मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर पर एकल संवाद- विजय मनोहर तिवारी

दिंनाक: 14 May 2018 17:35:15


भोपाल(विसंके).मिस्टर जिन्ना ने जब मुल्क को बांटकर दीवार खिंचवा दी तो दीवार के इस तरफ क्यों टंगे रहे? दीवार के उस तरफ ही तुम्हारी जगह होनी चाहिए थी। यहां जरूरत ही नहीं थी। हम ताे तस्वीरों और बुतों को मानने वाले लोग हैं। लेकिन तुम्हारी तस्वीर सिर्फ दीवार पर टंगी एक बेजान तस्वीर भर नहीं है। तुम भारत के दस हजार साल के ज्ञात इतिहास के भीषण मोड़ पर एक हादसे की तरह पेश आए । इस मुल्क के टुकड़े करने के गुनाह से कयामत तक बरी नहीं हो सकते। तस्वीर पर भले ही देर से ध्यान गया हो, यह किसी बहस या झगड़े का नहीं, भूल सुधार का मसला था। तुम्हारे नाम के मायने हैं एक तरह की सोच। बटवारे की सोच। विध्वंस की सोच। सियासत की आड़ में आतंक की जहरीली सोच। देश को बटवारे का दंश झेलने के बाद भी इस वैचारिक विष से छुटकारा नहीं मिला है। ये सोच तुम्हारी शक्ल में अब भी जिंदा है...

जानते हो 1857 की लड़ाई से लेकर 1947 में मुल्क के बटवारे के साथ आजादी मिलने तक के 90 साल भारत की तकदीर बदलने वाला दौर रहा है। हादसों और घटनाओं से भरे दौर में अनगिनत रतन हिंदुस्तान की कोख से पैदा हुए। आजादी हासिल करने की बेचैनी से भरा यह सिर्फ एक लंबा संघर्ष ही नहीं था। यह एक ऐसा महायज्ञ था, जिसमें देश के काेने-कोने में लोगों ने अपने प्राणों की आहुतियां दीं। किसी समय तक तुम भी उसी आजादी के दीवाने थे। फिर सियासत ने रंग दिखाए। हुकूमत के सवाल उठे। तुम कड़वाहट से भरे। इतनी कि कुछ भी कर गुजरो...

आजादी के वे लड़ाके पुरातत्व के कोई जानकार थे। वे जानते थे कि एक हजार साल की गुलामी राख और धूल की बेहिसाब परतों के नीचे कुछ है। कुछ जिंदा है। कुछ बचा हुआ है। वे 90 साल तक लगातार खुदाई करते रहे। खोदते रहे। मरते रहे। खोदते रहे। मरते रहे। 15 अगस्त 1947 की सुबह यह उत्खनन पूरा हुआ और वे भारत माता की भूली बिसरी सी एक महान प्रतिमा निकाल पाने में सफल हुए, जो बदहवास, धूल-धूसरित, पीड़ित, अपमानित किंतु जीवित थी...

भारत में लादी हुई गुलामी बहुत भारी पड़ी थी। दमन और जोर-जबर्दस्ती के दिल दहला देने वाले दौर भारत ने देखे और भुगते थे। देश के कोने-कोने में भयावह कहानियां मौजूद थीं। धर्म, कला, साहित्य, संस्कृति और स्थापत्य के हमारे प्राचीन मान बिंदुओं को जगह-जगह तहस-नहस किया गया था। ताकत के जोर पर हमारी पहचानें बदलकर रख दी थीं। समय की धूल सिर्फ तोड़फोड़कर छोड़ दिए गए भव्य स्मारकों के खंडित पत्थरों पर ही नहीं पड़ी थी, वह हमारी याददाश्त पर भी जम चुकी थी। देश के आजादी की दहलीज पर आते-आते तुमने अपने गुस्से में भटकी हुई याददाश्त को और गुमराह करने का गुनाह किया। मजहब के नाम पर एक अलग मुल्क का ख्याल उन बेरहम सुलतानों, बादशाहों, निजाम और नवाबों के क्रूर सिलसिले में हिंदुस्तान की रूह पर सबसे बड़ा जख्म था, जो अब तक रिस रहा है...

