शिक्षा की स्वयत्तता के लिए समाज को आगे आना होगा : भैयाजी जोशी

दिंनाक: 30 Apr 2018 16:19:03


भोपाल(विसंके). हमारे देश में गुरुकुल कभी भी सत्ता पोषित नहीं रहे है। हमारे देश में प्राचीन काल से गुरुकुल समाज पोषित रहे हैं। वर्तमान समय में भी हमारी कोशिश होनी चाहिए कि समाज के लोग ही शिक्षा का पोषण करें। हमें सत्ता पर आश्रित न होकर स्वयं ही शिक्षा के स्वयत्ता के लिए कार्य करना होगा। समाज के लोगों को, देश के शिक्षाविदों को आगे बढ़कर सहयोग करने की आवश्यकता है, जिससे कि शिक्षा स्वावलंबी हो सके, समृद्ध हो सके। यह विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह सुरेश भैयाजी जोशी ने व्यक्त किये। वह उज्जैन में आयोजित विराट गुरुकुल सम्मेलन में ज्ञान यज्ञ विषय पर बोल रहे थे।

सरकार्यवाह भैयाजी ने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में पाठ्यक्रम, शिक्षण विधि आदि को लेकर नित्य प्रयोग करते रहने की आवश्यकता है। आज हमारे लिए आचार्य और उनकी संख्या समस्या नहीं है। आज हमारे लिए छात्र चिंता का विषय हैं। कई छात्र गुरुकुल में पढ़ना नहीं चाहते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है, अभिभावकों की मानसिकता। आज हमें सुनियोजित तरीके से अभिभावकों को जागरूक और प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है, जिससे कि वह गुरुकुल शिक्षण पद्धति को सम्मान और गौरव की भावना से देखें।

सकारात्मक वातावरण बनाने की आवश्यकता है :

श्री भैयाजी जोशी ने कहा कि प्राचीन शिक्षा को युगानुकुल बनाने की आवश्यकता है। हमें संख्या के साथ-साथ चिंतन पर भी विचार करना चाहिए। समाज के लोगों को सकारात्मक वातावरण बनाने की कोशिश करना चाहिए, जिससे शासन को इस दिशा में सोचना पड़े, शासन भी इस दिशा में सहयोग करे। श्री जोशी ने कहा कि हमारी हार्दिक कामना है कि विश्व गुरुकुल परंपरा को समझे और भारत उसका मार्गदर्शक बने।

परस्पर आत्मीयता का संबंध है गुरु-शिष्य परंपरा :

श्री जोशी ने गुरु-शिष्य परंपरा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गुरु और शिष्य का संबंध परस्पर आत्मीयता का है। गुरु अपनी विराट कल्पनाओं की शक्ति शिष्य को समृद्ध बनाने में लगाता है, जिससे शिष्य सिर्फ ज्ञान ही प्राप्त नहीं करता बल्कि जीवन जीने की दृष्टि प्राप्त करता है और संस्कारों की शुद्धता प्राप्त करता है। आज के जमाने में शिक्षा का व्यापारीकरण हो रहा है, शिक्षा बाजार की वस्तु हो गयी है। लेकिन हमारी परंपरा में शिक्षा दान का विषय रही है। आजकल लोग घर बैठे भी इंटरनेट पर शिक्षा प्राप्त करते हैं पर यह वास्तविक शिक्षा नहीं है। वास्तविक शिक्षा तो वह है जो जीवन को जानने वाली है।

इस मौके पर मध्यप्रदेश संस्कृति विभाग के प्रमुख सचिव मनोज श्रीवास्तव ने गुरु-शिष्य परंपरा और दक्षिणा के संबंध में अपनी बात रखते हुए कहा कि गुरु की सच्ची दक्षिणा वही है, जिसमें शिष्य गुरु के ज्ञान का प्रचार-प्रसार करे। हमारे शास्त्रों में कर्म को यज्ञ कहा गया है और यज्ञ की पूर्णाहुति दक्षिणा से संपन्न कराने की बात कही गयी है। श्री श्रीवास्तव ने कहा कि गुरुकुल शिक्षा सिर्फ जीवन का अंग नहीं है बल्कि स्वयं में जीवन है। आज शिक्षा ऋषि परंपरा नहीं बल्कि कृषि को भी संपोषित करने वाली है।

इस मौके पर सनत्कुमार ने प्रजेंटेशन के माध्यम से गुरुकुल परंपरा, वेद विद्या, योग पद्धति, गौ महिमा आदि को समझाया। वहीँ शैलेंद्र ने भारत के प्राचीन विश्वविद्यालय तक्षशिला, नालंदा आदि के वैभवपूर्ण इतिहास के बारे में बताया। इस मौके पर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित "गुरुकुल समाचार" पत्र का विमोचन भी किया गया।

