दाल में काला – विजय मनोहर तिवारी

दिंनाक: 11 Jun 2018 14:06:35


भोपाल(विसंके). मैं रजनीकांत का फैन नहीं हूं मगर उनकी फिल्में देख लेता हूं। खासकर हिंदी में डब। उसमें रजनीकांत की आयातित आवाज रजनी के आक्रामक किरदार को और असरदार बनाती है-कूल SSSS। मगर काला नाम की फिल्म दाल में काला है। एक गहरी साजिश।


आप इसे भीमा कोरेगांव के नियोजित दलित हंगामे और मोदी-फड़नवीस की भगवा ब्रांड सरकारों की रोशनी में देखिए। यह सहज क्रिएटिविटी नहीं हो सकती। किसी साजिश के तहत दलितों की बहस को कुछ खास प्रतीकों की पृष्ठभूमि में बार-बार दिखाया गया है। मुझे नहीं पता इसकी प्रोडक्शन टीम में कौन है, कहानी किसने लिखी और परदे के पीछे कौन हो सकते हैं? रजनी और नाना कैसे ऐसी फिल्म में नजर आ सकते थे? दोनों सिर्फ एक्टर नहीं हैं। वे सामाजिक सरोकारों वाले जागरूक शख्स भी हैं।

हल्के मूड में ही कभी रजनी की फिल्में देखी हैं। जैसे-रोबोट और कबाली वगैरह। ऐसे ही मूड में काला देखने गया। एक दर्जन से ज्यादा ऐसे दृश्य, संवाद या सिचुएशंस हैं, जो सहज कहानी का हिस्सा हो ही नहीं सकते। बड़ी चतुराई से इस फिल्म को बुना गया है। अगर यह चतुराई पकड़ में आ रही है तो शायद फिल्मकारों की कामयाबी कतई नहीं है। हो सकता है उन्होंने इसी इरादे से एेसा किया हो कि लोग इसे समझें!

सीधे कहानी पर आते हैं-फिल्म की पूरी पृष्ठभूमि धरावी है। एशिया में सबसे बड़ी स्लम मुंबई की धरावी। कई फिल्में और डॉक्यूमेंट्री फिल्में बनी हैं। समस्या और संघर्ष की कहानियों के रूप में इस विराट बस्ती को बताया गया है। काला की समस्या और इसे बनाने का संघर्ष कुछ कह रहा है। रजनीकांत धरावी के बेताज बादशाह हैं। यह तमिल मूल का परिवार है, जिसकी तीन पीढ़ियां एक साथ हैं। रजनी यानी काला, उसके चार बेटे, बहुएं, नाती-पोते। शहर में सियासी ताकत रखने वाले नाना पाटेकर हैं। नाना धरावी पर कोई रियल इस्टेट का प्रोजेक्ट लाना चाहते हैं। तोड़फोड़ शुरू करते हैं मगर काला के आते ही उनके इरादों पर पानी फिर जाता है। 166 मिनट की इस फिल्म में आगे दोनों के बीच का संघर्ष है। मगर इसमें ऐसा क्या है? मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा की मसाला एक्शन मूवियों में अमीर और गरीब का यही मुकाबला तो बिकता रहा है। इन फिल्मकारों की ही उपज हैं अमिताभ बच्चन जैसे अभिनय की दुनिया के सबसे सफल कारोबारी।

अब आइए फिल्म की शरारतपूर्ण डिजाइन पर। मेरी राय को बिल्कुल मत मानिए। मूवी देखकर ही इस समीक्षा पर टिप्पणी कीजिए। असहमतियों का दिल से स्वागत करूंगा।

रजनी ने पूरी फिल्म में काले रंग का शानदार डिजाइन कुरता और काली लुंगी धारण की है। वे भी सांवले से कुछ ज्यादा ही हैं। यह कालिमा कहानी में दलित प्रतीक है। नाना का किरदार एक असरदार हिंदुवादी नेता का है, जिसकी सियासत का अंदाजे बयां माफिया का है। वह ऐसे ही क्रिमिनल परिवेश की उपज है। लेकिन अब सरकारें उनकी दम पर हैं। गुंडों की फौज है। पुलिस जेब में है। सारी ताकत है। इसमें भी कोई बुराई नहीं है। ऐसी फिल्में शुरू से ही कमजोर और ताकतवर के बीच झगड़ों का विषय रही हैं, जिसमें आखिरकार कमजोर जीत जाते हैं। ताकतवर को मुंह की खानी पड़ती है। अंत में विजय भैया जिंदाबाद...

