प्रणब मुखर्जी का संघ मुख्यालय जाना - प्रवीण गुगनानी

दिंनाक: 31 May 2018 15:59:13


भोपाल(विसंके). इन दिनों संघ के प्रति उत्सुकता जिज्ञासा को शत प्रतिशत बढ़ा दिया है पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने ! हुआ कुछ यूं कि संघ के व्यवस्थापकों ने नागपुर में प्रति वर्ष अपने नागपुर मुख्यालय में होने वाले संघ के तृतीय वर्ष के समापन आयोजन में, जिसे दीक्षांत समारोह भी कहा जा सकता है; के मुख्य अतिथि के रूप में प्रणब दा को आमंत्रित किया और प्रणब दा ने सहर्ष अपनी सहमती दे दी. इन दिनों इलेक्ट्रानिक, प्रिंट मिडिया भरा पड़ा है प्रणब दा के संघ मुख्यालय जाने की चर्चाओं से. और सोशल मीडिया तो जैसे इस समाचार से लबालब भरा है और सराबोर हो गया है !! संघ के धुर विरोधी संगठन कांग्रेस के अग्रज सिपाही प्रणब दा को संघ के अतीव महत्वपूर्ण कार्यक्रम में आमंत्रित किया जाने में आश्चर्य की प्रतीति हो सकती है किंतु संघ के मर्म को समझने वाले लोग जानते हैं कि संघ और संघ का स्वयंसेवक अपने विरोधियों के मध्य जाकर फ्रंट फूट पर खेलने का आदि होता है.  जो लोग इस बात में आश्चर्य कर रहें हैं की संघ ने इस ठेठ व ज्येष्ठ कांग्रेसी प्रणब मुखर्जी को क्यों बुलाया तो उनके लिए कहा जा सकता है कि उन्होंने अभी संघ को समझा ही नहीं है. और जो लोग इस बात पर आश्चर्य व्यक्त कर रहें हैं कि प्रणब दा ने संघ के समारोह में जाने हेतु सहमति कैसे दे दी? वे प्रणब दा को नहीं जानते हैं! बंगाल के इस कुलीन, परिपक्व व सनातनी आचरण वाले भद्र राजनीतिज्ञ को जिन्होंने समीप से देखा, पढ़ा व समझा है वे पूर्व राष्ट्रपति जी की इस सहमति से कतई आश्चर्यचकित नहीं होंगे. निर्लिप्त व अकर्ता के भाव से राजधर्म निभाने व राजकर्म को करने की, प्रणब जी की, अपनी विशिष्ट शैली रही है. संघ मुख्यालय में प्रणब दा को आमंत्रित किया जाना संघ की सर्व समावेशी समाज नीति का परिचायक है तो दादा का वहां जाना उनकी परिपक्वता का विशिष्ट उदाहरण है.