तुम पर वीरेंद्र कुमार बरनवाल की एक लाजवाब किताब है-जिन्ना एक पुनर्दृष्टि। तुम्हारे हिंदू पुरखों की बढ़िया पड़ताल है इसमें। सिर्फ दो पीढ़ी पहले कोई पुंजाभाई वालजी ठक्कर का जिक्र है। तुम्हारे परदादा। काठियावाड़ का ठक्कर परिवार श्रीनाथजी का भक्त था। राजकोट में पंुजाभाई ने इस्मायली धर्मगुरू आगा खां के अनुयायी बनकर इस्लाम कुबूल किया तो घर में हंगामा मच गया था। तुम्हारी मां मिट्‌ठूबाई और बुआ का नाम मानबाई यही जाहिर करते हैं कि वे अरब या अफगानिस्तान से नहीं आए थे अौर न ही यहां कोई दस-बीस पीढ़ी पहले अपनी बल्दियत बदली थी। अपने मूल मजहब की यादें दिमाग में बहुत ताजा होंगी। पूरी तरह पश्चिम के रंग में रंगे तुम तो एक काबिल और कामयाब बेरिस्टर थे। निजी तौर पर मजहब से कोई लेना-देना नहीं था। इस्लाम में वर्जित लगभग हर चीज के बेइंतहा शौकीन थे तुम...

पाकिस्तान का भूत दिमाग में उतरते ही कैसे तुमने रंग बदला। टाई-सूट से सीधे शेरवानी और मखमली टोपी पर उतर आए। हालांकि इस नए कलेवर में कई किस्से भी मशहूर हैं। एक बार किसी मस्जिद में ले जाए गए थे। वहां सीधे जूते पहने दाखिल होने लगे तो शेरवानी-टोपी की तजुर्बेकार लीगी जमात वाले किसी साहब ने टोका था-जिन्ना साहब यहां जूते पहनकर नहीं जाते। सबको मालूम है मुस्लिम लीग रईस सामंतों की एक सियासी जमात थी और तुम्हारे लिए यह एक हिट फिल्म के सेट जैसी थी, जिसके लीड रोल में तुम साइन कर लिए गए थे। अब तुम एक ऐसे हिंदुस्तानी नहीं रहे थे, जो आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों से भिड़ रहा है। पाकिस्तान की स्क्रिप्ट तुम्हारे हाथ में और डायलॉग तुम्हारी जुबान पर आ गए...

चाहते तो मुस्लिम लीग के मजहबी सेट से बहुत बेहतर रोल प्ले कर सकते थे। अगर उन्हें हिंदुस्तान की न सही, हिंदुस्तान के मुसलमानों की ही बेहतरी की फिक्र होती तो भी ऐसा नहीं करते, जो उन्होंने किया। मगर उनके लिए अपनी जिद और साख किसी भी कौम और मुल्क से बड़ी थी। कांग्रेस की सियासत में अगर वे खुद को दरकिनार मानते थे तो यह इतनी बड़ी बात तो नहीं ही हो सकती थी कि मुल्क के बटवारे के भयानक नतीजे तक जाती...
तुर्की में कमाल मुस्तफा पाशा तुम्हारे ही वक्त में हुकूमत में आए थे। तुर्की एक मुस्लिम देश है और इस्लाम के चरण कमल भारत से पहले वहां की जमीन पर ही पड़े। एक हजार साल बाद तुर्की अपनी मूल पहचान खो चुका था। पाशा ने तुर्की भाषा, सभ्यता और संस्कृति की फिक्र की। वे तुर्की के पहले सर्वमान्य नेता थे, जिन्होंने खलीफा के पद को खत्म कर अपने देश को मूल पहचान की तरफ लौटाया। 1923 में तुर्की की सत्ता संभालने के बाद एक के बाद एक कई सुधार किए। इस्लामी मुल्कों की बदहाली और बरबादी से फिक्रमंद हर दानिशमंद को इस पर गौर करने की जरूरत है। पाशा ने इस्लामिक की जगह तुर्की को सेकुलर स्टेट बनाया। इसके लिए कॉमन सिविल कोड लागू किया। इस्लामिक कैलेंडर, मजहबी तालीम, मदरसों और परदा प्रथा पर बंदिश लगाई...

सबसे बड़ा काम तुर्की भाषा की सफाई का किया। सिर्फ सात महीने में तुर्की भाषा से अरबी और फारसी के शब्द छांट-छांटकर हटाए गए। अरबी लिपि के इस्तेमाल पर रोक लगाई। यहां तक कि कुरान का तर्जुमा तुर्की में कराया और 1932 में पहली बार मस्जिदों में तुर्की में नमाज शुरू हुई। अल्लाह शब्द का भी तुर्की अनुवाद किया-तानरी। शरिया अदालतें हमेशा के लिए बंद कर दी गईं। निकाह की जगह सिविल मैरिज को मान्यता दी। साप्ताहिक अवकाश शुक्रवार की जगह रविवार तय किया। नई मस्जिदों के निर्माण पर रोक लगाई और मौजूदा 70 हजार मस्जिदें सरकारी निगरानी में लेकर आए। मजहबी मामले शिक्षा विभाग का विषय बनाए गए। कट्‌टरपंथी मुस्लिमों अौर मुल्ला-मौलवियों ने उनका विरोध किया मगर जनता के जबर्दस्त समर्थन से ही वे यह कमाल कर पाए। 1938 में आखिरी सांस लेने के पहले सिर्फ 15 साल में तुर्की एक नायाब मुल्क के रूप में दुनिया के सामने आया। जनता ने कमाल को प्यार से अपना अतातुर्क कहा, तुर्की में इसका अर्थ है-राष्ट्रपिता। ध्यान रहे, इन क्रांतिकारी प्रयोगों में पाशा ने इस्लाम को नहीं छोेड़ा। उन्होंने कहा-इस्लाम हमारा मजहब रहेगा मगर हम यह न भूलें कि हम तुर्की भाषी और तुर्की संस्कृति के लोग हैं...

