कर्नाटक : राजनेताओं के बीच जहां राम से अधिक होती है भक्तों की पूजा - डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिंनाक: 30 Apr 2018 16:34:33


भोपाल(विसंके). प्रभु श्रीराम के बारे में सदियों से भारत में चहूं ओर यही बात कही और सुनी जाती है कि राम से बड़ा राम का नाम है जो काम स्वयं श्रीराम नहीं कर पाते, वह काम उनके नाम का जाप करने मात्र से पूरा हो जाता है। निश्‍चित ही उत्‍तरभारत की मान्‍यतानुसार यदि कोई संकट हो तो उस संकट के निवारण के लिए राम नाम विशिष्ट महत्व रखता है लेकिन इस बात के उलट दक्षिण के कर्नाटक में श्रीराम से अधिक हनुमान का स्‍मरण किया जाता है, शायद यही वह कारण भी है कि यहां राम मंदिर से कई गुना ज्‍यादा हनुमान मंदिर मिलते हैं।

देखा जाए तो कर्नाटक में यह समय विधानसभा चुनाव का है, हर कहीं प्रचार चल रहा है लेकिन इस प्रचार और लोकतंत्र से अधिक यहां की अधिकांश जनता इन जनप्रति‍निधियों से ज्‍यादा रामभक्‍त हनुमान पर भरोसा करती है। उन्‍हें लगता है कि हनुमप्‍पा (स्‍थानीय भाषा में) ही उनके संकट दूर करेंगे और उनकी सभी मनोकामनाओं को पूरा करेंगे। हनुमान ही हमारे गांव की रक्षा करते हैं, हमारे संकटों का निवारण करते हैं, हमें धन्य-धान्य से पूर्ण करते हैं और हमारे ऊपर आई हुई विपदाओं का हरण करते हैं। यह प्रभु राम से मिलने का श्रेष्‍ठतम मुक्त‍ि मार्ग भी हैं। यहां हनुमान शब्द का ह ब्रह्मा का, नु अर्चना का, मा लक्ष्मी का और न पराक्रम का द्योतक है। यहां के निवासियों का यह दृढ़ विश्‍वास है कि ‘‘हनुमनुदिसिदनाड़ु’’ यानि की जहां हनुमान पैदा हुए वह राज्‍य कर्नाटक है।

शायद यही वो कारण है कि इस चुनाव में भाजपा, कांग्रेस और जेडीएस से लेकर तमाम राजनी‍ति‍क पार्ट‍ियों के प्रत्‍याशी टिकिट मिलने के बाद से लगातार सफलता की कामना लेकर अपने गांव के द्वार पर स्‍थ‍ित हनुमान मंदिरों में पूजा-अर्चना करने पहुंच रहे हैं। एक तरह से कहा जाए तो श्रीराम भक्त हनुमान यहां के सर्वमान्य नेता हैं। यही कारण है कि समूचे कर्नाटक के अधिकांश ग्रामों के बाहर हनुमानजी के छोटे-बड़े और भव्य मंदिर बने हुए हैं, जहां सुबह-शाम नियमित आरती और शंखध्‍वनि का घोष सुनाई देता है।

इस संदर्भ में कोवेम्‍पु विश्‍वविद्यालय में इति‍हास विभाग के डीन प्रो. राजाराम हेगड़े हिस से कहते हैं कि मध्वाचार्य और उनके शिष्‍यों ने दक्षिण के विशाल विजयनगर साम्राज्‍य के समय में 800 साल पूर्व पूरे कर्नाटक व इसके आसपास के क्षेत्र में हनुमप्‍पा यानि कि सभी के पिता जो हैं ऐसे हनुमान के विषय में जनमानस के बीच भगवान विष्‍णु के साथ श्रद्धा जगाकर इनके मंदिरों की स्‍थापना में अपनी महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है। ये भारत में भक्ति आन्दोलन के समय के सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिकों में से एक थे, जिन्‍हें द्वैत तत्ववाद का प्रवर्तक माना जाता है।

