भारतवर्ष की सर्वांग स्वतंत्रता - पुस्तक समीक्षा: नरेन्द्र ठाकुर

दिंनाक: 12 May 2018 16:04:30


भोपाल(विसंके). विदेशी एवं विधर्मी आक्रमणकारियों के क्रूर अधिपत्य से भारत को मुक्त करवाने के उद्देश्य से गत 12 शताब्दियों तक निरंतर लड़े गये स्वतंत्रता संग्राम को धता बताकर देश का विभाजन स्वीकार करने वाली कांग्रेस के नेता, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे प्रखर राष्ट्रवादी हिंदू संगठन पर अंग्रेजों का साथ देने जैसे अनर्गल आरोप लगाने से बाज नहीं आते। संघ के पूर्व प्रचारक एवं वरिष्ठ पत्रकार श्री नरेन्द्र सहगल ने हाल ही में लिखी अपनी नई पुस्तक युग प्रवर्तक स्वतंत्रता सेनानी डॉक्टर हेडगेवार का अंतिम लक्ष्य ‘‘भारतवर्ष की सर्वांग स्वतंत्रता’’ में संघ विरोधी स्वार्थी तत्वों को तथ्यपरक उत्तर दिया है। पुस्तक के लेखक ने प्रमाणों सहित ब्यौरा दिया है कि संघ संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार तथा संघ के स्वयंसेवकों ने सशस्त्र क्रांति से लेकर प्रत्येक अहिंसक सत्याग्रह में अग्रणी भूमिका निभाई थी। अपने तथा संगठन के नाम से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में संघ के स्वयंसेवकों ने पूज्य महात्मा गांधी के नेतृत्व में आयोजित सभी आंदोलनों में बढ़चढ़ कर भागीदारी की थी। स्वयं डॉक्टर हेडगेवार ने 2 बार लम्बे कारावास में यातनाएं भोगीं थी।

बोलचाल की सरल भाषा में लिखी गई 270 पृष्ठों की इस पुस्तक के 17 अध्यायों में सर्वांग स्वतंत्रता की सम्पूर्ण कल्पना को स्पष्ट किया गया है। सन् 1925 की विजयादशमी पर स्थापित संघ के संस्थापक एवं आद्य सरसंघचालक डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार कभी भी खंडित भारत की आधी अधूरी स्वतंत्रता के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने तो सनातत वृहत्तर भारत के दिव्य स्वरूप की कल्पना करते हुए एक शक्तिशाली हिन्दू संगठन की आवश्यकता को समझा और हिन्दू राष्ट्र को परम वैभव पर पहुंचाने के परम उद्देश्य से संघ को ¬प्रारम्भ किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अर्थात राष्ट्र की सर्वांग स्वतंत्रता को प्राप्त करने के लिए हिन्दू स्वतंत्रता सेनानियों का राष्ट्रव्यापी संगठन। इस पुस्तक के लेखक ने स्पष्ट किया है कि बाल्यकाल से लेकर जीवन की अंतिम श्वास तक डॉक्टर हेडगेवार भारतवर्ष की सर्वांग स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत रहे। देश को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के शिकंजे से स्वतंत्र करने के लिए किये जा रहे प्रत्येक संघर्ष का डॉक्टर जी ने न केवल समर्थन ही किया था अपितु एक देशभक्त नागरिक के नाते उनमें भाग लेने का आदेश भी स्वयंसेवकों को दिया।

‘नहीं चाहिए पद, यश, गरिमा सभी चढ़ें मां के चरणों में’ के आदर्श पर अटल रहते हुए डॉक्टर हेडगेवार ने न तो अपनी आत्मकथा लिखी और न ही समाचार पत्रों में नाम तथा फोटो छपवाने के निम्नस्तरीय प्रयास ही किये। आत्म प्रसिद्धि से कोसों दूर रहकर देश की स्वतंत्रता के लिए अपने समस्त जीवन को तिल-तिल कर जलाने वाले डॉक्टर हेडगेवार एक ऐसे महान परन्तु अज्ञात स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने लाखों युवकों को अखंड हिन्दू राष्ट्र की पूर्ण स्वतंत्रता के लिए जीवन की आहूति देने के लिए तैयार कर लिया था।

