किसान सरोकार शीर्ष पर सियासत के राडार पर - -भरतचन्द्र नायक

दिंनाक: 31 May 2018 16:58:04


भोपाल(विसंके). भारत कृषि प्रधान देश है। आर्थिक उदारीकरण में खाद्यान्न को भले ही कमोडिटी मान लिया गया हो लेकिन देश के जनपदीय अंचल में अन्न को दैवीय वरदान माना गया है। अन्न उत्पादक किसानों को अन्नदाता के रूप में सामाजिक सुरक्षा के लिहाज से देश ने हरित क्रांति की कई मंजिले तय कर देश को आत्मनिर्भर तो बना दिया लेकिन कृषि पर दबाव बढ़ने से कृषि लाभकारी व्यवसाय नहीं रहा इसके साथ गांव में पूरक व्यवसाय, ग्रामीण औद्योगीकरण तजबीज किया जाना चाहिए। इसके साथ किसानों के आंदोलन की भूमिका बनी और राजनीतिक दलों ने सत्ता सौपान गढ़ने के लिए किसानों की बदहाली का डींग पीटा। बजटीय प्रावधान करने का प्रदर्शन भी किया, लेकिन कृषि को घाटे का सौदा होने की हकीकत को बदलने के लिए ठोस प्रयासों का अभाव रहा। आज किसान आंदेालनों का शोर चारो ओर कर्णगोचर हो रहा है लेकिन वास्तविक ठोस उपायों पर विचार करने का या तो राजनेताओं के पास समय नहीं है अथवा वे सिर्फ अपनी किसान परस्ती बनाये रखने के लिए आतूर दिखाई दे रहे हैं। किसानों की आत्महत्या पर गंभीर चिंतन करने के बजाय एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ने का कर्म कांड जोर-शोर से सुनाई दे रहा है। आखिर संसद में कृषि बजट के समय वह चिन्ता क्यों मुखरित नहीं होती। राजनेता सिर्फ टी.वी. पर दिखने के लिए उटपटांग करते दिखाई देना चाहते हैं। किसान की बदहाली सिर्फ राजनेताओं के लिए जुमला बन गया है। किसान कर्ज में पैदा होता है, बड़ा होता है और कर्ज में ही इहलीला समाप्त करता है। सवाल उठता है कि किसान साख व्यवस्था के लिए दूसरों पर निर्भर है। आजादी के बाद किसान कर्ज के लिए बैंकों का मुहताज बना और उससे अठारह प्रतिशत ब्याज वसूला गया। क्योंकि उसकी सत्ता के गलियारे में पुकार अनसुनी बनी रही। वहीं उद्योग और वाणिज्य की लाबी सशक्त थी इसलिए उन्होंने बैंकों की तरलता को सोख लिया और सरसब्ज हुए जबकि किसान कर्ज के बोझ से दबता गया उसकी साहूकारों पर निर्भरता खाज में कोढ़ बन गई। आजादी के 4 दशकों तक यह स्थिति जस की तस रही। देश में नब्बे के दशक में जब अटलजी की सरकार बनी उसने किसानों पर ब्याज के बढ़ते बोझ की चिंता की। किसान क्रेडिट कार्ड देकर किसान की साख प्रमाणित कर उसे सम्मान दिया। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना लाकर किसान को मंडी पहंुचने के लिए रास्ता बनाया, लेकिन व्यवस्था के अनेक प्रश्न अनुत्तरित बने रहे। अटल सरकार का अवसान हो गया।


                हर खेत को पानी, हर हाथ को काम, हर आवासहीन को मकान की प्राथमिकताएं चुनाव घोषणा पत्रों में सजी। लेकिन यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि इस दिशा में जिक्र के साथ फिक्र जहाॅ देश में मोदी सरकार ने की, वहीं मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने इसे चुनौती के रूप में स्वीकार किया। जिसकी राजनैतिक क्षेत्रों में चर्चा के साथ आरोप लगे कि सरकारी खजाने का लोकधन किसानों पर  पानी के तरह बहाया जा रहा है, लेकिन यह राजनीति का गुण कहे या दोष कि उसे विरोधाभास आता है। लोकतंत्र में विरोध, बहस, सत्याग्रह, आंदोलन से लोकतंत्र सशक्त होता है। लेकिन इसमें सकारात्मक पहल की दरकार होती है। दुर्भाग्य से आज विरोध के लिए विरोध की हवश बढ़ी है। आंदोलन का मतलब सरकार के सामने कानून व्यवस्था की समस्या पैदा करना, अराजक तत्वों को संरक्षण देकर जन सुविधा छीनकर परेशानी पेश करना रहा गया है।