प्रो. हेगड़े कहते हैं कि मध्वाचार्य द्वारा स्थापित यह सम्प्रदाय भागवत पुराण पर आधृत होने वाला पहला सम्प्रदाय है। उनके सिद्धान्तों का स्पष्ट वर्णन कन्नड़ काव्य ग्रन्थ 'हरिकथासार' में हुआ है। मध्वाचार्य जीवन की वास्तविकता को अपने स्‍तर पर समझकर उसे व्यावहारिक और रुचिपूर्ण बनाने का आधार अपने द्वैतवाद में प्रस्तुत करते हैं जिसमें कि दो पदार्थ या तत्‍व अपनी सत्‍ता में रहते हुए स्वतंत्र और अस्वतन्त्र हैं। स्वतन्त्र तत्‍व परमात्मा है, जो विष्णु नाम से प्रसिद्ध है और जो सगुण तथा सविशेष है, जबकि अस्वतन्त्र तत्‍व जीवात्मा है। ये दोनों तत्‍व नित्य और अनादि हैं।

मध्‍वाचार्य की व्‍याख्‍या कहती है कि जीवात्मा और जगत् भगवान पर आश्रित हैं। इसलिये भगवान उनका नियंत्रण करते हैं। परमात्मा स्वतंत्र हैं। इसलिए उनका वर्गीकरण असम्भव है। आश्रित तत्‍व सकारात्मक एवं नकारात्मक रूप में विभाजित किये जाते हैं। सकारात्मक को भी चेतन जैसे आत्मा और अचेतन जैसे वे पदार्थ में हैं से वर्गीकृत किया जा सकता है। अचेतन तत्‍व को परिभाषित करने के पहले मध्वाचार्य स्वतंत्र और आश्रित के बारे में बताते हैं जो संसार से नित्य मुक्त हैं। इस विचारधारा के अनुसार `विष्णु` स्वतंत्र हैं जो विवेकी और संसार के नियन्ता हैं। उनकी शक्ति लक्ष्मी हैं जो नित्य मुक्त हैं। कई व्यूहों एवं अवतारों के रूपों में हम विष्णु को पा सकते हैं। उसी प्रकार अत्यन्त आश्रित लक्ष्मी भी विष्णु की शक्ति हैं और नित्य भौतिक शरीर लिये ही कई रूप धारण कर सकती हैं। वह दुख-दर्द से परे हैं। उनके पुत्र ब्रह्मा और वायु हैं। प्रकृति´ शब्द प्र = परे + कृति = सृष्टि का संगम है।

मध्वाचार्य ने सृष्टि और ब्रह्म को अलग माना है। उनके अनुसार विष्णु भौतिक संसार के कारण कर्ता हैं। भगवान प्रकृति को लक्ष्मी द्वारा सशक्त बनाते हैं और उसे दृश्य जगत में परिवर्तित करते हैं। प्रकृति भौतिक वस्तु, शरीर एवं अंगों का भौतिक कारण है। प्रकृति के तीन पहलुओं से तीन शक्तियाँ आविर्भूत हैं लक्ष्मी,भू-सरस्वती-धरती और दुर्गा। अविद्या या अज्ञान भी प्रकृति का ही एक रूप है जो परमात्मा को जीवात्मा से छिपाती है।मध्वाचार्य जी का विश्वास है कि प्रकृति से बनी धरती माया नहीं, बल्कि परमात्मा से पृथक सत्य है। यह दूध में छिपी दही के समान परिवर्तन नहीं है, न ही परमात्मा का रूप है। इसलिए यह अविशेष द्वैतवाद ही है।प्रो. हेगड़े का कहना है कि नारायण का अवतार भगवान श्रीराम हुए और उनके अनन्‍यभक्‍त श्रीहनुमान हैं। इसलिए भगवान की प्राप्‍त‍ि उनके भक्‍त के आश्रय से सहजतापूर्वक की जा सकती है।