तुम्हें पता नहीं कैसा लगा होगा यह देखकर कि जब पाशा तुर्की में एक राष्ट्र का कायाकल्प इस ढंग से कर रहे थे तब भारत के मुसलमानों की बेहतरी के लिए हमारे अतातुर्क महात्मा गांधी के दिमाग में खिलाफत आंदाेलन का ख्याल आया और पूरे भारत में मुस्लिमों को खुश करने के लिए तुर्की में खत्म हुए खलीफा के पद की वकालत यहां करने बैठ गए। तुम भी अपने पाकिस्तान के अतातुर्क बने। तुमने ठीक इसी दौर में अपनी साम्प्रदायिक सियासत को चमकाने के लिए नारा दिया था-इस्लाम खतरे में है। बेपढ़े-लिखे मजहबी मुसलमानों में यह जंगल में आग की तरह फैल गया था। 1946 में बंगाल में डायरेक्ट एक्शन का हुक्म मखमली टोपी से सजे माथे पर लगा एक और कलंक है, जब अनगिनत हिंदुओं का कत्लेआम किया गया। यह सियासत नहीं थी। यह गुंडागर्दी थी। यह दहशत थी। और यह कराने वाले तुम कोई दहशतगर्द नहीं बल्कि एक बेरिस्टर थे। बदकिस्मती से अपनी कौम के रहनुमा...

हिंदी के प्रति तुम्हारी नफरत के कहने -1937 में कांग्रेस सरकारें आठ प्रांतों में बनी थीं। स्कूलों में हिंदी की पढ़ाई अनिवार्य की थी। तुम और तुम्हारी मुस्लिम लीग ने वायसराय को मुस्लिमों के प्रति ज्यादती की एक फेहरिस्त सौंपी। इसमें मुसलमानों को हिंदी पढ़ाने का मुद्दा भी शामिल था। हैरत है कि तुम्हारी निगाह में हिंदी को हिंदुओं और ऊर्दू को मुसलमानों की भाषा नजर आती थी। जबकि तुम खुद ऊर्दू नहीं जानते थे। यह तुम जैसी काबिल और एक शानदार शख्सियत में एक धर्मद्रोही, राष्ट्रद्रोही और भाषाद्रोही का घृणित घालमेल था, जिन्होंने स्वतंत्र भारत की चेतना में सांप्रदायिकता का गाढ़ा जहर घोला। बदकिस्मती से बचा-खुचा भारत भी उस अभिशाप से खुद को मुक्त नहीं कर पाया...

सिर्फ भारत के टुकड़े करने का ही गुनाह मखमली माथे पर नहीं है, अपनी ही कौम को गलत रास्ते पर गाफिल करने के और बड़े गुनहगार हो तुम। जेएनयू में भारत के टुकड़े करने के नारे उसी के विष बीज हैं। हालांकि टीबी से मरने के पहले तुम्हें अपने ख्वाबों की जन्नत पाकिस्तान में अपनी जिंदगी की सबसे भयानक भूल का अहसास भी हो ही गया था। अपने डॉक्टर से तुमने ही कहा था-पाकिस्तान मेरी सबसे बड़ी भूल थी। मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी...

तुम तो कब्र में जा सोए। तुम्हें कब्र पर आकर अब मणिशंकर अय्यर थोड़े ही बताएंगे कि अलग मुल्क बनने के बाद पाकिस्तान में बचे करीब 20 फीसदी हिंदुओं का 70 साल में सर्वनाश ही हो गया। वे बांग्लादेश में भी विलुप्त होेने की कगार पर हैं। और हां, उत्तरप्रदेश में मुस्लिम लीग की गतिविधियों का सबसे चहलपहल भरा केंद्र अलीगढ़ ही था। 1914 में लीग का मुख्यालय अलीगढ़ से लखनऊ रुखसत हो गया। बटवारे के बाद बचे-खुचे भारत के अलीगढ़ नाम के उसी शहर में एक यूनिवर्सिटी अब तक तुम्हारी तस्वीर को छाती से लगाए बैठी रही...