अब आप बारीक नजर से देखिए-
धरावी बार-बार नीले रंग के परिवेश में चित्रित है। बौद्ध बस्तियों जैसे गौतम बुद्ध की मूर्ति, तस्वीरें, सांची के तोरण जैसे प्रतीक भी कई बार आए हैं। जबकि धरावी एक छोटा-मोटा भारत है, जहां हिंदू, मुस्लिम, दुकानदार, मजदूर, कारखाने वाले, ठेले वाले, गुमटी वाले, टैक्सी वाले सब एक साथ सटकर रहते हैं। हर राज्यों से आए लोग एक साथ जीते, लड़ते, मरते, जिंदगी की जद्दोजहद में रहते आए हैं। मगर मूवी में एक साथ चैन की बंशी बजाते ईसाई, मुस्लिमों के साथ अगर कोई हैं तो वे सिर्फ दलित हैं। हिंदू तो विलेन है। ब्राह्मण तो शातिर है। यह नाना पाटेकर का परिवेश बताएगा। मनु नाम का बिल्डर काला जैसों को ज़मीन से बेदख़ल करना चाहता है। नाना इस अन्याय के पीछे है।


एक बार आगजनी में बस्ती जली तो बुद्ध के जले हुए प्रतीक भी कई बार आए हैं। जय भीम का उदघोष। ड्रोन शॉट में छतों, दीवारों, झंडों और बैनरों का नीला रंग। नुक्कड़ नाटकों के किरदार, उनके ड्रामे और वैसे ही ऊलजलूल बोल के गाने। यह सब अनायास कहानी की मांग का हिस्सा नहीं हैं। यह पूरी तरह साजिश के तहत फ्रेम किए गए टुकड़े हैं।

धरावी का मतलब है- सबसे कम जगह और जमीन पर सबसे ज्यादा लोगों की भीड़। सबसे कम आकाश में सबसे कम हवा और रोशनी और सबसे ज्यादा शोर। सबसे संकरी गलियों में सबसे भयावह चहल-पहल। यह धरावी की सचाई है। संघर्ष की सचाई। शर्मनाक सचाई। रजनीकांत मूलत: महाराष्ट्र के ही हैं। असली नाम शिवाजीराव गायकवाड़। यह असली नाम फिल्म में एक नेकदिल कांस्टेबल का भी है, जो वह इन लोगों के संघर्ष में खुलकर साथ आने के बाद जोर से ऐलान भी करता है।

संवाद सुनिए-इस बस्ती में हम सब एक हैं। यहां अशरफ का भाई मोहन और गणेश का जीजा अजीज...जय भीम...। काला के एक बेटे का नाम लेनिन है। वह कॉमरेड है, यह तब पता चलता है जब भूमाफिया की एक मुठभेड़ में वह अपनी मां के साथ मारा जाता है और उसकी तस्वीर पर कॉमरेड लेनिन लिखा आता है। वह जमीन के संघर्ष में बिल्कुल क्रांतिकारी की भूमिका में है। सिस्टम के खिलाफ सदा गुस्से से भरा। गुस्सा आंदोलनों में निकल पड़ने को बेचैन। कोई रचनात्मक वैकल्पिक बुद्धि का विस्तार नहीं। काला एक समय जरीना से निकाह कर ही रहा होता है कि अचानक राष्ट्रवादी नाना पाटेकर के किरदार का बस्ती पर हमला हो जाता है। यह जोड़ी फिर बरसों बाद मिलती है। काला के घर में बुद्ध के बुत हैं। कहीं आंबेडकर के कटआउट भी नजर आते हैं।