उन्‍होंने इसी के साथ यह भी बताया कि 13वीं और 14वीं शताब्‍दी में दास संप्रदाय के कारण से भी समूचे दक्षिण भारत में हनुमप्‍पा के प्र‍ति‍आमजन की श्रद्धा बढ़ी थी। पुरन्‍दरदास, कनकदास, गरीबदास इसके पंरपरा में श्रेष्‍ठ प्रवर्तक मानेजाते हैं। इन्‍होंने ही हनुमान को लेकर यह विचार स्‍थापित किया कि कलियुग में हनुमान ही ‘ मुख्‍यप्राणदेवा’ हैं, यही जीवन से मुक्‍त‍ि के देवता हैं। वैष्‍णवों को श्रीराम से मिलना है तो वे हनुमप्‍पा की शरण में आएं, यहीं से जीवात्‍मा का मुक्‍त‍ि मार्ग खुलेगा। यही कारण है कि कर्नाटक में सेकड़ों नहीं कहना चाहिए कि हजारों मंदिर आज हनुमानजी के हैं। वे यहां कररमंडलगी, कांतेशा, शान्‍तेन हड़ली,शोन्‍तेशा, भ्रान्‍तेषी उच्‍चराया यानि कि भ्रान्‍त‍ियों का निवारण करनेवाले तथा उच्‍चरायप्‍पा के नाम से भी पुकारे जाते हैं।

इसी विश्‍वविद्यालय में भाषाविज्ञ एवं पुरातात्‍विक अनुसंधान की विशेषज्ञ डॉ. उमा का इस विषय में हिन्‍दुस्‍थान समाचार से कहना था कि उत्‍तर कर्नाटक के जिलों में विशेषकर धारवाड़, बीदर, गुलबर्गा में हनुमानजी को बहुत मानते हैं, यहां तक कि बंदरों को भी कोई चोट नहीं पहुंचाता है। वे कहती हैं कि लिंगायत समुदाय विशेषरूप से कर्नाटक में बहुत बड़ी संख्‍या में है जोकि शिव का उपासक है, किेंतु हनुमान को शिव का एक रूप मानने के कारण से यह समुदाय भी हनुमान की भक्‍त‍ि करता है। यहां गांव के द्वार के ऊपर खड़ी हुई विशाल मुद्रा में हनुमान मूर्त‍ि रखने की परंपरा है। यही कारण है कि कर्नाटक में अधिकांश स्‍थानों पर आप बच्‍चों को हनुमान चालीसा पढ़ते सहज देख सकते हैं।

वे बताती हैं कि आज भले ही बजरंगबली के जन्म से जुड़ी कई कहानियां प्रचलित हैं, किंतु उनके जन्म स्थान को लेकर वाल्मीकी रामायण जो संदर्भ आया है उसके अनुसार हनुमप्‍पा कर्नाटक के हंपी के पास मौजूद अंजनेय पहाड़ी के समीप ही जन्‍में थे । जब श्री राम मां सीता की खोज में निकले तब उन्हें राक्षस कबंध से वानरराज सुग्रीव के बारे में पता चला था, जिसके बारे में रामायण राम-कबंध संवाद की जानकारी देती है, “गच्छ शीघ्रमितो वीर सुग्रीवं तं महाबलम्। वयस्यं तं कुरु क्षिप्रमितो गत्वाद्य राघव।।’’ अर्थात् सुग्रीव ही वो हैं जो आपको माता सीता तक पहुंचने में सहयोग करेंगे, उनकी आप सहायता अवश्‍य लें । कबंध ने जिस स्‍थान की ओर सुग्रीव के निवास का जिक्र किया है वह स्‍थल यही कर्नाटक प्रदेश का पंपा झील के पास ऋष्यमुख पर्वत है। यह पर्वत अंजनेय पहाड़ी के पास और पंपा झील यहां के कोप्पल जिले में मौजूद है। वे कहती हैं कि अंजनेय पहाड़ी के शीर्ष पर हनुमान मंदिर पर आप पहुंचकर नीचे का भव्‍य नजारा देख सकते हैं जिसमें कि आपको आज हरेभरे खेतों के साथ ही हंपी शहर के खंडहर दिखाई देते हैं। इसी हंपी शहर में भगवान राम का एक भव्य मंदिर माल्यवत पहाड़ी पर स्थित है, जिसे रघुनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है।

