खबरें जिन पर झूठ चिपकाकर देश का माहौल बिगाड़ा गया -रमेश शर्मा

दिंनाक: 16 May 2018 16:01:46


भोपाल(विसंके). भारत में जिस तरह साहित्य के पुरुस्कार लौटाकर दबाव बनाने वाले समूह है उसी प्रकार मीडिया में भी एक वर्ग है जो सरकार के बारे में यह बात फैला रहा है कि सरकार मीडिया की स्वतंत्रता से दबाने की कोशिश कर रही है। जबकि हकीकत कुछ और है।
देश में पिछले कुछ दिनों से खबरें ही देश का माहौल बिगाडऩे, तनाव फैलाने और सामाजिक समरसता खत्म करने का काम कर रहीं है। खबरें जिन घटनाओं से जन्म लेती हैं वे घटनाएं झूठी नहीं है, घटनाएं तो घटती हैं लेकिन उनपर फ्रेम झूठ का होता है। विवरण और व्याख्या पूरी झूठी होती है। अब यह झूूठा फ्रेम कौन चढ़ाता है यह बात आज तक सामने नहीं आई। लेकिन इन खबरों की प्रतिक्रिया केवल जुबानी जुगाली तक ही सीमित नहीं रहती बल्कि कहीं कहीं तो सशस्त्र और हिंसात्मक प्रतिक्रियाएं भी देखी गई हैं।