पुलिस पूरी तरह नाना पाटेकर की जेब में है जब चाहे बस्ती पर जो चाहे करती है। गुंडे अलग परेशान करते रहते हैं। घर जला डालते हैं। जान से मारने की कोशिश करते हैं। नाना पाटेकर विलेन हैं। किंग मेकर टाइप की शख्सियत हैं, जिनकी मदद से सरकार बनती है। नाना जब भी अपने घर में परदे पर आते हैं तो आसपास कृष्ण की प्रतिमा होती है। भगवा रंग, सबके माथे पर टीका, किरदारों के गले में पड़ा भगवा दुपट्टा क्या इशारा करते हैं? इन प्रतीकों का ओवरडोज किरदार की भूमिका के बाहर यह हैमर करता है कि इनकी सरकारें ऐसे ही काम कर रही हैं। वे दलितों का दमन कर रही हैं। उनकी पुलिस बर्बर है। उन्हें कारोबारी माफिया काबू में रखते हैं। वे सब घोर दलित विरोधी हैं। जबकि दलितों के साथ अगर कोई है तो वे कम्युनिस्ट हैं, एनजीओ हैं, नुक्कड़ नाटक वाले हैं, लेनिन हैं, आंबेडकर हैं, बुद्ध हैं। स्पेशल इफेक्ट भी, साइड इफेक्ट भी। इस श्रृंखला में अब एक ऐसा परोपकारी मसीहा जैसा शख्स भी है, जो खुद एक माफिया की तरह जमा हुआ है।

फिल्म के लंबे अंत में नाना की शानदार कोठी पर भागवत के प्रवचन हो रहे हैं। उसी समय उसके गुंडे धरावी में हिंसा की महाभारत रच रहे होते हैं। भागवत प्रवचनकार ऐसे प्रसंगों को ओजस्वी वाणी में सुनाते हैं और मारधाड़ के शॉट़स की प्रवचन में मिक्सिंग शास्त्रों पर सवाल खड़े करने के लिए है। जाने-अनजाने में यह नाना पाटेकर को एक कट्टरपंथी हिंदू नेता साबित करने की कोशिश है, जो गरीबों का हक मारकर अपने पुण्य कमाने में लगा है और एक ब्राह्मण उसे गीता के उपदेशों में उलझाए हुए है। इधर रावण के अंत की कथा चल रही है उधर नाना के गुंडे काला की जान के प्यासे बनकर बस्ती पर टूट पड़े हैं। यह ब्राह्मणों और दलितों के संघर्ष का स्पष्ट रेखांकन है, जिसमें कई बार काला के लिबास और रंग को लेकर ऐसी ही संज्ञाएं दी गई हैं। स्पष्ट रंगभेद। रंग से किसी की जातिगत पहचान को उभारना। जाहिर करना।

यह कुलमिलाकर यह ताकत और अहंकार का खेल ही है। दलित, नीला रंग, आंदोलन, जमीन का हक, गरीबी की जद्दोजहद, कॉमरेड, लेनिन, आंबेडकर, बुद्ध सब मोहरे हैं। जो इनके इस्तेमाल में जितना माहिर वह उतना ही कामयाब। क्या रजनीकांत और नाना पाटेकर ने जब इस फिल्म में काम की हामी भरी होगी तब उन्होंने सिर्फ अपने किरदार और डायलॉग देखे होंगे या जैसी यह फिल्म बनकर परदे पर आई है, उसका पूरा अंदाजा उन्हें था। मुझे लगता है कि उन्हें अहसास भी नहीं होगा कि इस फिल्म के डायरेक्टर या क्रिएटिव टीम के लोग दरअसल रचना क्या चाह रहे थे? पता नहीं नाना और रजनी ने जब इसकी रिलीज के पहले स्पेशल शो या अपने शॉटस देखे होंगे, तब उन्हें अटपटा लगा होगा या नहीं?

निवेदन: दोस्तो, यह समीक्षा बिल्कुल मेरे निजी विचार हैं। हो सकता है आप इसे मनमोहन देसाई टाइप मसाले की तरह लेकर लौटें। हो सकता है रजनीकांत के मौज भरे और नाना पाटेकर के प्रभावी किरदार से आगे आपको कुछ नहीं दिखे। मगर मेरा मन नहीं मान रहा। यह काला नहीं दाल में काला है। मैं फिल्म देखने गया एक रजनीकांत के दर्शक के रूप में था मगर जो देखा तो सिर्फ दर्शक नहीं था। देश का एक नागरिक भी था। पत्रकार भी। हो सकता है आप देखें तो आपकी राय अलग हो।