समाज की चिंता किसी को नहीं RSS के कार्यकर्ताओं के अंदर चल रहे उथल पुथल को अनुभव कीजिए

दिंनाक: 05 Apr 2018 18:17:25
भोपाल(विसंके). डॉ भीमराव रामजी अंबेडकर के नाम में राम है उसी राम के दर्शन करने के लिए कालाराम मंदिर प्रवेश के लिए 5 वर्ष संघर्ष करने वाले पूज्य अंबेडकर तत्कालीन हिंदू पुजारी की समझ और उस समझ से हुई त्रुटि का परिणाम आज हम देख रहे हैं। उस घटना के परिणाम स्वरुप होने वाले सामाजिक विघटन के प्रारंभिक बिंदु के कारण और निवारण का विश्लेषण  करते हुए आंतरिक परिमार्जन में लगी RSS की पहल को बताती यह पोस्ट अवश्य पढ़ें।  दुनिया “श्रीराम जय राम जय जय राम” कहती है उसकी वजह राम की करुणा थी जो समाज के सबसे निचले पायदान पर बैठे लोगों के लिये भी थी। समाज के वंचित वर्ग से आने वाली शबरी के प्रति प्रेम रखने वाले और उसमें माँ का रूप देखने वाले उसी भगवान राम का एक मंदिर महाराष्ट्र के नासिक जिले के पंचवटी में है।  इस मंदिर को कालाराम मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर में भगवान राम की एक बड़ी सुंदर और भव्य प्रतिमा स्थापित है। एक समय था जब कुछ मूढ़मति लोगों ने वंचित वर्ग के आराध्य राम के दर्शनों से वंचित समाज को ही रोक दिया।  
  इस अन्याय के खिलाफ मार्च 1930 में डॉक्टर अम्बेडकर ने सत्याग्रह किया, जिसे Temple Entry Movement के नाम से इतिहास में जाना गया इस सत्याग्रह के पीछे का भाव यही था कि अछूत भी हिन्दू ही हैं और इस नाते भगवान राम हम सभी के हैं, उनके दर्शन से हमें वंचित नहीं किया जा सकता। दुर्भाग्य की चादर ओढ़ रखे मूढ़ पुजारी वर्ग और हिन्दू समाज ने बाबासाहेब के इस सत्याग्रह का विरोध किया और वंचितों को मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया। बाबा साहब के नेतृत्व में यह सत्याग्रह पाँच साल चला पर सवर्ण समाज का मन नहीं बदला।
   आज से करीब 80 साल पहले हुये उस पाप में मुख्य भागीदार थे रामदास महाराज जो उस मंदिर के मुख्य पुजारी थे। अब वो दुनिया में नहीं थे पर प्रश्न बना हुआ था कि अतीत में अपने ही समाज के साथ हुये इतने बड़े अन्याय और इतनी बड़ी जो गलती हुई थी तो प्रायश्चित कौन करे? जाहिर है प्रायश्चित उन्हें करना था जिन्होनें ये पाप किया था पर चूँकि अब वो नहीं थे तो अब प्रायश्चित करने की जिम्मेदारी उनकी थी जो उनके वंशज और उनकी संतति थे। उन्होंनें प्रायश्चित किया भी...