अब कुछ खबरों का नमूना देखिए जिनपर पूरे देश में उठा पटक हुई। ऐसी खबरों के लिए हर जगह का इस्तेमाल हुआ है। मंदिर का, ट्रेन का, सामाजिक-धार्मिक उत्सव का, यहां तक की सुप्रीम कोर्ट तक को नहीं छोड़ा गया।  सुप्रीम कोर्ट के दो फैसले। जो प्रचारित हुआ उस पर तो विचार ही नहीं हुआ। एक फैसला अनुसूचित जाति कानून के दुरुपयोग से संबंधित आया। वस्तुत: एक प्रकरण ऐसा आया जिसमें पीडि़त पक्ष का कहना था कि उसे झूठा फंसा दिया गया। जांच में शिकायत सही पाई गई। माननीय न्यायालय ने केवल इतना कहा कि सरकार देखे कि किसी को इस कानून के दुरुपयोग से प्रताडऩा न मिले।  लेकिन ऐसा प्रचार हुआ मानों सरकार आरक्षण का कानून बदल रही हो। पक्ष और विपक्ष में पूरे देश में लामबंदी। हालांकि मीडिया और सोशल मीडिया पर इसके समर्थन और विरोध में अब भी बयानबाजी हो रही है लेकिन पूरा अप्रैल माह तनाव भरे प्रदर्शन में बीता। कहीं कहीं तो तोड़ फोड़ और हिंसा भी हुई।
आरक्षण से ही संबंधित एक बयान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक श्री मोहन भागवत का आया। उन्होंने कहा कि ''जब तक सामाजिक असमानता है तब तक आरक्षण रहना चाहिए। लेकिन मीडिया में आया कि 'आरक्षण के कारण सामाजिक असमानता बढ़ी है। उनका बयान इस प्रकार छपने की प्रतिक्रिया लंबी चली। हालांकि संघ की ओर से अधिकृत खंडन जारी हुआ लेकिन वह या तो छपा नहीं और यदि छपा तो बहुत रुस्मी तौर पर।
तीसरी खबर थोड़ी पुरानी है लेकिन वह भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले से संबंधित है। देश के पांच अलग अलग स्थानों की पांच मुस्लिम महिलाओं की याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में पहुंची। इसमें इस्लाम के एक प्रावधान  'तीन तलाक के दुरुपयोग की शिकायत थी। न तो सुप्रीम कोर्ट ने शरियत के प्रावधान की चर्चा की और न शिकायत में किसी प्रकार के बदलाव का जिक्र था। एक ही वक्त में तीन तलाक कहना, टेलीफोन पर, वाट्सअप पर या पत्र से तीन तलाक देना इस्लाम के तलाक सिद्धांत के विपरीत है। सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वयं को यहीं तक सीमित रखा और  दुरुपयोग रोकने के लिए सरकार को कहा। लेकिन  देश में ऐसा प्रचारित हुआ कि मानों सरकार और कोर्ट शरियत के मूल प्रावधान में हस्तक्षेप कर रही है। इसको लेकर यदा कदा आज तक बयानबाजी हो रही है, जलसे जुलूस और सभाएं चल रही है। पिछले कुछ दिनों से समाज में जो भाई चारा बढ़ा था वह इस खबर केे ऊपर चढ़ाएं गए झूठ के फ्रेम ने मिटाकर रख दिया।
चौथी खबर गुजरात से आई। कहा गया कि दलित की बारात जा रही थी। दूल्हा घोड़े पर था। उसे उतारकर मारपीट की गई। खबर की प्रतिक्रिया पूरे देश में हुई। बाद में पता चला कि दूल्हे को उतारकर मारपीट तो हुई लेकिन वह  उन्हीं दोनों पक्षों के बीच अंदरुनी विवाद के कारण। इसका किसी दूसरे से कोई लेना देना नहीं। लेकिन इस खबर ने सनातनी समाज के ताने बाने पर कितना असर डाला इसे आसानी से समझा जा सकता है।
पांचवी खबर एक ट्रेन के जनरल डिब्बे में मारपीट को लेकर थी। झगड़ा सीट को लेकर हुआ लेकिन खबरों में आया कि 'वीफ' के शक में मारपीट हुई और यदि झगड़े का कारण 'वीफ' है तो 'बजरंगियों का नाम आना स्वाभाविक है। कहीं तो बकायदा संगठन का नाम भी आया।
छठी खबर इन दिनों भी सुर्खियों में है। यह खबर कठुआ से आई। यहां एक मंदिर के बरामदे में आठ साल की एक लड़की की लाश मिली जांच में पता चला कि उसके साथ आठ दिनों तक बलात्कार हुआ। खबर में आया कि मंदिर के तलधर में हिंदुओं ने आठ दिनों तक बलात्कार किया और तलघर में बांधकर रखा। खबर में यह बात प्रमुखता से कि लड़की मुसलमान थी इसमें पहला तो उस मंदिर में तलघर है ही नहीं। दूसरी बात जिस सबेरे बरामदे में लाश मिली उससे पहली रात कठुआ में अचानक लाइट गुल हो गई थी संभावना है कि षडय़ंत्र के तहत अंधरा करके लाश फेकी गई। तीसरी बात हमेशा ऐसी खबरों में लड़की की पहिचान नहीं बताई जाती। यहां बाकायदा ऐसा प्रचार हुआ मानों उसे इलाके में हिंदुओं का आतंक हो। जबकि उस क्षेत्र में हकीकत क्या है यह किसी से छिपा नहीं है। इस खबर ने देश के भीतर माहौल तो बिगाड़ा ही। देश के बाहर भी भारत की छवि खराब की। पाकिस्तान का मीडिया तो मानों पिल पड़ा। अमेरिका तक से प्रतिक्रिया आई।
सातवी खबर होली पर दिल्ली से आई कि कुछ छात्राओं ने शिकायत की कि उन पर 'सीमन' भरे गुब्बारे फेके गए।  गुब्बारों में जितना कथित 'सीमन' भरा था उतना तो केवल 'सीमन्स बैंक से ही मिल सकता है बावजूद इसकी पड़ताल किए बिना खबर सुर्खियों में रही। बाद में जांच से पता चला कि गुब्बारे में भरा गया केमिकल एक 'खाद्य-पेस्ट' था जिसे सीमन जैसा तैयार किया गया था।
आठवीं खबर इंदौर से भी। एक माडल ने 'टयूटर पर डाला कि  उसका दो मोटर सायकल वालों ने पीछा किया और छेड़छाड़ की खबर खूब मीडिया में आई और सरकार की कानून व्यवस्था पर हल्ला बोला गया। संयोग से जहां घटना घटी वहां एक दुकान पर सीसीटीवी कैमरा लगा था। उसके फुटेज से पता चला कि केवल एक्सीडेंट हुआ था। लड़के दो थे। उनकी गलती यह रही कि वे मोटर सायकल उठाकर भाग गए। फुटेज से जो हकीकत सामने आई। उसका विवरण कम आया।
दरअसल मीडिया में इन दिनों एक एक सेकंड की प्रतिस्पर्धा है। मीडिया की खबर के सत्यापन में समय लगाने का जोखिम हैं और शरारती तत्व उसी का लाभ उठाकर मीडिया का दुरुपयोग कर रहे हैं।