मानव रत्न हरमोहन लाल जी / पुण्य तिथि – 5 अप्रैल

दिंनाक: 05 Apr 2018 14:58:44


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विद्या भारती तथा फिर विश्व हिन्दू परिषद के काम में सक्रिय रहने वाले श्री हरमोहन लाल जी का हीरे, जवाहरात और रत्नों का पुश्तैनी कारोबार था। भारत में आगरा, जयपुर, मुंबई आदि के साथ ही अमरीका और अफ्रीका में भी उनकी दुकानें थीं। पत्थरों को परखते हुए वे लोगों को परखना भी जान गये और अनेक मानव रत्नों को संगठन में जोड़ा।

श्री हरमोहन लाल जी के पूर्वज वर्तमान पाकिस्तान में मुल्तान नगर के निवासी थे। इनमें से एक श्री गुरदयाल सिंह शिमला में बस गये। इसके बाद उनके कुछ वंशज जयपुर आ गये। वहां ‘राजामल्ल का तालाब’ उनके पुरखों द्वारा निर्मित है। इस परिवार के एक बालक गणेशीलाल को आगरा में गोद लिया गया। 1917 में जन्मे हरमोहन लाल जी गणेशीलाल जी के ही पौत्र थे।

हरमोहन लाल जी के प्रपितामह ने आगरा में ‘गणेशीलाल एंड सन्स’ के नाम से 1845 में हीरे-जवाहरात की दुकान खोली। हरमोहन लाल जी के पिता श्री ब्रजमोहन लाल जी की इस क्षेत्र में बड़ी प्रतिष्ठा थी। देश के बड़े-बड़े राजे, रजवाड़े, साहूकार और जमींदार आदि उनके ग्राहक थे। वे उन्हें अपने महल और हवेलियों में बुलाकर अपने पुराने गहनों और हीरों आदि का मूल्यांकन कराते थे। आगे चलकर हरमोहन लाल जी भी इसमें निष्णात हो गये।

अत्यधिक सम्पन्न और प्रतिष्ठित परिवार के होने के कारण हरमोहन लाल जी आगरा के अनेक क्लबों और संस्थाओं के सदस्य थे; पर 1945 में आगरा में संघ के प्रचारक श्री न.न.जुगादे के सम्पर्क में आकर वे स्वयंसेवक बने और फिर धीरे-धीरे संघ के प्रति उनका प्रेम और अनुराग बढ़ता चला गया। वे कई वर्ष आगरा के नगर संघचालक रहे। जब वे अपने कारोबार के लिए जयपुर रहने लगे, तो उन्हें वहां भी नगर संघचालक बनाया गया। शिक्षाप्रेमी होने के कारण जयपुर में उन्होंने ‘आदर्श विद्या मंदिर’ की स्थापना की।

विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना के बाद वे उ.प्र. में इसके काम में सक्रिय हो गये। आपातकाल के बाद वे वानप्रस्थी बनकर पूरा समय परिषद के लिए ही लगाने लगे। 1981 में उन्हें वि.हि.प. में महामंत्री की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गयी। उनके कार्यकाल में ही ‘संस्कृति रक्षा निधि’ एवं ‘एकात्मता यज्ञ यात्रा’ जैसे कार्यक्रम सम्पन्न हुए, जो वि.हि.प. के कार्य विस्तार में मील के पत्थर हैं।

शाही जीवन के आदी हरमोहन लाल जी ने परिषद में सक्रिय होने पर सादा जीवन अपना लिया। एक बार वे महाराष्ट्र में संभाजीनगर (औरंगाबाद) के प्रवास पर गये। कार्यकर्ताओं ने उनके निवास की व्यवस्था एक सेठ के घर पर की थी; पर वे वहां न जाकर विभाग संगठन मंत्री के घर पर ही रुके। संगठन मंत्री के छोटे से घर में ओढ़ने-बिछाने का भी समुचित प्रबंध नहीं था; पर हरमोहन लाल जी बड़े आनंद से वहां रहे और धरती पर ही सोये। उनके आने की खबर पाकर शहर के कई बड़े जौहरी उनसे मिलने आये। वे यह सब देखकर हैरान रह गये। यद्यपि तब तक हरमोहन लाल जी वहां से जा चुके थे।

एबट मांउट (जिला चंपावत, उत्तराखंड) में हरमोहन लाल जी की पुश्तैनी जागीर थी। वहां उन्होंने एक सरस्वती शिशु मंदिर और धर्मार्थ चिकित्सालय खोला। उनकी पत्नी श्रीमती हीरोरानी भी इसमें बहुत रुचि लेती थीं। मथुरा के अद्वैत आश्रम के कामों के भी वही सूत्रधार थे।

मृदुभाषी एवं विनोदप्रिय स्वभाव के धनी हरमोहन लाल जी का अपने व्यापार के कारण विश्व भर में संपर्क था। इनका उपयोग उन्होंने वि.हि.प. के कार्य विस्तार के लिए किया। न्यूयार्क और कोपेनहेगन के ‘विश्व हिन्दू सम्मेलन’ इसका प्रमाण हैं। वे बैंकाक में होने वाले तीसरे सम्मेलन की तैयारी में लगे थे; पर इसी बीच पांच अपै्रल, 1986 को उनका आकस्मिक निधन हो गया।

(संदर्भ : श्रद्धांजलि स्मारिका, वि.हि.प.)