टीपू सुल्तानी सोच व हिंदू -लिंगायत विभाजन की पराजय - प्रवीण गुगनानी

दिंनाक: 15 May 2018 15:43:08


भोपाल(विसंके).कर्नाटक विधानसभा चुनाव के संदर्भ में एक बात बड़ी ही स्पष्ट दिख रही थी; और वह यह थी कि कांग्रेस इस चुनाव को अपना अंतिम किला बचाने की लड़ाई के रूप में देख रही थी और भाजपा इस चुनाव में कर्नाटक को अपने दक्षिणी राज्यों में प्रवेश का स्वागत द्वार बनाने हेतु संघर्ष कर रही थी. दलबदल करके कांग्रेस में आये व मुख्यमंत्री बने सिद्धारमैया ने भाजपा के दक्षिण भारत के प्रवेश द्वार कर्नाटक को पूरे दक्षिण के संयुक्त अभेद्य किले में बदलने की कोशिश इन विधानसभा चुनावों में की है. गत दिनों आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से बाहर होने व मोदी से अलग होने से भी सिद्धारमैया की योजना को बल मिल रहा था. सिद्धारमैया ने बड़ी ही कुटिलता से इस विधानसभा चुनाव को विकास और धर्म दोनों के मुद्दे पर भाजपा को पटकनी देनें की योजना बनाई थी. सिद्धारमैया ने टीपू सुल्तान प्रकरण के समय पर पुरे प्रदेश में चुनावी चालें चलते हुए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने की प्रयास किया था. कांग्रेस की और गांधी परिवार की एतिहासिक व सिद्ध चुनावी रणनीति रहे नियम “हिंदू-हिंदू विभाजन” का क्रियान्वयन भी उन्होंने लिंगायतों को हिन्दूओं से अलग करने का निर्णय लेकर किया. वर्ष 2008 में जब कर्नाटक में येदिरुप्पा के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनी थी तब यह माना जा रहा था कि लिंगायत समुदाय के एकतरफा मतदान से भाजपा को सरकार बनाने में बड़ी मदद मिली है. इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए ही सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने लिंगयातों को हिंदू धर्म से अलग करने की चाल चली व इस शक्तिशाली समुदाय को अल्पसंख्यक वर्ग को मिलने वाले लाभों की लालीपाप दिखाकर घृणित राजनीति की. सिद्धारमैया जैसे दलबदलू, अल्पकालिक राजनीति वाले व्यक्ति के लिए तो यह ठीक था किंतु जिस दौर से कांग्रेस गुजर रही है, उस दौर में कांग्रेस का इस प्रकार का कदम उठाना, आत्महत्या जैसा ही सिद्ध होगा. कांग्रेस यहीं आकर नहीं रुकी उसने मस्जिदों से मुस्लिम समुदाय हेतु फतवे भी जारी करवाए.


          सिद्धारमैया ने कर्नाटक में जो भी रणनीति अपनाई उस सब के पीछे उनके मानस पर लगातार मोदी और अमित शाह की रणनीति हावी दिखी. वे घबराए घबराए से उल्टे पुल्टे निर्णय लेते रहे. इस रणनीति के पीछे सिद्धारमैया के मन में नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय छवि का भय जरूर रहा, जिसके आधार पर मोदी किसी भी राज्य के विपक्षी मुख्यमंत्री को एक झटके में चुनावी रणनीति, विमर्श व जनचर्चा से बाहर कर देते हैं. पुरे चुनावों के दौरान सिद्धारमैया ने पूरी तरह से कर्नाटक के चुनावों को भावनात्मक आधार पर लड़ने की कोशिश की. भावनात्मक आधार पर  सिद्दरमैया की चुनाव लड़ने की पूरी तैयारी चरणबद्ध तरीके से हुई. उन्होंने कन्नड़ बनाम हिंदी का मुद्दा भी गर्म किया. मेट्रो रेल व सरकारी कार्यालयों से हिंदी के बोर्ड हटाने, उन पर कालिख पोतने का काम उसी योजना का सबसे महत्वपूर्ण भाग रहा है.  जबकि ऐतिहासिक तौर पर तमिल-हिंदी संघर्ष के दौर में भी कन्नड़ कभी बहुत ज्यादा शामिल नहीं हुए हैं.  सिद्दारमैया ने देश के सबसे आधुनिक शहरों व प्रगतिशील किंतु देश व परम्परा प्रेमी बेंगलुरु में ही क्षेत्रीय अस्मिता को मुद्दा बना दिया. कर्नाटक को उसका हिस्सा नहीं मिल रहा है, यह दूसरा बड़ा दांव था, तीसरा बड़ा दांव था, लिंगायत को अल्पसंख्यक बनाकर हिंदू धर्म से अलग करना और चौथा चरण था-टीपू सुल्तान को कर्नाटक के स्वाभिमान से जोड़ने की कोशिश करके मुसलमानों को पूरी तरह से अपने साथ ले आना.  