कर्नाटक प्रदेश में हनुमान की इस मान्‍यता के लिए 72 वर्षीय विद्वान प्रो. टीएन भट्ट अपनी कुछ और बाते जोड़ते हैं। प्रो. भट्ट का कहना है कि बेल्लारी जिले के हंपी का हनुमान मंदिर यंत्र उद्धारक हनुमान के नाम से प्रसिद्ध है, जहां कभी श्रीराम ने मां सीता की खोज में वानरों का सहयोग लिया और रावण को परास्त करने के लिए लंका जा पहुंचे थे। किवदंती है कि यहीं पर भगवान राम की पहली बार अपने परम भक्त हनुमान से मुलाकात हुई थी। जब श्रीराम लंका से विजय हो अयोध्या लौट रहे थे तब वापसी में उन्‍होंने एक रात्रि यहां विश्राम भी किया था। प्रो. भट्ट भी इ‍ति‍हासज्ञ राजाराम हेगड़े की बात को यहां आगे बढ़ाते हुए दिखे और उन्‍होंने भी हनुमप्‍पा की समूचे कर्नाटक में प्रसिद्धि‍का प्रारंभिक कारण विशिष्‍टाद्वैत वाद को दिया है। साथ ही उन्‍होंने यह भी जोड़ा कि किषकिंधा यानि रामायणकालीन  कर्नाटक का कोप्पल और बेल्लारी जिले का वह क्षेत्र है जहां वर्तमान में हंपी के खंडहर मौजूद हैं और यहीं पर कभी सुग्रीव का साम्राज्य था। आज इस स्‍थल की धार्मिक ही नहीं ऐतिहासिक मान्‍यता इतनी अधिक है कि हंपी नगर यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत स्थलों की सूची में प्रमुखता से शामिल किया गया है।  

यह भी मान्‍यता है यहां

हनुमान की भक्‍त‍ि और उनके लिए पूर्ण समर्पण की भावना के साथ यहां मान्‍यता यह भी है कि जो कोई भी हनुमप्‍पा का नाम जय हनुमान, अंजनी सुत,वायुपुत्र, महाबल, रामेष्ठ, फाल्गुण सखा, पिंगाक्ष, अमितविक्रम, उद्धिक्रमण, सीताशोकविनाशन, और दशग्रीवदर्पहा लेकर जाप करते या पुकारते हैं उन पर बजरंग बली की विशेष कृपा अवश्‍य होती है। ऐसे सभी लोगों की उम्र तो बढ़ती ही है उन्‍हें समस्त सुखों की प्राप्ति भी होती है।

कर्नाटक प्रदेश को लेकर कुल मिलाकर इस वक्‍त सभी पार्टियों में विधानसभा चुनावों की चल रही जीत की जोर आजमाइश के बीच यही कहा जा सकता है कि यहां ज्‍यादातर नेताओं को हनुमप्‍पा के आशीर्वाद से जीत जाने का भरोसा है। आप कर्नाटक आने पर सभी दलों के नेताओं को हनुमान मंदिर में माथा टेकते सहज ही देख सकते हैं। ऐसे में यही कहना सही होगा कि भारत के इस राज्‍य कर्नाटक में आज राम से बड़ा रामभक्‍त हनुमान का नाम सर्वत्र सुनाई दे रहा है।