क्या राष्ट्रपति शासन से सुधर पायेगी कश्मीर समस्या ?- कृष्णमोहन झा

दिंनाक: 22 Jun 2018 16:43:53


भोपाल(विसंके). जम्मू कश्मीर में 6 माह के लिए राज्यपाल का शासन लागू कर दिया गया है।राज्यपाल एन एन वोहरा चौथी बार ये जिम्मेदारी संभालने के लिए तैयार है। उनका जून माह में समाप्त हो रहा कार्यकाल तीन माह औऱ बढ़ा दिया गया है। एनएन वोहरा को राज्यपाल शासन के तहत प्रशासनिक जिम्मेदारी संभालने का दीर्घ अनुभव है, इसलिए यह उम्मीद की जानी चाहिए कि उनके निर्देशन में पुलिस व सुरक्षा बलों को आतंकवाद की समस्या से निपटने के लिए पहले से कही अधिक सफलता मिलेगी। यही बात राज्य के पुलिस महानिदेशक एसपी वैद्य ने भी कही है। उन्होंने यह भी माना है कि राज्य में रमजान के महीने में एकतरफा संघर्ष विराम से आतंकियों को फायदा मिला है। पुलिस के पास उनकी जानकारी होने के बाद भी संघर्ष विराम के कारण उनके खिलाफ कोई आपरेशन नही किया जा सका था।

 
थलसेना अध्यक्ष विपिन रावत ने कहा कि राज्यपाल के शासन से हमारे अभियान पर कोई असर नही पड़ेगा। सेना को राजनीतिक दखल का सामना नही करना पड़ता है। इन बयानों से स्पष्ट है कि पुलिस  को कही न कही पूर्ववर्ती मेहबूबा सरकार के दबाव का सामना करना पड़ रहा था। भाजपा द्वारा गठबंधन तोड़ने के बाद निःसंदेह आतंकियो के सफाए के लिए कठोर कदम उठाए जाएंगे। जम्मू कश्मीर में 6 माह तक राज्यपाल का शासन रहेगा। इन 6 माहों में आतंकियों को इस तरह नेस्तनाबूत कर दिया जाए कि 6 माह बाद कश्मीर में एक लोकप्रिय सरकार के गठन का मार्ग प्रशस्त हो जाए। इसमे भी कोई दो राय नही है कि मेहबूबा सरकार के कार्यकाल में आतंकी गतिविधियो में भयावह वृद्धि हुई है। पत्थरबाजी की घटनाओं में भी इजाफा हुआ है। इसलिए इन 6 माह में कम से कम ऐसा माहौल तो अवश्य बनाना चाहिए ,जिसमे राज्य के अमनपसंद लोग आगे आकर अपनी बात कह सके।
 
तीन साल बाद गठबंधन से अलग होने के फैसले के बाद पूर्व मुख्यमंत्री मेंहबूबा मुफ़्ती   ने हैरानी जताई है , लेकिन हैरानी की सबसे बड़ी बात यह है कि 26 माह तक गठबंधन में रहने वाली भाजपा ने कभी घुटन महसूस क्यों नही की? भाजपा नेतृत्व पर सवाल तो तभी से उठ रहे है ,जब उन्होंने पीडीपी के साथ मिलकर 1 मार्च 2015 को सरकार बनाई थी। दरअसल भाजपा को जम्मू कश्मीर में पहली बार सरकार बनाने का मौका मिला था, इसलिए खुशी के  कारण या कहे कि जानबुझकर आलाकमान ने इसके नफे नुकसान का आकलन तक नही किया। गौरतलब है कि जम्मू कश्मीर में बड़ी संख्या में हुए मतदान के लिए पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने पाकिस्तान को श्रेय दिया था, वही इस्तीफे के बाद मेहबूबा ने भी यह कहने से कभी परहेज नही किया कि कश्मीर समस्या को हल करने के लिए बातचीत में पाकिस्तान को शामिल करना चाहिए। इन सभी बातों को लेकर देश मे भाजपा की लगातार किरकिरी हो रही थी।
 
मेंहबूबा ने त्यागपत्र देने के बाद दो टुक कहा कि उनकी पार्टी अपने एजेंडे पर पूरी तरह कायम रही। पीडीपी का एजेंडा था, पत्थरबाजों के मुकदमे वापस लिए जाए, धारा 370 व जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य के दर्जे पर यथास्थिति बने रहे व रमजान के महीने में एकतरफा सीज फायर लागू किया जाए।इसलिए मुफ़्ती को कुर्सी खोने का गम नही है बल्कि इस बात की ज्यादा खुशी है कि वे अपने एजेंडे को लागू करने में पूरी तरह कामयाब रही है। गौरतलब है कि जम्मू कश्मीर में विधानसभा परिणामों के बाद दोनों दलों ने 50 से अधिक दिन सत्ता की शर्तें तय करने में गुजार दिए थे, लेकिन जब सत्ता की तैयारी हो गई तो सबसे अधिक समझौते की मुद्रा में भाजपा ही खड़ी नजर आई। मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने कश्मीरी पंडितों की वापसी का फार्मूला तय करके भाजपा की आकांक्षाओं को पूरा करने की कोशिश भर की थी ,लेकिन उनके निधन के बाद मामला पूरी तरह ठंडे बस्ते में चला गया। इसके उलट आतंकी घटनाओं में ओर तेजी आ गई। 
 