               राहुल गांधी ने जिस प्रकार कर्नाटक चुनाव को 2019 के लोकसभा चुनवों में कांग्रेस की जीत का प्रारम्भिक चरण बताया था वह दावा तो बेहद हास्यास्पद सिद्ध हुआ. राहुल गांधी सम्पूर्ण चुनावी विमर्श में प्रभावहीन रहे व जनता को कतई आकर्षित नहीं कर पाए. इस स्थिति के चलते सिद्धारमैया ने भी अंदरूनी रणनीति बदलते हुए राहुल गांधी से भरोसा हटाते हुए स्वयं को कन्नड़ स्वाभिमान के रूप में प्रस्तुत करना प्रारम्भ कर दिया था. सिद्धारमैया इस रणनीति के तहत राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस के मुख्यमंत्री नहीं बल्कि क्षेत्रीय पार्टी के मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत होने लगे. सिद्धारमैया ने फिल्म अभिनेता प्रकाश राज का भी खूब उपयोग किया. गौरी लंकेश से लेकर टीपू सुल्तान तक के अनेकों मुद्दों पर वे प्रकाशराज से मोदी व अमित शाह की जोड़ी पर हमले करवाते रहे. इस रणनीति के अंतर्गत सिद्धारमैया ने प्रसिद्द अभिनेता गिरीश कर्नाड का भी भद्दा उपयोग किया था. गिरीश कर्नाड ने भी कर्नाटक के इतिहास की अनदेखी करते हुए कहा था की बेंगलुरु के अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम केम्पेगौडा टर्मिनल से बदलकर टीपू सुलतान के नाम पर कर दिया जाना चाहिए. यद्दपि एक दिन में ही गिरीश कर्नाड को अपनी गलती का आभास हुआ था और वे अपने बयान से पलट गए. कर्नाटक गौरव के रूप में स्थापित कैम्पेगौड़ा वंश व विजयनगर साम्राज्य को उपेक्षित करने व टीपू सुल्तान जैसे क्रूर शासक व हिंदू संहारक को महिमामंडित करने की जो घृणित राजनीति कांग्रेस ने बेंगलुरु हवाई अड्डे के नाम पर की उस कुत्सित राजनीति को वह समूचे राज्य में चला रही थी. यह भी इतिहास सिद्ध ही है कि कांग्रेस इस रणनीति को कोई पहली बार नहीं अपना रही वह सदा से सांप्रदायिकता को उभारकर मुस्लिम मतदाताओं से  एकमुश्त मतदान अपने पक्ष में कराने की अभ्यस्त रही है.

        अब रही भारत के दक्षिण प्रदेशों की बात तो देश के इन भागों में भारत का दक्षिणी और पूर्वी राज्य आते हैं. ये क्षेत्र भाजपा के लिए सूखे क्षेत्र की तरह ही रहें हैं. इस क्षेत्र में एक लम्बे समय से संघ व भाजपा संघर्ष कर रहे थे. पिछले वषों में उत्तर-पूर्व में  भाजपा को प्रथम बार स्वीकार्यता प्राप्त हुई है.  असम और मणिपुर से प्रारम्भ हुई यह विजयगाथा भविष्य में सुनहरी होती दिख रही है. दक्षिण भारत के प्रतिनिधि राज्य कर्नाटक में भाजपा के मोदी को मिली यह स्वर्णिम विजय दक्षिण भारत की 131 लोकसभा सीटों पर मोदी का खाता नए सिरे से खोलेगी!! यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी की कर्नाटक दक्षिण भारत हेतु भाजपा का स्वागत द्वार बन कर उभरा है. और इस लेख की समाप्ति निश्चित तौर पर एक अलग विषय पर जाकर करूँगा, जो इस देश का आगामी विमर्श है, वह यह कि कर्नाटक में योगी आदित्यनाथ में 33 सीटों पर चुनावी अभियान चलाया और उन 33 में से 33 सीटों पर भाजपा विजयी रही.