                वैसे यह कोई प्रथम अवसर नहीं है की संघ से मतभिन्नता रखने वाले राष्ट्रीय राजनेता संघ के आयोजनों में गयें हों.1934 में तो गांधी जी भी वर्धा में संघ के शिविर में जमना लाल जी बजाज के संग आये थे. संघ शिविर में आगमन के अगले दिन संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार जब उनसे भेंट करने गांधी जी की कुटिया में गए थे तब गांधी जी ने संघ के प्रति जो उच्चतम भाव वाले व्यक्त किये थे वे आज भी गांधी वांग्मय में लिपिबद्ध हैं. गांधी जी ने अपने संघ शिविर में जाने के अनुभव को 16सितम्बर 1947 की सुबह दिल्ली में संघ के स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए किया है. गांधी जी ने कहा था कि “वहां मैं उन लोगों का कड़ा अनुशासन, सादगी और छुआछूत की पूर्ण समाप्ति देखकर अत्यन्त प्रभावित हुआ था.’’ आगे वे कहते हैं, ''संघ एक सुसंगठित, अनुशासित संस्था है।'' यह उल्लेख ‘सम्पूर्ण गांधी वांग्मय’ खण्ड 89, पृष्ठ सं. 215-217 में है. बाबा साहेब अम्बेडकर जिन्हें मैं अब बोधिसत्व अम्बेडकर कहना अधिक उचित समझता हूँ, वे भी संघ के शिविर में गए थे व स्वयंसेवकों को संबोधित किया था. मई 1939 में पुणे के संघ के कार्यक्रम में अतिथि रूप में बोधिसत्व अम्बेडकर जी ने कहा था, “अपने स्वयंसेवकों से जाति तक नहीं बताने की उत्सुकता रखकर, सभी के साथ परिपूर्ण समानता व भातृभाव भरा व्यवहार करने वाले स्वयंसेवकों को देखकर मैं आश्चर्यचकित व अभिभूत हूँ”.  भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन, 1977 की सम्पूर्ण क्रांति के प्रणेता जयप्रकाश जी नारायण भी संघ के आयोजनों में सम्मिलित हुए हैं और उन्होंने संघ की प्रशंसा की है. जनरल करियप्पा 1959में मंगलोर की संघ शाखा के कार्यक्रम में आये थे. जनरल ने स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए कहा था कि “संघ कार्य मुझे अपने ह्रदय से प्रिय कार्यों में से है. अगर कोई मुस्लिम इस्लाम की प्रशंसा कर सकता है, तो संघ के हिंदुत्व का अभिमान रखने में गलत क्या है? प्रिय युवा मित्रो, आप किसी भी गलत प्रचार से हतोत्साहित न होते हुए कार्य करो. डॉ. हेडगेवार ने आप के सामने एक स्वार्थरहित कार्य का पवित्र आदर्श रखा है, उसी पर आगे बढ़ो. भारत को आज आप जैसे सेवाभावी कार्यकर्ताओं की ही आवश्यकता है”. 1962 में भारत पर चीन के आक्रमण के समय संघ के स्वयंसेवकों की सेवा से प्रभावित होकर ही 1963 की गणतंत्र दिवस की परेड में प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू जी ने संघ को आमंत्रित किया था. गणतंत्र दिवस की इस परेड में सेना व सैन्य बलों की टुकड़ियों के साथ तब संघ के 3 हजार स्वयंसेवकों ने पूर्ण गणवेश में भाग लिया था. संघ की 'राष्ट्र प्रथम'भावना के कारण ही 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर जी शास्त्री ने संघ के सरसंघचालक ‘श्री गुरूजी' को सर्वदलीय बैठक में आमंत्रित किया था और वे गए भी थे. 1963 में स्वामी विवेकानंद जन्मशती के अवसर पर कन्याकुमारी में 'विवेकानंद शिला स्मारक' निर्माण के समय भी संघ को सभी राजनैतिक दलों और समाज के सभी वर्गों का सहयोग मिला था. स्मारक निर्माण के समर्थन में विभिन्न राजनैतिक दलों के 300 सांसद आये थे. 1977 में आँध्रप्रदेश में आये चक्रवात के समय स्वयंसेवकों के सेवा कार्य देखकर वहां के सर्वोदयी नेता प्रभाकर जी राव ने तो संघ को नया नाम ही दे दिया. उनके अनुसार,आर एस एस का मतलब है - "R.S.S. means Ready for Selfless Sarvice.” भाजपा के संघ परिवार का सदस्य होने के बाद भी विभिन्न मत, विचार व सिद्धांतों के लोग वस्तुतः संघ से उसकी एक विशिष्टता के कारण ही जुड़े रहने में कोई संकोच नहीं करते हैं. वह विशिष्टता है संघ की सर्व समावेशी, समरसता पूर्ण, समानता पूर्ण भारत की कल्पना और उसके लिए सभी को साथ में लेकर चलने का मनसा, वाचा व कर्मणा युक्त संकल्प. 

