हिंदुत्व धर्म नहीं हमारी सांस्कृतिक पहचान है - जयराम शुक्ल

दिंनाक: 28 May 2018 16:22:47

भोपाल(विसंके). आज स्वात्रत्य वीर सावरकर का जन्म दिवस है। सावरकर जी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे जीनियस क्रांतिकारी और विचारक थे। 

ये वही महापुरुष थे जिन्होंने .द वार आफ इंडियन इंडिपेंस: १८५७ .. लिखकर यह बताया कि यह भारत का प्रथम स्वात्रंत्य समर था,जिसे अँग्रेज़ीदा इतिहासकार आज भी सिपाही विद्रोह बताकर मजाक उड़ाते हैं।

 पुणे के प्रतिष्ठित फारग्युशन कालेज से ग्रैजुएट और लंदन से बार एट लाँ सावरकर जी इतिहासकार के साथ लेखक,कवि,नाटककार और विचारक थे। 

उन्होंने हिंदुत्व की थ्योरी देते हुए कहा कि भारत पुण्यभू पर जन्मा हर व्यक्ति हिंदू है चाहे वह किसी भी पंथ का अनुगामी हो। 

जिनदिनों महात्मा गांधी का राजनीति में प्रवेश हुआ उन दिनों सावरकर का यश और चरमोत्कर्ष पर था। ब्रिटिश सरकार ने इन्हें एक साथ दोहरे आजीवन कारावास की सजा सुनाई। 

यद्यपि सावरकर लोकमान्य तिलक के प्रिय थे फिर भी स्वतंत्रता संग्राम की बागडोर काँग्रेस के हाथों में आने के बाद ये लगातार राजनीतिक दुरभिसंधि के शिकार होते चले गए।

 सावरकर अखंड भारत के पक्षधर और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उद्घोषक। स्वतंत्रता संग्राम में वे पंद्रह वर्षों से ज्यादा समय तक कठोर कारावास में रहने वाले एकमात्र संग्रामी थे, फिर भी कांग्रेस इन पर अँग्रेजों से मिले होने का प्रचार करती रही। 

आजादी के बाद भी सावरकरजी जीवनपर्यंत देश की सरकार के निशाने पर रहे। आज भारतीय जनता पार्टी जिस मुकाम पर खड़ी है उसका वैचारिक बीजारोपण सावरकर जी ने ही किया। उन्हें भले ही सरकारों ने भारतरत्न का पात्र न समझा हो पर उनका व्यक्तित्व व कृतित्व इस कागजी सम्मान से बहुत ऊपर, बहुत विशाल है। 

सावरकरजी की हिंदू राष्ट्रवाद की थ्योरी ने हमेशा ही बौद्धिकों को मथा है..आज भी यही सबसे गंभीर विमर्श का विषय है

हिन्दुत्व : हिन्दू कौन है? (Hindutva: Who is a Hindu?) 

-विनायक दामोदर सावरकर द्वारा १९२३ में लिखा गया एक आदर्शवादी पर्चा है। यह पाठ शब्द हिन्दुत्व (संस्कृत का त्व प्रत्यय से बना, हिन्दू होने के गुण) के कुछ आरम्भिक उपयोगों में शामिल है। यह हिन्दू राष्ट्रवाद के कुछ समकालीन मूलभूत पाठों में शामिल है।

सावरकर ने यह पर्चा रत्नगिरि जेल में कैद के दौरान लिखा। इसे जेल से बाहर तस्करी करके ले जाया गया तथा सावरकर के समर्थकों द्वारा उनके छद्म नाम "महरत्ता" से प्रकाशित किया गया।

सावरकर जो कि एक नास्तिक थे, हिन्दुत्व को एक सजातीय, सांस्कृतिक तथा राजनैतिक पहचान मानते थे। सावरकर के अनुसार हिन्दू भारतवर्ष के देशभक्त वासी हैं जो कि भारत कोअपनी पितृभूमि एवं पुण्यभूमि मानते हैं। 

सावरकर सभी भारतीय धर्मोंको शब्द "हिन्दुत्व" में शामिल करते हैं तथा "हिन्दू राष्ट्र" का अपना दृष्टिकोण पूरे भारतीय उपमहाद्वीपमें फैले "अखण्ड भारत" के रूप में प्रस्तुत करते हैं।