‘भारतवर्ष की सर्वांग स्वतंत्रता’ नामक इस पुस्तक में तत्कालीन सरकारी गुप्तचर विभाग की रपटों का हवाला देकर बाकायदा तथ्यों के आधार पर जानकारी दी गई है कि किस प्रकार डॉक्टर हेडगोवार ने सभी प्रमुख क्रांतिकारियों, अनुशीलन समिति, आर्यसमाज, हिन्दू महासभा, अभिनव भारत, आज़ाद हिंद फौज तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं से भी गहरे सम्बंध बनाए हुए थे। वे तो स्वतंत्रता संग्राम के महानायक पूज्य महात्मा गांधी के भी सजीव सम्पर्क में थे। डाॅक्टर हेडगेवार प्रत्येक मार्ग एवं माध्यम से देश को स्वतंत्र करवाने के पक्षधर थे। उन्होंने तो 1915 में ही अर्थात प्रथम विश्व युद्ध के समय अंग्रेज हुकूमत को देश व्यापि विप्लव के माध्यम से उखाड़ फेंकने की पूरी तैयारी कर ली थी। देश के प्रत्येक प्रांत के प्रमुख नगरों में क्रांतिकारियों को शस्त्रों सहित तैयार कर दिया गया था। परन्तु उस समय के अग्रणी कांग्रेसी नेताओं का सहयोग ना मिलने से यह प्रयास सफल नहीं हो सका। इस पुस्तक के लेखक श्री नरेन्द्र सहगल ने तत्कालीन प्रबुद्ध लेखकों एवं सामाजिक नेताओं के हवाले से यह भी लिखा है कि यदि एक कट्टटरपंथी ईसाई अंग्रेज ए.ओ. ह्यूम ने 1857 के समय उभर कर आए हिन्दुत्व अर्थात सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को दबाने के उद्देश्य से कांग्रेस की स्थापना ना की होती तो देश 1915 में ही आजाद हो गया होता और भारत का विभाजन भी नहीं होता और वर्तमान भारत में स्वदेश, स्वदेशी, स्वशिक्षा, स्वधर्म, स्व-अर्थतंत्र इत्यादि भी पश्चिम के अंधानुकरण से मुक्त होते।

1940 में अपने देहावसान के पूर्व ही उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध की भविष्यवाणी कर दी थी। इस अवसर पर देश को स्वतंत्र करवाने के लिए देशव्यापि महाक्रांति के माध्यम से अंग्रेज हुकूमत पर एक सशक्त प्रहार करने की योजना तैयार की थी। इस योजना की सम्पूर्ण रूपरेखा सुभाष चंद्र बोस तथा वीर सावरकर के साथ मिलकर तैयार करने के स्पष्ट संकेत डॉक्टर जी के साथियों के लेखों तथा सरकारी गुप्तचर विभाग की खास रपटों में मिलते हैं? आजाद हिंद फौज का निर्माण, भारतीय सेना में विद्रोह, अभिनव भारत, हिंदू महासभा तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पूरी तैयारी को ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री एटली ने भी स्वीकार किया है। इस देशव्यापि बगावत से डरकर ही अंग्रेजों ने भारत छोड़ने का फैसला किया और कांग्रेस के नेताओं की सहमति से भारत माता के एक हाथ को काट कर उसका ‘पाकिस्तान’ बनाकर चले गए। इस पुस्तक के लेखक ने पूछा है कि भारत का विभाजन स्वीकार करने से पहले कांग्रस ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, आर्यसमाज, आज़ाद हिंद फौज, हिंदू महासभा एवं क्रांतिकारी संगठनों से सलाह मशवरा क्यों नहीं किया? सबका सहयोग लिया होता तो देश का विभाजन रुक सकता था। ज्वलंत प्रश्न यह भी है कि बूढ़े हो चुके कांग्रेस के नेताओं ने स्वतंत्रता संग्राम की बागडोर युवा पीढ़ी के हाथों में क्यों नहीं सौंपी? ‘‘विभाजन मेरी लाश पर होगा’’, ऐसी घोषणा करने वाले महात्मा गांधी की इच्छा के विरुद्ध फैसला कैसे किया गया? क्या यह 1200 वर्षों तक निरंतर बलिदान देने वाले लाखों राष्ट्रभक्तों के साथ विश्वासघात नहीं है? अखण्ड भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले सुभाष चंद्र बोस, वीर सावरकर, डॉक्टर हेडगेवार जैसे सैकड़ों स्वतंत्रता सेनानियों के साथ धोखा किया है कांग्रेस के नेताओं ने।

