यहाँ तोहफे में दिए जाते हैं देशी बीज

दिंनाक: 14 Jun 2018 19:32:54


भोपाल(विसंके). हाल ही में एक वैश्विक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दुनिया में जैविक कृषि करने वाला हर तीसरा किसान भारतीय है. यह इस बात का संकेत है कि भारत में जैविक कृषि का चलन तेजी से बढ़ रहा है. दरअसल, हाइब्रिड बीजों की भरमार, रसायनों का अंधाधुंध उपयोग और इनकी वजह से तेजी से आने बिगड़ती मृदा स्वास्थय किसानों के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है. उन्हें यह बात अच्छे से समझ में आने लगी है की अपनी जमीन को बंजर बनाने से रोकना है तो जैविक कृषि की और लौटना होगा. मध्यप्रदेश में किसानों ने देसी बीजों की विरासत को बचाने की अनोखी पहल की है. देसी बीज के इन पहरेदारों ने अपने अभियान को मांगलिक समारोहों से भी जोड़ दिया है. ऐसे किसान परिवार जो शुन्य बजट यानी प्राकृतिक तरीके से न्यूनतम लागत की खेती से जुड़े हैं, उनके यहाँ शादी या अन्य मांगलिक कार्यक्रमों का बुलावा आता है तो वे उपहार के रूप में देशी बीज के पैकेट देते हैं. यह चलन यहाँ तेजी से बढ़ रहा है, जो जैविक कृषि के बढ़ते चलन की और भी इशारा करता है. मध्यप्रदेश में देसी बीज बचाने और उगाने वाले किसानों का समूह बन चुका है. पूर्णाशंकर बार्चे इनमे से एक हैं. उत्तराखंड में ख्यात पर्यावरणविद वंदना शिवा की नवधान्य संस्था और वर्धा के मगन संग्रहालय से प्रेरणा लेकर मध्य प्रदेश में इस अभियान की अलख जगाने वाले पूर्णाशंकर आठ साल से इस पर काम कर रहे हैं. मप्र में उन्होंने शून्य बजट खेती करने वाले करने वाले किसानों की पौध तैयार कर दी है. बार्चे बताते हैं कि पूरे प्रदेश में हम प्राकृतिक खेती के साथ देशी बीजों को बचाने के लिए किसानों को प्रेरित कर रहे हैं. पढ़े-लिखे युवा किसान इस बात की अहमियत को भलीभाँती समझते हैं. अभियान से जुडी इंदौर की वैशाली मालवीय बताती हैं कि खंडवा जिले के खालवा ब्लाक में आदिवासी गाँवो से उसने देसी अरहर के बीज इकट्ठा किये हैं. खरगोन जिले के बिस्टान में युवा किसान अविनाश दांगी ने आदिवासी किसानों से देशी लाल ज्वार के बीज इकट्ठा किये और अब वह उनका संरक्षण कर रहे हैं. होशंगाबाद जिले की बनखेड़ी तहसील के करधा गाँव के किसान मानसिंह गुर्जर देसी धान, दुर्लभ प्रजाति का सांवरिया (सांवा), बंशी गेहूं, मसूर के देशी बीज बचें के काम में लगे हैं.

हर साल मनाते हैं बीज उत्सव :-

महाराष्ट्र के वर्धा में मगन संग्रहालय की संचालिका डॉ. विभा गुप्ता देशी बीजों के संरक्षण और संवर्धन का काम कर रहीं हैं. वर्धा जिले की समुद्रपुर तहसील के गीरड गाँव में उन्होंने देशी बीज बनिक बनाया है. डॉ. गुप्ता बताती हैं कि यहाँ आस-पास के 60-70 गाँवों में हर साल बीज दान के नाम से बीज उत्सव मनाया जाता है. इस दौरान संस्था से जुड़े लोग गाँव में घूमकर किसानों से देशी बीज का दान मांगते हैं. फिर इन बीजों की छटनी करके इनमे से देसी व परंपरागत बीज अलग करते हैं. फिर ये बीज अन्य किसानों को इस शर्त पर बोने के लिए दिया जाता है कि अगले साल वे दोगुना बीज देंगे. 

देसी बीजों का फायदा :-

जानकारों के मुताबिक, देसी और हाईब्रिड, (संकर) बीज में बुनियादी फर्क यही है कि देसी बीज सहनशील होते है और विपरीत मौसमी परिस्थितियों में भी उत्पादन देता है. इसे रासायनिक खादों की जरूरत नहीं पड़ती . वहीँ संकर बीज जमीन से अधिक पोषक तत्व खींचता है और इस पर बीमारियाँ भी अधिक लगती हैं. यह अधिक संवेदनशील होता है.   

साभार:- म्हारा देश म्हारी माटी