गंगा दशहरे का महत्व

दिंनाक: 24 May 2018 17:08:06


भोपाल(विसंके). हिन्दुओं का प्रमुख त्यौहार है. ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को दशहरा कहते हैं इसमें स्नान, दान, रूपात्मक व्रत होता है स्कन्दपुराण में लिखा हुआ है कि ज्येष्ठ शुक्ल दशमी संवत्सरमुखी मानी गयी है इसमें स्नान ओर दान तो विशेष करके करें. किसी भी नदी पर जाकर अर्ध्य (पुजादिक) एवं तिलोदक (तीर्थ प्राप्ति निमित्त्क तर्पण) अवश्य करें भविष्य पुराण में लिखा हुआ है कि, जो मनुष्य इस दशहरा के दिन गंगा के पानी में खड़ा होकर दस बार इस स्तोत्र को पढता है चाहे वो दरिद्र हो, चाहे असमर्थ हो वह भी प्रयत्नपूर्वक गंगा कि पूजा कर उस फल को पता है. यह दशहरा के दिन स्नान करने कि विधि  पूरी हुई स्कन्द पुराण का कहा हुआ दशहरा नाम का गंगा स्तोत्र ओर उसके पढने कि विधि-सब अवयवों से सुन्दर तीन नेत्रों वाली चतुर्भुजी जिसके कि चारों भुज, रत्न कुम्भ श्वेतकमल, वरद ओर अभय से सुशोभित है, सफ़ेद वस्त्र पहने हुई हैं. मुक्त मणियों से विभूषित है, सौम्य है, अयुत चंद्रमाओं कि प्रभा के सम सुखा वाली है जिस पर चामर डुलाये जा रहे हैं, बाल श्वेत छत्र से भली भांति शोभित है, अच्छी तरह प्रसन्ना है, वर को देने वाली है, निरंतर करुनाद्रचित्त हैं, भूपृष्ठ को अमृत से प्लावित कर रही हैं, दिव्य ही माल्य ओर अनुलेपन है ऐसी गंगा के पानी में ध्यान करके भक्तिपूर्वक मंत्र से अर्चना करें. ‘ॐ नमो भगवती हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे माँ पावय पावय स्वाहा’ यह गंगा जी का मंत्र है. इसका अर्थ है कि है भगवति गंगे ! मुझे बार-बार मिल, पवित्र कर, पवित्र कर, इससे गंगाजी के लिए पंचोपचार ओर पुष्पांजलि समर्पण करें इस प्रकार गंगा का ध्यान और पूजन करके गंगा के पानी में खड़े होकर ॐ अध्य इत्यादि से संकल्प करें कि ऐसे समय ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा से लेकर दशमी तक रोज-रोज एक बढाते हुए सब पापों को नष्ट करने के लिए गंगा स्तोत्र का जप करूँगा. पीछे स्तोत्र पढना चाहिए. इश्वर बोले कि आनंदरूपिणी आनद के देने वाली गंगा के लिए बारम्बार नमस्कार है.


दुनिया कि सबसे पवित्र नदियों में एक है गंगा. गंगा के निर्मल जल पर लगातार हुए शोधों से भी गंगा विज्ञान कि हर कसौटी  पर भी खरी उतरी विज्ञान भी मानता है. कि गंगाजल में कीटाणुओं को मारने कि क्षमता होती है जिस कारण इसका जल हमेशा पवित्र रहता है. यह सत्य भी विश्वव्यापी है कि गंगा नदी में एक डुबकी लगाने से सभी पाप धुल जाते हैं. हिन्दू धर्म में तो गंगा को देवी माँ का दर्जा दिया गया है. यह माना जाता है कि जब माँ गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हु तो वह ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि थी, तभी से इस तिथि को गंगा दशहरा के रूप में मनाया जाता है. कहा जाता है कि जिस दिन माँ गंगा पृथ्वी पर अवतरित ही इस दिन एक बहुत ही अनूठा ओर भाग्यशाली मुहूर्त था. उस दिन ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि ओर वार भुध्वर था, हस्त नक्षत्र, व्यतिपात योग, गर योग, आनद योग, कन्या राशि में चंद्रमा और वृषभ में  सूर्य इस प्रकार दस शुभ योग उस दिन बन रहे थे.

इस दिन यदि संभव हो तो गंगा मैया के दर्शन कर उसे पवित्र जल में स्नान करें अन्यथा स्वच्छ जल में ही माँ गंगा को स्मरण करते हुए स्नान करें. स्नानादि के पश्चात् माँ गंगा की प्रतिमा कि पूजा करें इनके साथ राजा भागीरथ ओर हिमालय देव कि भी पूजा अर्चना करनी चाहिए. गंगा पूजा के समय प्रभु शिव कि आराधना विशेष रूप से करनी चाहिए क्योंकि भगवान शिव ने ही गंगा जी के वेग को अपनी जटाओं पर धारण किया. पुराणों के अनुसार राजा भागीरथ ने माँ गंगा को स्वग्र से पृथ्वी पर लाने के लिए बहुत तपस्या कि थी. भागीरथ के तप से प्रसन्न होकर माँ गंगा ने भागीरथ की प्रार्थना स्वीकार की किन्तु गंगा मैया ने भागीरथ से कहा – ‘पृथ्वी पर अवतरण के समय मेरे वेग को रोकने वाला कोई चाहिए अन्यथा में धरातल को फाड़ कर रसातल में चली जाउंगी ओर ऐसे में पृथ्वी वासी अपने पाप कैसे धो पाएंगे. राजा भागीरथ ने माँ गंगा कि बात सुनकर प्रभु शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की. भागीरथ कि तपस्या से प्रसन्न होकर प्रभु शिव ने गंगा माँ को अपने जटाओं में धारण किया पृथ्वी पर अवतरण से पूर्व माँ गंगा ब्रह्मदेव के कमंडल में विराजमान थी. अतः गंगा मैया पृथ्वी पर स्वर्ग कि पवित्रता साथ लेकर आई थी. इस पावन अवसर पर श्रृद्धालुओं को माँ गंगा कि पूजा-अर्चना के दान पुण्य भी करना चाहिए. सत्तू मटका ओर हाथ का पंखा दान करने सेदोगुने फल कि प्राप्ति होती है.

‘नमो भगवते दश्पापहराये गंगाये नारायण्ये रेवत्ये शिवाये दक्षाये अमृताय विश्वरुपिण्ये नंदिन्ये ते नमो नमः’

हे भगवती, दस पाप हरने वाली गंगा, नारायणी , रेवती, शिव, दक्षा, अमृता, विश्वरूपिणी, नंदिनी को नमन.

साभार :- हिन्दू चेतना