मानव के कर्तव्य पंच महायज्ञ

दिंनाक: 13 Jun 2018 16:55:46


भोपाल(विसंके). “यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म” अर्थात् प्रत्येक श्रेष्ठ कर्म यज्ञ कहलाता है अथवा यज्ञ करना सबसे श्रेष्ठ कर्म है । स्वामी दयानन्द जी ने वेदों के आधार पर कहा कि प्रत्येक मनुष्य को प्रतिदिन अपने जीवन में पाँच महायज्ञ जरूर करने चाहिए।


(1) ब्रह्मयज्ञ :- प्रतिदिन प्रातः काल और सायंकाल दो सन्धि बेला में ईश्वर का ध्यान, चिंतन वा उपासना के माध्यम से धन्यवाद ज्ञापन करना ब्रह्मयज्ञ कहलाता है जिसको कि संध्या भी कहते हैं। प्रात: सूर्योदय से पूर्व तथा सायं सूर्यास्त के बाद जब आकाश में लालिमा होती है, तब एकांत स्थान में बैठ कर एकाग्रता सहित सांसारिक विचारों से रहित हो कर ईश्वर का ध्यान करना चाहिए ।

(2) देवयज्ञ :- अग्निहोत्र अर्थात हवन को देवयज्ञ कहते हैं। यह प्रतिदिन इसलिए करना चाहिए क्योंकि हम दिनभर अपने शरीर के द्वारा वायु, जल और पृथ्वी को प्रदूषित करते रहते हैं। इसके अतिरिक्त आजकल हमारे भौतिक साधनों से भी प्रदूषण फैल रहा है, जिसके कारण अनेक बीमारियाँ फैल रही हैं। उस प्रदूषण को रोकना तथा वायु, जल और पृथ्वी को पवित्र करना हमारा परम कर्तव्य है। सब प्रकार के प्रदूषण को रोकने का एक ही मुख्य साधन है और वो है हवन। अनुसंधानों के आधार पर एक बार हवन करने से 8 किलोमीटर तक की वायु शुद्ध होती है तथा हवन के द्वारा ही ओज़ोन परत को सिर्फ बचा ही नहीं सकते बल्कि बना भी सकते है। हवन में बोले जाने वाले मंत्रों का मन एवं आत्मा पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। इनसे मानसिक, आत्मिक पवित्रता एवं शांति मिलती है।

(3) पितृयज्ञ - जीवित माता-पिता तथा गुरुजनों और अन्य बड़ों की सेवा एवं आज्ञापालन करना ही पितृयज्ञ है।

(4) अतिथियज्ञ - घर पर आए हुए अतिथि, विद्वान, धर्मात्मा, संन्यासी, संत-महात्माओं का भोजन आदि से सत्कार करके उनसे ज्ञानप्राप्ति करना ही अतिथियज्ञ कहलाता है।

(5) बलिवैश्वदेवयज्ञ - पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि ईश्वर ने हमारे कल्याण के लिए ही बनाए हैं। इनपर दया करना और इन्हें खाना खिलाना बलिवैश्वदेवयज्ञ कहलता है।

हमारे शास्त्र हमें प्रतिदिन पञ्च महायज्ञ करने का निर्देश देते हैं। वे हैं- ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, अतिथियज्ञ या भूतयज्ञ और बलिवैश्व देव। प्रत्येक गृहस्थ के लिए इन पाँचों महायज्ञों का अनुपालन करना आवश्यक माना जाता है। 

        इन यज्ञों के नाम पढ़कर कदाचित आप सोच रहे हैं कि शास्त्र क्या करने के लिए कह रहे हैं। निश्चिंत रहिए इन सभी यज्ञों को हम नित्य करते हैं परन्तु शायद अनजाने में और बिना नियम के। इनके विषय में आप जानिए।

