21 जून / अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस - योग दर्शन के प्रणेता : महर्षि पतंजलि

दिंनाक: 21 Jun 2018 15:30:26


भोपाल(विसंके). प्राचीन भारत ने हमें गणित बीजगणित, ज्यामिति, त्रिकोणमिति,शून्य दशमलव खगोल विज्ञान ज्योतिष, आयुर्वेद, शल्य चिकित्सा, व्याकरण व दर्शन इत्यादि का महत्वपूर्ण ज्ञान प्रदान किया है। आज भी विश्व भारत प्रदत्त संस्कृत भगवत्गीता और योग से लाभ उठा रहा है। योग हिन्दुओं के छः दर्शनों- न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा व वेदान्त में से एक है। भारत में योग लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व वैदिक काल से शुरु हुआ था। महर्षि पतंजलि को आधुनिक योग विज्ञान का प्रणेता माना गया है। महान ऋषि पतंजलि उस समय समाज में प्रचलित व परीक्षण किये हुए योगिक अभ्यासों के संकलक, व्यवस्थापक और संहिताकार कहे जाते हैं। ध्यान में चेतना की उच्च स्थिति का अनुभव करने की तकनीकें प्राचीन वैदिक परम्पराओं में विकसित हुई और फिर महर्षि पतंजलि द्वारा उच्च स्तर तक विकसित की गयी।


भारतीय दर्शन साहित्य में पतंजलि के लिखे हुए तीन मुख्य ग्रंथ मिलते हैं। वे हैं- योग सूत्र, अष्टाध्यायी पर भाष्य और आयुर्वेद पर ग्रंथ। योगसूत्र में उन्होंने बताया है कि ‘योग मानसिक उतार चढ़ाव का अंत है।’ योग एक स्वस्थ मन और स्वस्थ शरीर का संगम है। उसका अंतिम लक्ष्य है- परम ब्रह्म के साथ एकाकार होना। योग का सम्पूर्ण सिद्धांत मन के परे जाना है। पतंजलि ने पाणिनि के अष्टाध्यायी पर भी अपनी टीका लिखी जिसे ‘महाभाष्य' का नाम दिया। पतंजलि ने इस ग्रंथ की रचना कर पाणिनि के व्याकरण की प्रामाणिकता पर अंतिम मुहर लगा दी थी। वे अलौकिक प्रतिभा के धनी थे।

चिकित्सा व रसायन शास्त्र पर भी इनका समान रूप से अधिकार था। व्याकरण शास्त्र में तो उनकी बात को अंतिम प्रमाण समझा जाता है। उन्होंने अपने समय के जन जीवन का पर्याप्त निरीक्षण किया था। अतः ‘महाभाष्य' व्याकरण का ग्रंथ होने के साथ-साथ तत्कालीन समाज का विश्वकोष भी है। विद्वानों के अनुसार पतंजलि का जन्म गोनार्ध (गोण्डा, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। लेकिन बाद में वे काशी में नागकूप में बस गये थे। लोकमान्यताओं में पतंजलि को शेषनाग का अवतार माना गया है। इतिहासकारों के अनुसार पतंजलि का जन्म ईसा से दो शताब्दी पूर्व हुआ था। व पुष्यमित्र तुंग के शासन काल (195-142 ई.पू) में थे। राजा भोज ने इन्हें तनमन और वचन का चिकित्सक कहा है। मन की शुद्धि के लिये योग (योगसूत्र, वाणी की शुद्धि के लिये व्याकरण (महाभाष्य) और तन की शुद्धि के लिये वैद्यक शास्त्र (चरक सहिंता) पतंजलि की विश्व को अनुपम देन है।

पतंजलि के अष्टांग योग में धर्म और दर्शन की समस्त विद्या का समावेश तो हो ही जाता है साथ ही शरीर और मन के विज्ञान को पतंजलि ने योग सूत्र में अच्छे से व्यक्त किया है। महर्षि पतंजलि ने योग के 195 सूत्रों का प्रतिपादन किया जो योग दर्शन के स्तम्भ माने जाते हैं। पहले से ऋग्वेद, अथर्ववेद और उपनिषदों में बिखरे हुए योग के सिद्धांतों को पतंजलि ने दार्शनिक रूप प्रदान किया। उन्होंने योग के आठ आधार माने हैं- यम, नियम आसन प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। बिना एकाग्रता, बिना समाधि और बिना प्रकृति की सारी शक्तियों के संतुलन के योग साधना सम्भव नहीं है।

पाश्चात्य शारीरिक शिक्षा में केवल शरीर की उन्नति और मांसपेशियों को पुष्ट बनाने पर बल दिया जाता है जबकि योग में शरीर, मन और आत्मा एवं उसके प्रत्येक अवयव और अंग के विकास को महत्व दिया जाता है। वे ज्ञानयोग, भक्तियोग एवं कर्मयोग के संयोग को ही योग की पूर्णता मानते हैं। वे अपने युग के तो महान योगी थे ही, उन जैसा योगी शायद भविष्य में भी नहीं हो सकेगा क्योंकि वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथसाथ आध्यात्म की भी यात्रा करते हैं। वे तर्क संगत हैं, बुद्धिजीवियों को स्वीकार्य हैं, साथ ही विवेकपूर्ण श्रद्धाभक्ति, सत्य एवं समर्पण का समर्थन करते हैं।

साभार:- गर्जना महाकोशल जबलपुर