2005 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कुछ समरसता यात्राओं का आयोजन किया था। यात्रा की रवानगी से पूर्व यात्रा की सफलता के लिये एक यज्ञ करने का निश्चय किया गया।  उपरोक्त वर्णित उसी कालाराम मंदिर में ये यज्ञ होना तय हुआ। उस समय के प्रमुख पुजारी महामण्डलेश्वर सुधीरदास (जो रामदासजी के पौत्र थे) इस यज्ञ को संपादित करने वाले थे।  सुधीरदास ने इस अवसर को प्रायश्चित यज्ञ में बदल दिया। यज्ञ में बैठने वाले और समस्त कर्मकांडों को करने वाले वंचित और अस्पृश्य समाज के लोग थे। इतना ही नहीं, इसके बाद सुधीरदास महाराज ने 75 वर्ष पहले अपने दादा रामदास के कृत्य के लिये सार्वजनिक क्षमा याचना की और कहा कि ईश्वर का दर हरेक के लिये खुला है।
कालाराम मंदिर का उदाहरण अकेला नहीं है. अतीत में सवर्ण समाज से पाप हुये थे ये निर्विवाद है पर उसके लिये प्रायश्चित करने भी उसी समाज से लोग आगे आये। बाबासाहेब के साथ  सावरकर, तिलक, गाँधी ये सब उसी  समाज से थे जिन्होनें अस्पृश्यता का खुलकर विरोध किया था। विश्व हिन्दू परिषद् की स्थापना के अवसर पर उडुपी में सारे संतों, महामंडलेश्वरों और शंकराचार्यों ने जब एक मंच से “अस्पृश्यता पाप है, इसे किसी धर्मशास्त्र का समर्थन नहीं है, हर हिन्दू सहोदर है और कोई हिन्दू कभी पतित नहीं होता” की घोषणा की थी तब गुरूजी माधवराव सदाशिव राव गोलवलकर ख़ुशी और हर्षातिरेक से मंच पर लगभग नाचने लगे थे।
     इंटरनेट से मिली इस घटना से कुछ सवाल मुँह ताकने लगतें है। समाज ने बाबासाहेब को राम के मंदिर में जाने से रोका तो डॉ़ अम्बेड़कर प्रतिक्रिया में रावण को पूजने नहीं गये बल्कि राम को पूजने के अधिकार के लिये पाँच साल संघर्षरत रहे क्योंकि उन्हें पता था गलती समाज की है और समाज की गलती सर्वजन समाज के प्रतिनिधि राम को गाली देने और रावण को महिमामंडित करने का कारण नहीं हो सकता, अंबेड़कर ने कालाराम मंदिर में प्रवेश के लिये पाँच वर्षों तक आन्दोलन किया पर ये आन्दोलन पूर्णतया अहिंसक था. मतलब ये है बाबासाहेब का सन्देश स्पष्ट था कि अन्याय के प्रतिकार का मार्ग कभी भी हिंसक नहीं हो सकता। ग़लती जिनसे या जिनके पूर्वजों से हुई थी प्रायश्चित भी उन्होंने ही किया है।
आज जो लोग बाबासाहेब के नाम पर सेना या अलग अलग मुहल्ला बनाये बैठे हैं या अपनी दुकानें चला रहें हैं उन्होंनें बाबासाहेब को अपमानित किया है क्योंकि उन्होंनें अपने आन्दोलन के लिये सिर्फ उनका नाम लिया उनके आदर्श नहीं लिये।
डा़ अबेडकर ने अपने जीवन मे कभी नहीं कहा कि तिलक और तराजू को जूते मारो। उन्होने कभी जातीय संघर्ष को बढ़ावा देने की बात ही नहीं की.. उनके स्वंयभू भक्त उनका नाम लेते हैं पर जीवन दर्शन से प्रेरित नहीं होते.. क्यूंकि प्रेरित होते तो राम, कृष्ण जैसे अराध्यों की तस्वीरें नहीं फाडी़ जा रही होती, सवर्णों के प्रायश्चित यज्ञ को भूलकर आधारहीन और भ्रामक प्रचार नहीं चल रहा होता।
अम्बेडकर के तथाकथित वारिसों को ये बात समझनी पड़ेगी कि सामाजिक परिवर्तन और मानसिकता परिवर्तन निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, अनायास ही कुछ नहीं बदलता. अस्पृश्यता और भेदभाव समय के साथ कम होते जा रहें हैं।  बाबासाहेब समाज को बदलने के पक्षधर थे पर न तो हिंसा उनका रास्ता था न ही सवर्णों के लिये द्वेष उनके आन्दोलन का आधार था और न ही सामाजिक खाई को और गहरा करना उनका मंतव्य था और तो और पूज्य बाबा साहेब अपने घर के झगड़े में किसी बाहर वाले की मदद लेने नहीं गये थे। भीमसेना और उनके समर्थक इस बात को समझें वर्ना भाई-भाई के बीच के मनभेद में कोई और बाजी मार ले जायेगा। आज गाहे-बगाहे जो डॉ. अंबेडकर को भला बुरा कहा जाता है उसके पीछे सबसे बडा़ हाथ उन अनुयायियों का ही है जो अंबेडकर को पहचान ही नहीं सके, दरअसल अंबेडकर को बदनाम और विस्मृत करने मे सबसे बडा़ योगदान अंबेडकरवादियों का ही है...ये जो खाई अंबेडकर और गैर अबेंडकर के बीच खुदी हुई है इसके सबसे बडे़ जनक ठेकेदार ही है