विराट गुरुकुल सम्मलेन में दूसरे दिन सुबह से ही विभिन्न विषयों पर समानान्तर सत्रों में विमर्श किया गया।

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किसान खुद तय करे अपनी उपज का मूल्य
अन्तर्राष्ट्रीय विराट गुरुकुल सम्मेलन में दूसरे दिन कृषि और गाय पर विमर्श के दौरान अमरकंटक विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. टी. कट्टीमणी ने कहा कि शुद्ध प्राकृतिक कृषि में किसी भी तरह के प्रहार के लिए कोई जगह नहीं है। न तो उसे कहीं जाना है, न कोई जीत हासिल करनी है। खेती का अंतिम लक्ष्य फसलें उगाना नहीं, बल्कि इंसानों को शिक्षित कर परिपूर्ण बनाना है। किसान को अपनी उपज का मूल्य तय करने का पूर्ण अधिकार होना चाहिए। लोगों को किसानों के लिए सोचना चाहिए।

इस अवसर पर पारिस्थितिक विज्ञान संस्थान के अध्यक्ष प्रो. दिनेश मारोठिया ने कहा कि बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ भोजन की आपूर्ति के लिए मानव द्वारा खाद्य उत्पादन की होड़ में अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए तरह-तरह की रासायनिक खाद और  जहरीले कीटनाशकों का उपयोग किया जा रहा है, जो गलत है। प्राचीन काल में मानव स्वास्थ्य के अनुकुल तथा प्राकृतिक वातावरण के अनुरूप खेती की जाती थी। इस कारण जैविक और अजैविक पदार्थों के बीच आदान-प्रदान का चक्र निरन्तर चलता रहा था और जल, भूमि, वायु तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होता था।

प्रसारक एवं समाज सुधारक गिरिश प्रभुने ने कहा कि भारत जैसे और भी देश हैं, जो कृषि प्रधान रहे हैं, लेकिन वहां गाय को इतना महत्व नहीं मिला, जितना भारत में मिला है। गाय एकमात्र पशु है, जिसका सब कुछ सभी की सेवा में काम आता है। गाय का दूध, मूत्र, गोबर के अलावा दूध से निकला घी, दही, छाछ, मक्खन आदि सभी बहुत ही उपयोगी है। अपने पास अगर एक गाय है, तो खेती के लिए खाद की चिंता नहीं रहेगी। बस गोबर से ही फसल लहलहाएगी। गुणवत्तापूर्ण अधिक उत्पादन भी मिलेगा।

प्रो. आर. तिवारी ने कहा कि रासायनिक खाद महंगी भी है और फसल को नुकसान भी पहुँचती है। व्यापक प्राकृतिक खेती तब उपजती है,जब मानव और प्रकृति में एकता बनी रहती है। वह प्रकृति और मन की नकल, जैसे वे हैं, उसी रूप में करती है। वह इस विश्वास पर चलती है कियदि मानव कुछ देर के लिए अपनी इच्छाशक्ति को त्याग कर खुद को प्रकृति के द्वारा निर्देशित होने देता है तो इसके बदले में प्रकृति उसे सब-कुछ अपनी तरफ से देती है।

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ज्योतिष कोई सिद्धि नहीं है बल्कि यह गणित है

विराट गुरुकुल के बौद्धिक मंडप ‘प्रयोगशाला’ में आयोजित कार्यक्रम में प्रयोगों के माध्यम से भारतीय ज्ञान-विज्ञान की बातों को समझने का प्रयास किया गया। भारतीय ज्ञान परम्परा पर मुक्त चर्चा में ज्योतिष, गणित और विज्ञान पर भारतीय दृष्टिकोण से चर्चा हुई। ज्योतिष के सम्बन्ध में विद्वानों ने कहा कि ज्योतिष कोई सिद्धि नहीं हैं, यह गणित है। ज्योतिष से हम भावी जीवन में होने वाली घटनाओं को जान सकते हैं। आचार्य तेजस कुलकर्णी ने कहा कि हम हमारे विज्ञानपरक साहित्य को दैनिक जीवन में लागू कर सकते हैं।

इस कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. अनिल सहस्त्रबुद्धे ने की। विषय विशेषज्ञ के रूप में कपिलदेव मिश्र, आचार्य रतन दुबे और आचार्य तेजस कुलकर्णी ने सहभागिता की। कार्यक्रम का संचालन डॉ. विश्वाजित पेंडरो ने किया।