         सबसे पहला यज्ञ कहा गया है- ब्रह्मयज्ञ। इसका अर्थ है प्रातः उठकर नित्य-नैमित्तिक कार्यों से निपटकर ईश्वर की उपासना करनी चाहिए। उसके बाद दुनिया के झमेले निपटाने चाहिएँ। जिसने इस संसार में जन्म दिया है उसकी स्तुति करते हुए उसका धन्यवाद करना चाहिए। वैसे इस भौतिक संसार में रहते हुए यदि कोई हमारी सहायता करता है या हमें लाभ पहुँचाता है तो हम शिष्टाचारवश उस मनुष्य को कृतज्ञता ज्ञापन करते हुए धन्यवाद देते हैं। जिस परमपिता परमात्मा ने इस धरती पर जन्म देकर हम पर महान उपकार किया है उसका आभार तो हमें प्रकट करना ही चाहिए। यह हमारा नैतिक दायित्व है जिसकी अपेक्षा शायद वह प्रभु भी हमसे करता होगा।

         दूसरा यज्ञ ऋषियों ने बताया है- देवयज्ञ। इसका अर्थ है सज्जनों की संगति करना। दूसरा अर्थ है सभी देवों को उनका भाग दिया जाए। सभी देवों से तात्पर्य है प्रकृति के कहे जाने वाले वे सभी देव जिनसे हम प्रतिदिन ग्रहण करते रहते हैं। दूसरे शब्दों में सूर्य जो हमें प्रकाश व ताप देता है, इन्द्र यानि बादल जिनके बरसने से हमें खाने के लिए अनाज व पीने के लिए जल मिलता है, वृक्ष जो हमें फल व छाया देते हैं। ये कुछ नाम गिनाए हैं इसी प्रकार अन्य सभी देव हैं।

         हमारा अपना परिवेश भी है जिसमें हम बदबू व गंदगी फैलाते हैं। इन सबको उनका भाग यज्ञ-हवन करके दे सकते हैं। यज्ञ की सामग्री, धूप व अगरबत्ती जलाकर इस यज्ञ को किया जाता है।

        तीसरा महायज्ञ पितृयज्ञ कहा गया है। जो अपने माता-पिता की सेवा करने के लिए कहता है। इसका अर्थ है उनकी सारी आवश्यकताओं को उनके बिना कहे पूरा करना व उन्हें यथोचित सम्मान देना जो उनको मिलना चाहिए। माता-पिता हमें इस संसार में लाकर हम पर महान उपकार करते हैं। उनके इस ऋण को हम आजन्म उनकी सेवा करके भी नहीं चुका सकते। यह हमें हमेशा याद रखनी चाहिए।

        चौथा यज्ञ है अतिथियज्ञ। हमारे घर में आने वाले साधु-संतो, मित्रों-संबंधियों आदि का यथोचित आदर-सत्कार करना अतिथियज्ञ कहलाता है। इस यज्ञ को करने का एक विशेष प्रयोजन है। वह यह है कि मनुष्य सामाजिक प्राणि है और अकेला नहीं रह सकता। इसलिए वह समाज से बहुत कुछ लेता रहता है। अत: मनुष्य का कर्त्तव्य बनता है कि वह समाज के हित के कार्य करे। अतिथि का सत्कार करना उसी का ही एक रूप है।

        पाँचवाँ है बलिवैश्वदेव यज्ञ जिसमें प्रतिदिन जो भी भोजन घर में बनाया जाए उसमें नमकीन, खट्टे और खार अन्न को छोड़कर घी और मीठे से युक्त अन्न को चूल्हे से अग्नि लेकर आहुति देते हैं। आजकल चूल्हे हैं नहीं तो वह अन्न चींटियों को भी डाल सकते हैं।

       इस प्रकार नियमपूर्वक इन यज्ञों को करने से हम अपने दायित्वों की पूर्ति कर सकते हैं जिससे हमें आत्मिक सुख मिलता है तथा इह लोक और परलोक दोनों में हम स्वर्ग-सुख का भोग कर पाते हैं, यही वेद का सन्देश है ।

 

स्त्रोत :- सोशल मीडिया