अखण्ड भारतवर्ष की सर्वांग स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत सैंकड़ों संस्थाओं, हजारों क्रांतिकारियों, साहित्यकारों, राष्ट्रवादी लेखकों, संतों, महात्माओं को नकार कर सारे स्वतंत्रता संग्राम को एक ही नेता और एक ही दल के खाते में डाल देने की ऐतिहासिक साजिश ही नहीं, यह घोर अन्याय एवं अनैतिकता भी है।

1947 में खंडित भारत की खंडित स्वतंत्रता प्राप्त करके कांग्रेस ने तो स्वतंत्रता संग्राम को समाप्त करके सत्ता संभाल ली। परन्तु अखंड भारतवर्ष की सर्वांग स्वतंत्रता के अंतिम लक्ष्य के साथ डॉक्टर हेडगेवार द्वारा स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वतंत्रता संग्राम निरंतर गतिशील है। खंडित भारत की कथित आज़ादी के बाद संघ के स्वयंसेवकों ने कश्मीर, हैदराबाद, गोवा इत्यादि क्षेत्रों की स्वतंत्रता एवं सुरक्षा के लिए बलिदान दिए हैं। गोरक्षा अभियान, रामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन और 1975 में लगे आपातकाल के विरुद्ध जनसंघर्ष इत्यादि का सफल संचालन करके संघ ने अपने ध्येय के प्रति प्रतिबद्धता को जताया है। संघ का अंतिम पड़ाव भारतवर्ष का परम वैभव है। पुस्तक के लेखक के शब्दो में ‘‘अखंड भारत भारतीयों के लिए भूमि का टुकड़ा ना हो कर एक चैतन्यमयी देवी भारत माता है। जब तक भारत का भूगोल, संविधान, शिक्षा प्रणाली, आर्थिक नीति, संस्कृति, समाज रचना इत्यादि परसत्ता एवं विदेशी विचारधारा से प्रभावित एवं पश्चिम के अन्धानुकरण पर आधारित रहेंगे तब तक ‘भारतवर्ष की सर्वांग स्वतंत्रता’ पर प्रश्चचिन्ह लगता रहेगा। इस ध्येय को प्राप्त करने के लिए संघ जैसी संस्थाएं सतर्क व सक्रिय हैं। परिवर्तन की लहर चल पड़ी है। देश की सर्वांग स्वतंत्रता अवश्यम्भावी है।

लेखक ने भारतीय समाज के समक्ष महत्वपूर्ण तथ्य रखने का सफल प्रयास किया है।

  • अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संघर्ष को बल एवं दिशा प्रदान करने हेतु संघ ने अग्रणी भूमिका निभाई थी।
  • संघ ने अखंड भारत की सर्वांग स्वतंत्रता के लिए देश में युवा स्वतंत्रता सेनानी तैयार किये थे। संघ
  • तुष्टिकरण का सख्त विरोधी था तो आज भी है।संघ अपने घोषित उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए सदैव तत्पर एवं संघर्षरत रहेगा।