परिधान में क्या रखा है - संस्मरण

दिंनाक: 24 May 2018 16:23:41


भोपाल(विसंके). यह बात सन 1961  की है जब दीनदयाल उपाध्याय अखिल भारतीय जनसंघ के महामंत्री हुआ करते थे. उसी दौरान उनका सहारनपुर के चंदौसी कालेज में स्वागत का एक कार्यक्रम रखा गया. हमारे अनुसार उनकी वेशभूषा उनके पद के अनुरूप नहीं थी. स्वभावत: वही एक धोती, कुर्ता ओर पैरों में कपड़ो का जुटा. वहां के व्यवस्थापकों को भी यह ठीक नहीं लगा. वे आनन फानन में बाजार गए और एक बढ़िया धोती-कुर्ता तथा एक नयी जोड़ी जूते को लेकर आ गए. जब यह सामान दीनदयाल जी को दिया गया तो वे हँसते हुए सौम्यतापूर्वक बोले, ‘लो भाई! सारे उत्तर प्रदेश में घूम आया, किसी ने नहीं टोका तुम्हारी चंदौसी इतनी बड़ी हो गयी है? ‘खैर, लोगों के अनुनय-विनय करने पर उन्होंने उन कपड़ों को पहन लिया.
सभा से लौटने के बाद उन्होंने पुनः उन कपड़ों को उतार कर अच्छे से तह (समेट) कर लगा दिया ओर अपने उन्हीं पुराने वस्त्रों को फिर से पहन लिया. स्थानीय कार्यकर्ता मनोहर लाल जी, जो नए कपडे लेकर आये  थे, हाथ जोड़कर बोले, ‘ पंडित जी, आप हम सभी को इतना क्यों लज्जित कर रहे हैं. आपने उन कपड़ों को क्यों उतार दिया ? दीनदयाल जी हंस कर बोले, तो क्या कपड़े साथ ले जाने को दिए थे. ? ये उनकी सरलता कि हद थी. बड़ी मुश्किल से वे उन कपड़ों को ले जाने को तैयार हुए. इसी प्रकार एक बार जब वे प्रशासनिक सेवा के साक्षात्कार के लिए गए तो उस समय भी उनकी वेशभूषा सामान्य थी. धोती, कुर्ता ओर टोपी. अन्य साथियों ने उनके इस पहनावे को देख कर ‘पंडित जी आये हैं’ कह कर उनका उपहास किया. लेकिन बाद में जब परिणाम आया तो वे सभी प्रतियोगियों में सबसे अव्वल साबित हुए खैर उन्होंने नौकरी नहीं कि ओर संघ के प्रचारक हो गए.

दीनदयाल जी का मानना था कि बाहरी दिखावे पर हम लोग बहुत जोर देते हैं. इसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि व्यक्ति कि पहचान कपड़ों से होती है. टाई, सूट, ओर चमकदार जूते नौकरी  पाने ओर करने के  लिए हमने आवश्यक बना दिए हैं. जबकि नौकरी व्यक्ति कि  वेशभूषा ओर चमक देख कर नहीं मिलती उसके ज्ञान ओर बौद्धिक क्षमता को आंककर दी जाती है. सफलता के लिए परिधान से अधिक जरूरी बुद्धि कौशल ओर ईमानदारी  है.

साभार :- पाथेय कण