6 मई रायसेन का जौहर दिवस।

दिंनाक: 08 May 2018 15:49:58


भोपाल(विसंके). 1531 ईस्वी मे गुजरात के शासक वहादुर शाह द्वितीय ने मालवा पर आक्रमण किया । तब तक रायसेन के शासक शिलादित्य से उसकी संधि हो चुकी थी और उधर दिल्ली में बाबर की मृत्यु के बाद हुमायूं गद्दी पर बैठ चुका था । इस आक्रमण में मालवा के शासक महमूद खिलजी को पराजित कर बंदी बनाकर गुजरात भेज दिया और रास्ते में ही उसे मरवा दिया इस समय उज्जैन, आषटा ,रायसेन, बिदिशा आदि क्षेत्र शिलादित्य के अधिकार में थे । शिलादित्य ने मालवा के आक्रमण के समय वहादुर शाह की काफी मदद की थी । वर्षा ऋतु प्रारंभ होने पर जुलाई  1531 ईस्वी में अपने पुत्र लक्ष्मण सेन को उज्जैन का प्रशासक बना कर लौट आया । इस समय शेरशाह भी रायसेन पर  विजय की योजना बना रहा था । और उधर वहादुर शाह भी महसूस कर रहा था कि रायसेन पर अधिकार किये विना इस क्षैत्र पर उसका अधिकार स्थायी नही हो पाऐगा । परंतु रायसेन के शासक की शक्ति देखते हुए वह सीधा आक्रमण करने का साहस नही कर पा रहा था । अतः उसने रायसेन जीतने हेतु धोखाधड़ी की एक घृणित योजना बनाई । उसने अपने अमीर नससन खान को रायसेन नरेश शिलादित्य के दरबार में संदेशवाहक बना कर भेजा और स्वयं धार के पास नालछा नामक जगह पर ससैन्य आ पहुंचा । नससन खान के संदेश पर शिलादित्य सहज विश्वास कर बहादुर शाह मिलने नालछा पहुंच गए और भैट के समय बहादुर शाह ने उन्हे दिसंबर  1531  ईस्वी को उनके इने - गुने सहयोगियों के साथ बंदी बना लिया । शिलादित्य के साथ गऐ कुछ साथी सैनिको ने उज्जैन पहुंच कर लक्ष्मण सेन को सूचना दी । इस अवसर पर शिलादित्य का वीर पुत्र भूपति राय सेना सहित रायसेन से दूर था । लक्ष्मण सेन अपनी छोटी सी सेना की टुकड़ी क साथ रायसेन दुर्ग की रक्षा हेतु रवाना हुए । भूपति राय भी खवर लगते ही चित्तौढ की सेना भी साथ लेकर रायसेन की ओर रवाना हुए । उधर वहादुर शाह ने तत्परता से उज्जैन पर आक्रमण किया लक्ष्मण सेन के न होने से आसानी से उज्जैन पर उसका अधिकार हो गया । उसने उज्जैन, आषटा आदि परगने अन्य मुसलमान सरदारों को जागीर में दे दिये । इसके तेजी से बढकर सांरगपुर पर अधिकार स्थापित कर उसे मुल्लू खान को जागीर में दे दिया । इसके बाद जनवरी  1532  ईस्वी में वह बिदिशा पर चढ़ आया और लूटपाट कर बिदिशा पर कब्जा कर लिया । इस क्षेत्र के मंदिरो सहित मूर्ति पूजा के समस्त चिन्हों को जमींदोज कर दिया गया । तत्पश्चात 17  जनवरी  1532  ईस्वी को बहादुर शाह रायसेन दुर्ग के सामने जा पहुंचा । दुर्ग में लक्ष्मण सेन छोटी सी रक्षक सेना के साथ तैयार था । उसने दुर्ग के सामने पड़ाव कर रही बहादुर शाह की सेना पर मार भगाने के लिए छापामार तरीके से आक्रमण शुरू किये । यद्यपि इस समय दुर्ग केवल रक्षक सेना थी और मुख्य सेना भूपति राय के साथ थी फिर भी लक्ष्मण सेन प्रयास करता रहा परंतु वह शत्रु सेना को भगाने में असफल रहा । इस बीच  14-15  दिन गुजर गए । इसी समय 40  सहत्र सेना के साथ रायसेन आ पहुंचा और उसने बहादुरशाह की सेना पर प्रचंड वेग से आक्रमण किया । बहादुरशाह की सेना राजपूतों के इस आक्रमण को सह न सकी और संध्या होते - होते अधिकांश सेना भाग खड़ी हुई । बहादुरशाह भी बड़ी मुश्किल से जान बचाकर भागा और उसने उज्जैन मे जाकर शरण ली ।                         बहादुरशाह ने उज्जैन पहुंच कर अपनी नीचता का प्रदर्शन किया, उसने धार के किले से शिलादित्य को बुलवा कर उसे इस्लाम मत स्वीकार करने पर विवश किया । कुछ इतिहासकार लिखते है कि शिलादित्य ने रायसेन दुर्ग के घेरे के समय बहादुर शाह की अवश्यंभावी जान कर सर्वथा निराश होकर अपने राज्य और कुटुंबियों की रक्षा के लिए मुसलमान बनना स्वीकार किया और बहादुरशाह के स्वीकृति देने के बाद उसका नाम सलाहुद्दीन रख दिया गया । परंतु इस बात में सचाई कम जान पड़ती है । यह विवरण बादशाह के किसी दरबारी अथवा बाद के अन्य मुस्लिम इतिहासकारों द्वारा दिया गया है । वे राजपूत जो प्राणों को हथेली पर रखकर घूमते थे,  सम्मान की रक्षा के लिए अपनी स्त्रियों और बच्चों को जौहर की अग्नि में भस्म होते हुए देखते थे;  उनके कुटुंब का ऐसा महावीर सपूत केवल कुटुंबियों की रक्षा के लिए मुसलमान बनना स्वीकार करेगा,  ऐसा सोचना भी हास्यास्पद प्रतीत होता है ।             बहादुरशाह ने शिलादित्य को बलात धर्म परिवर्तन कराने के उपरांत अप्रैल  1532  ईस्वी में मांडू के किले में कैद कर दिया । जैसे ही भूपति राय को अपने पिता की इस दुर्दशा का पता चला वह बहादुरशाह पर आक्रमण करने रवाना हुआ और बहादुरशाह को जैसे ही भूपति राय के आक्रमण की खबर मिली वह भी मार्ग बदल कर रायसेन दुर्ग की और रवाना हुआ । उसका ख्याल था कि वह भूपति राय की अनुपस्थिति में शिलादित्य को आगे कर दुर्ग के द्वार खुलवा लेगा और रायसेन के अजेय दुर्ग पर कब्जा कर भूपति राय को छका देगा । इस योजना के अनुसार उसने दुर्ग के पास पहुच कर शिलादित्य की ओर से संदेश भेजा कि महाराज की आज्ञा है कि दुर्ग के दरवाजे खोल दिए जाऐ । शिलादित्य की पत्नी रानी दुर्गावती भी अत्यंत चतुर एवं साहसी स्त्री थी उसने भी कहला भेजा कि यदि महाराज शिलादित्य की आज्ञा है तो वे स्वयं दुर्ग में आकर रानी से बात करें । भूपति राय से घबराए बहादुरशाह ने रानी की इस शर्त को स्वीकार कर लिया और  6  मई  1532  ईस्वी को शिलादित्य को अपने सिपहसालार मलिक शेर के साथ दुर्ग में पहुँचा दिया गया । दुर्ग में शिलादित्य की महारानी दुर्गावती एवं लक्ष्मण सेन आदि से भैट हुई । रानी ने कहा हम सबका अंतकाल निकट है , हम वीरों की तरह शौर्य का प्रदर्शन कर प्राण त्यागेंगे । हमने निश्चय किया है कि स्त्रियां जौहर की अग्नि में कूदकर प्राण न्योछावर करेंगी और पुरूष अंतिम समय तक शत्रु से लोहा लेते हुए लड़ेंगे,  मगर जीते - जी दुर्ग दुश्मन को नहीं सौंपेंगे । इतने दिनो की कैद से निराश शिलादित्य भी महारानी के बिचार सुन जोश से भर उठा और दुर्गावती एवं लक्ष्मण सेन के साथ मरने-मारने पर उतारू हो गया । मलिक शेर ने शिलादित्य को समझाने की बहुत चेष्टा की और विफल होने पर लौट गया ।