           आइये अब बात करें संघ के शिक्षा वर्ग अर्थात प्रशिक्षण शिविरों की जिसके समापन में पूर्व राष्ट्रपति सम्मिलित होने जा रहें हैं. ग्रीष्म की छूट्टियों में जब कि सामान्यतः लोग किसी पहाड़ पठार या ठंडे स्थान पर जाकर आराम करना पसंद करते हैंतब देश का एक बड़ा वर्ग अपनी स्वरुचि से संघ के अभ्यास वर्गों में जाकर कड़ा श्रम करता है और अपना स्वेद बहाता है. किसी गुरुकूल के विद्यार्थी की भांति यहां व्यक्ति, व्यक्तित्व विकास व राष्ट्र चिंतन हेतु कष्टप्रद परिस्थितियों में रहता है. आचार्य चाणक्य ने अपनें राजनीति शास्त्र में कहा था कि किसी भी देश में शांति काल में जितना स्वेद बहेगा, उस देश में युद्ध काल में उससे दूना रक्त बहनें से बचेगा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के इन संघ शिक्षा वर्गों में आये शिक्षार्थी आचार्य चाणक्य की कल्पना पर ही देश के शांति काल में कल्पना योजना निर्माण रचना पर अथक परिश्रम करते हुए सतत कर्मशील रहनें का व अपना स्वेद बहानें का संकल्पित प्रशिक्षण लेतें हैं. ये प्रशिक्षण उनके रोजी-रोजगार आजीविका व्यावसायिक अथवा कार्यालयीन कार्यकुशलता में वृद्धि के लिए सुविधाजनक होटलों में या रिसार्ट्स में आयोजित नहीं होते हैं! ये शिक्षा वर्ग बिना किसी भौतिक या व्यक्तिगत लाभ की दृष्टि से कष्टसाध्य वातावरण में किसी सामान्य से विद्यालय, धर्मस्थान या सार्वजनिक आयोजन स्थलों के कक्षों व प्रांगणों में आयोजित होतें हैं. सात दिनों से पच्चीस दिनों तक के इन वर्गों के पाठ्यक्रम में मोटे तौर पर प्रतिदिन 250 मिनिट के बौद्धिक विकास कार्यक्रम तथा 200 मिनिट के शारीरिक विकास के कार्यक्रम रखें जाते हैं तथा बाकी समय में व्यक्ति को ऐसा परिवेश मिलता है कि व्यक्ति राष्ट्र आराधना में तल्लीन हो जाता है. यहां यह स्मरण अवश्य कर लेना चाहिए कि भले ही संघ के ये शिक्षा वर्ग रोजगार व्यावसायिक या कार्यालयीन कार्यकुशलता में वृद्धि की दृष्टि से आयोजित नहीं किये जातें हो किन्तु इन वर्गों से बालक तथा किशोर वय की आयु से लेकर वृद्धों तक को प्रत्येक क्षेत्र में अधिक निपुण प्रवीण तथा पारंगत बना देता हैं. यही कारण है कि इस देश के ही नहीं अपितु विश्व के सर्वाधिक अनूठे विशाल अनुशासित लक्ष्य समर्पित तथा राष्ट्र प्रेमी संगठन के रूप में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की पहचान होती है. संघ के विषय में यह तथ्य भी बड़ा ही सटीक सत्य तथा सुस्थापित है कि संघ का कार्य संसाधनों से अधिक भावना तथा विचार आधारित होता है. यदि आपका संघ के कार्यकर्ताओं से मिलना जुलना होता है तो एक शब्द आपको बहुधा ही सुननें को मिल जाएगा वह शब्द है “संघदृष्टि”. यह “संघदृष्टि” बड़ा ही व्यापक अर्थों वाला शब्द है. संघदृष्टि को विकसित करनें का ही कार्य शिक्षा वर्ग में होता है.