                मध्यप्रदेश में किसान की हालत को एक दम संतोषजनक बताना अतिश्योक्ति हो सकती है। लेकिन जिस तरह कृषि के सामाजिक दर्शन और अर्थशास्त्र को संवारने के प्रयास हुए हैं उनकी अनदेखी करना निरा राजनैतिक अवसरवाद ही कहा जायेगा। आंदोलन सकारात्मक हो। आंदोलन से तात्पर्य जनता की सुविधाए छीनना और प्रशासन को प्रतिबंधात्मक कदम उठाने के लिए विवश करना और बाद में लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित किये जाने का विलाप नहीं होना चाहिए। मध्यप्रदेश में राज्य सरकार ने सत्ता परिवर्तन के पश्चात् 2003 से गांव-गरीब किसान मजदूर के कल्याण के कदम उठाये हैं। उनमें कसर हो सकती है। सुधारात्मक सुझाव देने के बजाय लोकजीवन को पंगु बनाने और जनता को आतंक के साए में जीने को मजबूर करना नहीं होना चाहिए।

                मध्यप्रदेश में एक निर्वाचित सरकार है जिसके प्रोत्साहन से प्रदेश के किसानों ने पांच बार राज्य को कृषि कर्मण सम्मान से नवाजे जाने का सौभाग्य दिया है। इसके पीछे किसान कल्याण की दिशा में किये गये कार्यों पर भी विचार किया जाना प्रासंगिक होगा। राज्य में शून्य प्रतिशत ब्याज पर कर्ज वितरण का रिकार्ड बना। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का विस्तार किया गया। राष्ट्रीय औसत जहां 30 प्रतिश है, मध्यप्रदेश में फसल बीमा के अंतर्गत 56 प्रतिशत क्षेत्र लाया जा चुका है। प्राकृतिक आपदा में किसान को 18 हजार रू. प्रति हेक्टर देय था। इसे बढ़ाकर 30 हजार रू. किया गया। प्राकृतिक आपदा और बिजली अनुदान मिलाकर साढ़े अठारह हजार करोड़ रू. की राशि पिछले वित्तीय वर्ष में दी जा चुकी है। सूखा प्रभावित जिलों में पिछले वर्ष 18000 करोड़ रू. ओला पीड़ित को 125 करोड़ रू. दी गई।

                मूल्य स्थिरीकरण की दिशा में राज्य सरकार के भूमिका सराहनीय रही है। मूल्य स्थिरीकरण कोष बनाया गया है। गत जून जुलाई में 8.52 लाख मेट्रिक टन प्याज, 682 करोड़ रू0 लागत में खरीदकर किसानों को राहत दी। मूंग के गिरते मूल्य से राहत के लिए 1123 करोड़ लागत से अरहर 332 करोड़ रू., मसूर 76 करोड़ रू. और उड़द 210 करोड़ रू. लागत से खरीदा गया, जिससे किसानों को भरपूर लाभ सुनिश्चित हुआ। इससे किसानों की जेब में एक हजार करोड़ रू. से अधिक धन राशि पहुंची। किसानों के लिए भावान्तर भुगतान योजना वरदान साबित हुई है। सोयाबीन, मूंगफली, तिल, मक्का, मूंग, उड़द और तुअर पर भावान्तर भुगतान योजना लागू की जा चुकी है। पंजीकृत किसान ही भावान्तर भुगतान योजना से लाभान्वित हो रहे हैं। खरीफ फसलों में 12 लाख किसानों को 1850 करोड़ रू. का भुगतान उनके बैंक खातों में किया गया।

