थी आरोपी कुछ ऐसी ही हरकत करके गया था कि शक हिंदुवादी समूह पर हो लेकिन सुबूतों के बाद आरोपी पकड़ा गया। वह बंगलादेशी निकला। जिन दिनों यह घटना हुई थी तब भी प्रचार का तूफान इसी तरह उठा था जैसा कठुआ की घटना पर उठा। अपराध की एक घटना की निंदा करना एक बात है लेकिन उसे किसी के माथे पर मढ़कर हमला करना बिल्कुल दूसरी बात है। जिस प्रकार पश्चिम बंगाल की उस घटना में राज्य सरकार, सहित सभी सेकुलर लोगों ने मीडिया के कुछ साथियों का सहारा लेकर प्रचार किया था कि दिल्ली में वर्तमान सरकार की शह पाकर हिंदुवादी फोर्स अल्पसंख्यकों को दबा रही है। इसका प्रचार पूरी दुनिया में हुआ ठीक इसी प्रकार कठुआ की घटना पर भी ऐसा ही प्रचार। ताजा प्रचारकों का भी जितना दबाव घटना की निंदा पर है उससे ज्यादा सरकार की छवि पर हमला हुआ।
कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट का एक निर्देश तीन तलाक के मुद्दे पर आया। यह केवल कानून के दुरुपयोग पर सीमित था। इसका भी सरकार से कोई लेना देना नीं था लेकिन प्रचार ऐसा मानों सरकार शरियत में दखल देना चाहती है। उत्तरप्रदेश में एक विधायक पर बलात्कार का आरोप लगा। विधायक की पत्नि ने पीडि़त और आरोपी दोनों का नार्कोटेस्ट कराने की मांग की। इतिहास में यह पहला मौका है  जब आरोपी स्वयं अपना और शिकायत कर्ता दोनों का नार्को टेस्ट कराने की बात कर रहे है। इसका अर्थ क्या है। हो सकता है जो दिखाने की कोशिश की जा रही है सत्य वैसा न हो और सत्य कुछ अलग हो।