कश्मीर में सेना का ऑपरेशन ऑल आउट मेहबूबा को कभी नही भाया। रमजान के माह में उनके अनुरोध पर ही आपरेशन के स्थगन की घोषणा  केंद्र सरकार ने की थी ,लेकिन जब इस दौरान आतंकी घटनाओं में कोई कमी नही आई ,तब भी केंद्र द्वारा इसे दोबारा शुरू करने के आदेश के पक्ष में महबूबा कभी खड़ी दिखाई नही दी। वे अमरनाथ यात्रा के दौरान भी इसके स्थगन के पक्ष में ही थी, जबकि वह यह भरोसा दिलाने की स्थिति में नही थी कि इस दौरान कोई आतंकी घटना नही होगी। इसमे भी कोई दो राय नही है कि यदि रमजान के महीने में आतंकी घटनाएं बड़ी नही होती तो केंद्र सरकार इसके स्थगन की अवधि बढ़ाने के लिए राजी हो सकती थी। अब चूंकि इस फैसले से जो भी नुकसान हुए है उसे लेकर केंद्र सरकार को जवाब देना चाहिए कि ,जब आपरेशन ऑल आउट को रमजान के महीने में रोकने पर पूर्व सेना अधिकारियों एवं अन्य वर्गों के लोगो ने इसे स्थगित न करने का परामर्श दिया था तो उसे नजरअंदाज क्यों किया गया?भाजपा इस कढ़वी हकीकत से अब इंकार नही कर सकती है कि वह पीडीपी के साथ सरकार में साझीदार होने के कारण सारे फैसलों के लिए जिम्मेदार थी ।आज भाजपा को यह पछतावा जरूर हो रहा है कि 10 हजार से अधिक पत्थरबाजों का मुकदमा वापस लेकर उसने बड़ी गलती की है। उस दौरान केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कश्मीर प्रवास के दौरान तो यह कहा था कि बच्चों को ढाल बनाकर कुछ लोग राजनीति कर रहे है, इसलिए इस सोच को ध्यान में रखते हुए पत्थरबाजों के खिलाफ लगे मुकदमे वापस लिए जा रहे है। परन्तु क्या अब केंद्र या राज्य सरकार को इस बात की जानकारी है कि मेहबूब सरकार द्वारा जिन पत्थरबाजों को आम माफी दी गई थी उनमें से कितने पत्थरबाज मुख्यधारा में लौटकर आए है। महबूबा मुफ्ती ने तो इस्तीफे के बाद अपने इस फैसले को सही ठहराया है लेकिन अब यह भाजपा पर इसे लेकर जरूर सवाल उठ रहे है।
 
भाजपा ने जम्मू कश्मीर सरकार में रहने के लिए कदम कदम पर समझौते किए। वह पूरे समय अपनी मांगों को मनवाने में सफल नही हो सकी। पीडीपी को कश्मीर से ही 28 सीटें मिली थी इसलिए मेहबूबा ने हमेशा जम्मू व लद्दाख के विकास की उपेक्षा की व कश्मीर के विकास पर ही हमेशा ध्यान केंद्रित किया। इससे जम्मू व लद्दाख में भाजपा का जनाधार कमजोर होने लगा। सवाल यह उठता है कि सत्ता में भागीदार होने के बाद भी वह महबूबा पर जम्मू व लद्दाख के विकास का दबाव क्यों नही बना पाई । भाजपा ने यह आरोप भी लगाया कि जम्मू कश्मीर के लिए दिया गया केंद्र के 80 हजार करोड़ के विशेष पैकेज का उपयोग मेहबूबा ने पूरी तरह नही किया। आखिरकार सत्ता में भागीदार होते हुए भी भाजपा ने इस तथ्य की अनदेखी क्यो करती रही। दरअसल भाजपा आज जिन मसलों को लेकर मेहबूबा को कठघरे में खड़ा कर रही है उससे वह स्वयं भी दोषमुक्त नही हो सकती है। यदि जम्मू कश्मीर में सत्ता जारी रहती तो भाजपा को आगे औऱ समझौते करने पड़ सकते थे। यह भी संभव हो सकता था कि मेहबूबा अपना जनाधार बनाए रखने के लिए पहले स्वयं ही भाजपा से नाता तोड़ लेती।  तब भाजपा के लिए स्थिति और खराब हो जाती। अब चुकी भाजपा ने पहले रिश्ता तोड़ लिया है तो अतः अब  यह तो कह सकते है कि देर से आए लेकिन दुरुस्त आए।