                प्याज और लहसुन में भावान्तर भुगतान योजना प्याज का 800 रू. क्विंटल और लहसुन का 3300 रू. समर्थन मूल्य तय किया गया है। 2017-18 में चना समर्थन मूल्य 4400 रू. की दर से उपार्जन किया जा रहा है। 15 लाख किसान पंजीयन करा चुके हैं। इसका भुगतान करीब 15 हजार करोड़ रू. किया जायेगा। इन येाजनाओं को बखान करने का अभिप्राय सरकार की प्रशस्ति वाचन करना नहीं अपितु किसान को राहत देने की प्रतिबद्धता पूरी करने के लिए सरकार द्वारा किये गये नवाचार की भलमन्साहत पर विचार करना है। किसान संगठनों से भी अपेक्षा की जाती है कि वे इससे बेहतर उपाय सुझायें। यदि क्रयनीति में विसंगति या कही कोई त्रुटि है तो उसे चिन्हित कर सुधार के लिए सरकार को विवश कर सकते है। इसके बजाय यदि कोरी सियासत के लिए आंदोलन की आड़ में सामान्य जनजीवन को पंगु बनाना है तो इसकी स्वीकृति तो जनताजनार्दन भी नहीं देगी। आंदोलन का मतलब यदि व्यवस्था को पक्षाघात का शिकार बनाना है तो यह लोकतंत्र को मजाक उड़ाना है। उदार शर्तों पर कर्ज लेकर किसान डिफाल्टर बन जाता है नतीजन उसे रियायतों से बाहर मान लिया जाता हैं सरकार ने डिफाल्टर किसानों को भी नियमित करने के लिए मुख्यमंत्री समाधान ऋण योजना ईजाद की। इस तरह 2500 करोड़ रू. ब्याज का भार सरकार वहन करने जा रही है। समाज शास्त्रियों और अर्थशास्त्रियों ने माना है कि गांव में उद्यम लगाकर सहायक रोजगार का सृजन करने के साथ कृषि उपज का प्रसंस्करण कर अधिक मूल्य प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चैहान ने किसानों को मुख्यमंत्री युवा कृषक उद्यमी योजना की ओर आकर्षित किया हैं इसके लिए 25 लाख रू. से दो करोड़ रू. की हायता उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया है। राज्य में कृषि उत्पादों के गिरते मूल्यों के स्थिरीकरण के लिए प्रथक कोष बनाया गया है। अब राज्य सरकार ने कृषि के सहायक उद्योगों में भी साख सुविधा आसान बना दी है। पशुपालन के लिए भी के्रडिट कार्ड बनाकर पशुपालकों को प्रोत्साहित किया है।

                मध्यप्रदेश नव निर्माण की सीढ़ी चढ़ रहा है। सभी को अवसर उपलब्ध है, लेकिन राज्य सरकार की प्रतिबद्धता गांव गरीब किसान है। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता है। बेहतरी के लिए सरकार की नीतियों का विरोध लोकतंत्र का धर्म है। लेकिन लोक जीवन को पंगु बनाना न तो हितकर होता है और न समाज और कानून इसकी इजाजत देता है। किसान आंदोलनों का इतिहास बताता है कि इनकी विफलता का कारण मुकम्मल कृषि दृष्टि न होकर सियासत और व्यवस्था परिवर्तन होता है। किसान आंदोलन का नेतृत्व ऐसे हाथों में जा पहुंचता है जिनका खेती से सरोकार नहीं रहा। आर्थिक उदारीकरण के दौर में स्पर्धा तेज हुई है। भारत कृषि प्रधान देश कहकर हम उल्लसित हो सकते हैं, लेकिन वैश्विक पटल पर तब तक सम्मान हासिल नहीं कर सकते जन तक उत्पादन वृद्धि के साथ उत्पाद की गुणवत्ता की पहचान नहीं बनाते। आज हमें परस्पर सियासी स्पर्धा से परे संगठित, सकारात्मक प्रयासों की जरूरत है। सबका साथ-सबका विकास हमारा मूलमंत्र है।