नफरत की आग लगाना सरल है लेकिन .. - डॉ. किशन कछवाहा

दिंनाक: 12 May 2018 15:44:41

भोपाल(विसंके). जहरीली सियासत की आंधी लगभग देश के अधिकांश हिस्सों में देखा जाना एक  अच्छा लक्षण नहीं माना जा सकता है. लोकतंत्र में बातों को और गंभीर समस्याओं को भी जनहित की दृष्टी से देखा जाता है, देखा जाना भी चाहिए. लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसुचित/ जनजाति के एक मामले में अपने फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. यह एक बात है. दूसरी और केंद्र सरकार ने एक पुनर्विचार याचिका भी पेश की जिसे न्यायालय ने स्वीकार भी कर लिया लोकतंत्र के अनुरूप न्यायलय की सख्ती और सरकार की संवेदनशीलता दोनों देखने को मिली यही तो लोकतंत्र की विशेषता और सुन्दरता है. लेकिन इस मामले को लेकर आगजनी तोड़-फोड़ देखने को मिले. यह आंधी नहीं अंधड़ था जिसे जानबूझकर अपनी राजनीति चलाने के लिए अंजाम दिया गया था. आखिर इस जहरीली सियासत की आंधी की क्या जरूरत थी, जिसे बेपरवाह लोगों ने, उत्पाती लोगों के समूहों ने सर पर उठा लिया था. हालांकि यह भी सच है कि जो ये उत्पाती समूह उन्माद से भरे सड़कों पर उतर आये थे उन्हें मालूम भी नहीं था कि आखिर कुल मिलाकर मामला क्या है ? और वे जो कर रहे हैं इससे फायदा क्या मिलेगा ? ये तथ्य तो उस समय सामने आये जब इन हुल्लड़ बाजों से पूछा गया कि वे क्या कोई आन्दोलन चला रहे हैं? उनका कहना था कि सरकार ने संविधान से आरक्षण समाप्त कर दिया है. इतनी बसें जलीं, तोड़ फोड़ हुई, हिंसक घटनाएँ घटी – लेकिन उन्हें यह भी पता नहीं था कि वे क्या कर रहे हैं. और क्यों कर रहे हैं ? मकान जले, दूकानें जलीं, दर्जन भर से अधिक लोग मारे गए, आवागमन में बाधा उत्पन्न होने का कारण  कुछ तो बिना दवा- अस्पताल के उपचार के बाद भी मौत के मुह में अचानक चले गए.

वंचितों का दर्द नहीं था, था तो सिर्फ कुर्सियां हथियाने का हथकंडा, ये सब लोग बाबा साहेब आंबेडकर के जीवन से कुछ सीख लेते तो आज दृश्य कुछ और ही होता ? लोकतंत्र पर धब्बे भी न पड़ते, न ही न्यायपालिका पर अंगुली उठती.

जहाँ तक कांग्रेस पार्टी का सवाल है उसने अपने पूरे के पूरे शासन काल में बाबा साहेब आंबेडकर के साथ न्याय नहीं किया कोई प्रश्न पूछ सकता है कि यह पार्टी अपने 60-70 साल के शासन में अनुसूचित जाती/जनजाति को वह स्थान क्यों न दे सकी जो उसके काबिल थी. गरीबी हटाओं के नारे के कारण कांग्रेस को सत्ता मिली थी. तब इतने लम्बे शासन काल में इस वर्ग की गरीबी को क्यों नहीं दूर किया जा सका ? आज जो कुछ किया जा रहा है, वह घडियाली आंसू की सिवाय कुछ नहीं है. यही हाल मायावती की पार्टी बसपा का भी है. जिसने इस वर्ग का जीवन नरकीय बनाए रखने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी. जो आज सर्वोच्च न्यायलय ने कहा है, वैसा ही तो सन 2007 में बसपा ने भी निर्देश दिया था उस समय मायावती ही प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं. आज समाज को बाटने की कोशिश में गठजोड़ हो रहे हैं, हाथ मिलाये जा रहे हैं.  नफरत की अंधी जल्द ही थमेगी, जनता उनके चेहरों की पहचान भी कर लेगी. वोट की खातिर आदमी कितना गिर सकता है. यह प्रकरण इस का उदहारण है. ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे. हे महात्मा गाँधी हे भगवान् बुद्ध, हे सुभाष, हे विवेकानन्द, इन्हें सद्बुद्धि दें ताकि, भारत भारत ही बना रह सके. इस समय देश में बाबा साहब को उनकी जयंती पर विभिन्न प्रकार के आयोजन आयोजित किये जा रहे हैं लेकिन इस प्रकार की उत्साही झलक भी नजर आ रही है. यह झलक और उत्साह भरा नजारा अच्छा है. लेकिन खतरनाक पहलु यह भी है कि इन आयोजनों के दौरान कतिपय स्वार्थ साधने में लगे राजनैतिक तिकड़मबाज और उसे हवा देने वाले उनके हिमायती नफ़रत की आग फ़ैलाने की कोशिशों में संलग्न हैं. इन परिस्थितियों में जबकि इसी माह दो बार देश में आग लगाने के प्रयास हुए हैं. ऐसे मौके पर बाबासाहब को जानना और उनकी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करना-कराना अत्यंत आवश्यक हो गया है. साथ ही पीढ़ियों से जो भारत के लिये समर्पित हैं, जिनकी नसों में समर्पण भाव दौड़ता है, वे तमाम ताकतें, लोग इस समय जागरूक और संगठित हों, ताकि अराष्ट्रीय प्रवृत्तियां देश की एकता को क्षति न पंहुचा सके.

साभार- महाकौशल सन्देश