#6_मई_1532  ईस्वी को रायसेन दुर्ग पर जौहर की ज्वाला धधक उठी और रानी दुर्गावती सहित  700  राजपूत वीरांगनाओं ने अपने बच्चों सहित अग्नि कुंड  में प्रवेश कर लिया । उनका यह बलिदान युगों -युगों तक प्रेरणा का स्त्रोत बना रहेगा ।                                शिलादित्य और लक्ष्मण सेन सहित सभी राजपूत मौत से जूझने निकल पड़े, सभी ने अपनी बीरता एवं शौर्य का चरम सीमा तक प्रदर्शन किया । महाराज शिलादित्य अंतिम समय तक सेना का नेतृत्व करते हुए  10  मई 1532 ईस्वी को वीरगति को प्राप्त हुऐ ।                            उनके देहावसान के बाद बहादुरशाह और उसके सैनिकों ने उनके मृत्यु स्थान पर एक कब्र बनवा दी जिसे आज भी सलाहुद्दीन की मजार कहा जाता है । । यह दुर्ग के बारादरी महल के पास स्थित है ।    

 इस संकट के समय राजा का पुत्र भूपति राय रायसेन से बहुत दूर था         यह सारा कांड बहादुरशाह ने शीघ्रता से किया था भूपति राय को जैसे ही बहादुरशाह की चाल और अपने माता - पिता के वलिदान कि पता चला वह तेजी से रायसेन की ओर दौड़ा । इस बीच बहादुरशाह आलम खां लोदी को रायसेन का प्रशासक नियुक्त कर आगे निकल गया ।

भूपति राय ने रायसेन के निकट बहादुरशाह की सेना को पूरी तरह से परास्त कर भगा दिया और रायसेन पर पुनः कब्जा कर लिया । बहादुरशाह द्वारा नियुक्त आलम खां लोदी भी भाग गया। 

वीरांगनाओं के जौहर एवं वीरों के बलिदान को राष्ट्र सदैव याद रखेगा ।

साभार श्री  राजीव लोचन चोवे