प्रारंभिक शिक्षा का बाजारीकरण

दिंनाक: 22 Jun 2018 16:51:58


भोपाल(विसंके). इन दिनों देश के ज्यादातर हिस्सों में स्कूलों में दाखिलों का दौर चल रहा है. हर तरह के अच्छे स्कूलों में प्रवेश को लेकर मारामारी है. इनमे प्री-स्कूल भी शामिल है. बीते कुछ समय से अभिभावकों को प्री स्कूलों में भी बच्चों को प्रवेश दिलाने के लिए खासी दौड़-धूप करनी पड़ती है. इतना ही नहीं फीस के एवज में एक बड़ी रकम भी खर्च करनी पड़ती है. यह किसी से छिपा नहीं कि अब शहरी इलाकों के साथ-साथ किस तरह ग्रामीण इलाकों में भी प्री-स्कूलों को खोलने की होड़ है. इस होड़ ने एक ऐसा माहौल बना दिया है कि बच्चों को प्लेग्रुप, नर्सरी, केजी, आदि भेजना आवश्यक सा हो गया है. एक समय कच्चे एक पक्के-एक वाली व्यवस्था ने अब अनावश्यक विस्तार ले लिया है. पिछले दिनों लर्निंग ब्लॉक के एक सर्वे से यह बात सामने आई थी कि सरकारी शिक्षा धीरे-धीरे  निजी स्कूलों की और खिसक रही है. ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के प्राथमिक सरकारी स्कूल केवल गरीब एवं पिछड़े परिवारों के बच्चों तक सीमित होकर रह गए हैं. इन विद्यालयों का शैक्षिक वातावरण शून्य हो गया है. और शिक्षक शिक्षण कार्य के अलावा अन्य सभी काम करते दिखते हैं.


सरकारी प्राथमिक शिक्षा के कमजोर तंत्र का फायदा निजी स्कूल उठा रहे हैं. प्री-स्कूल पढ़ाई के स्तर को देखें तो ज्ञात होता है कि बच्चे की अनौपचारिक पढ़ाई के कई कारण हैं.- प्लेग्रुप, एलकेजी और यूकेजी. अनौपचारिक शिक्षा का यह प्रतिमान पश्चिम से चलकर भारत आया है. प्री-स्कूल अंग्रेजी शिक्षा का इतिहास बताता है इस शिक्षा का सिलसिला 18वीं शताब्दी में औद्योगिक व्यवस्था के चलते कायम हुआ. ऐसे माता-पिता जो फेक्ट्रियों में कार्यरत थे उनके परिवार बिल्कुल एकल थे. ऐसे परिवारों के बच्चों के लिए पालन पोषण और प्राथमिक शिक्षा का कोई उचित प्रबंध नहीं था. इस प्रकार के परिवारों के बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए प्री-स्कूलों का प्रबंध किया गया. ताकि कार्यशील एकल परिवारों के बच्चों को इन स्कूलों में परिवार जैसा माहौल मिल सके इसका एक दुष्परिणाम यह हुआ कि पश्चिम में जन्मदर में गिरावट आनी शुरू हुई और आज तमाम देश ऐसे हैं. जहाँ युवाओं के मुकाबले वृद्धों की संख्या अधिक होती जा रही है चूँकि अब वहां वृद्ध भी वृद्धाश्रम की शरण ले रहे हैं इसलिए बच्चों के समाजीकरण करने और उन्हें दुनिया की जिंदगी से रूबरू कराने वाला कोई बचा ही नहीं. पश्चिम की तरह भारत में भी यह प्री-स्कूली शिक्षा फल फूल रही है. यह सिलसिला उदारीकरण की प्रक्रिया लागू होने के बाद ज्यादा तेज हुआ है. शहरों में ऐसे एकल परिवार तेजी से बढे हैं जिसमे पति पत्नी दोनों नौकरी करते हैं. ऐसे दम्पति अकेले रहते हैं इसलिए बच्चों को प्री स्कूली शिक्षा के हवाले करना बेहतर समझते हैं. इसके बदले उन्हें अच्छी खासी फीस चुकानी पड़ती है. भारत जैसे देश में जहाँ अभी भी परिवार व्यवस्था है. वहां प्री-स्कूली शिक्षा के एक उद्योग में तब्दील होने का कोई औचित्य नहीं है. एक समस्या यह भी है कि प्री-स्कूल जाने वाले बच्चे समय से पहले माँ-बाप के नैसर्गिक प्रेम से वंचित हो रहे हैं. बाल मनोविज्ञान कहता है कि पांच साल की उम्र बच्चों के विकास की सबसे संवेदनशील अवधि होती है. यह वह अवस्था होती है जब बच्चे परिवार और दुनिया के बीच तालमेल बिठाता है. भले ही प्री-स्कूली संस्थाएं काम-काजी परिवारों के लिए एक सहारा बन रहीं हैं. लेकिन उनके अनिवार्य होते जाना शुभ संकेत नहीं है. कहना कठिन है कि नयी शिक्षा नीति तैयार करने वाले इस पर ध्यान देंगे या नहीं प्री-स्कूली शिक्षा कितनी आवश्यक है ? जो कार्य आज-कल प्री-स्कूल कर रहे हैं वह एक समय घर के बड़े बुजुर्ग किया करते थे. एकल परिवारों के चलते अब ऐसा होना थोडा कठिन है लेकिन इसका मतलब यह नहीं की प्री-स्कूली शिक्षा के ढांचे पर कोई ध्यान न दें. जहाँ यह जरूरी है कि वर्तमान की प्रतिस्पर्धा को ध्यान में रखा जाये. वहीँ यह भी कि बाल मनोविज्ञान की अनदेखी न होने पाए.

साभार :- म्हारा देश म्हारी माटी

लेखक - विशेष गुप्ता