यज्ञ की आवश्यकता और वैज्ञानिकता

दिंनाक: 23 Jun 2018 14:23:42


भोपाल(विसंके). सामान्यतः प्रातः जागरण से लेकर रात्रि शयन पर्यन्त हम अनेक कर्मों को करते जाते हैं परन्तु यह विचार नहीं करते कि उन कर्मों में कितना पुण्य हो रहा है अथवा कितना पाप हो रहा है । प्रत्येक क्षण मनुष्य श्वास (ओक्सिजेन) लेता रहता है और प्रश्वास (कार्बनडाईओक्साइड) को छोड़ता रहता है । हमारी दैनिक दिनचर्या में जब हम किसी भी पदार्थ का प्रयोग करते हैं और वह अशुद्ध हो जाता है तो उसको हमें ही शुद्ध करना होता है ।
जैसे कि वस्त्र का प्रयोग करते हैं, प्रयोग के बाद जब मलिन हो जाता है, तब उसको साफ भी हम ही करते हैं । जब अपने कमरे का प्रयोग करते हैं, तो कमरे की शुद्धि भी हम करते हैं । जब हम भोजन के लिए जिन वर्तनों का प्रयोग करते हैं तो प्रयोग के बाद उसकी सफाई भी हम ही करते हैं । ठीक इसी प्रकार वायु मंडल में से हर क्षण शुद्ध वायु (ओक्सिजेन) का प्रयोग करते रहते हैं और निरन्तर अशुद्ध वायु (कार्बनडाईओक्साइड) को छोड़ते हुए वातावरण को दूषित करते रहते हैं ।

अभी हमने विचार किया कि जिन वस्तुओं का हमने प्रयोग किया उसको साफ भी हमने ही किया, जब वायु का प्रयोग करते हुए हमने वायुमंडल को दूषित कर दिया तो क्या हमारा कर्त्तव्य नहीं बनता है कि वातावरण की शुद्धि भी हम ही करें ? ईश्वर प्रदत्त बुद्धि से यदि हम निष्पक्ष भाव से विचार करें तो यह समझ में आएगा कि यह हमारा ही कर्तव्य है जिसे हमें अवश्य ध्यान देना चाहिए ।

जिस प्रकार हम किसी भी वस्तु की शुद्धि करते हैं, तो उसके लिए कुछ न कुछ साधन जरुरी होता है, जैसे कि वस्त्र धोने के लिए सर्फ़ पाउडर या डिटर्जेंट-टिकिया रूपी साधन का प्रयोग करते हैं, वर्तन धोने के लिए भी इसी प्रकार कोई साधन का प्रयोग करते हैं, अपने कमरे में भी शुद्धि करते हैं तो झाड़ू-पौंछा आदि साधनों की आवश्यकता होती है।

ठीक ऐसे ही वातावरण या वायुमंडल को शुद्ध करने के लिए भी एक अत्यन्त उपयोगी व महत्वपूर्ण साधन ऋषियों ने बताया है, वह है यज्ञ-हवन अथवा अग्निहोत्र करना । इस हवन रूपी प्रक्रिया से वातावरण की शुद्धता तो होती ही है उसके साथ मनुष्यों व अन्य प्राणियों में पाए जाने वाले अनेक प्रकार के रोगों को भी यह नष्ट करने में सक्षम है । अतः हम सभी को अत्यन्त गंभीरता पूर्वक विचार करना चाहिए और इस क्षेत्र में सजग-सावधान होते हुए अन्यों को भी जागरूक करना चाहिए और नित्य प्रति अपने परिवारों में हवन करते हुए स्वस्थ, सबल और निरोग रहते हुए दीर्घायु को प्राप्त करें । 

यज्ञ करने से, वातावरण में विचरण कर रहे तथा छुपे हुए रोग के कीट नष्ट हो जाते हैं। इन जीवों के नष्ट होने से, इस से उत्पन्न होने वाले रोग भी नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार जो शक्ति रोग पैदा करने वाली होती है, वह नष्ट होने से रोग भी नष्ट हो जाते हैं। इस पर मन्त्र प्रकाश डालते हुए कह रहा है कि - विश्वा अग्नेऽप दहारातीर्येभिस्तपोभिरदहो जरूथम्। प्र निस्वरं चातयस्वामीवाम्॥ (ऋ.07.1.7) इस मन्त्र में प्रभु से प्रार्थना करते हुए यज्ञ की अग्नि को संबोधन किया गया है तथा प्रार्थना की गयी है कि यज्ञ से कष्टों का नाश मन्त्र उपदेश करते हुए कहता है कि हे यज्ञाग्ने ! आप ही अपनी तेज अग्नि के बल पर, तेज गर्मी के बल पर सब कष्टों को दूर करते हैं।

हम जानते हैं कि यज्ञ की अग्नि को तीव्र करने के लिए , अग्नि को प्रचंड करने के लिए इस में उतम घी तथा उतम औषधियों से युक्त सामग्री की आहुतियाँ दी जाती है| इन में पौष्टिकता होती है, यह सुगंध से भरपूर होती है, इस में उतम उतम रोग नाशक बूटियाँ डाली जाती हैं और इस के साथ ही साथ इसमें डाली जाने वाली घी व सामग्री में अग्नि को तीव्र करने की शक्ति भी होती है. यज्ञ करते समय हम कुछ वेद मन्त्रों का भी गायन करते हैं. यह मन्त्र गायन भी सुस्वास्थ्य के लिए उपयोगी होते है. इस प्रकार मन्त्र के माध्यम से हम प्रभु से प्रार्थना है करते हैं कि हे प्रभु! इस वायुमण्ड्ल में जितने भी प्राणी हमें हानि देने वाले हैं, जितने भी प्राणी हमें रोग देने वाले हैं, उन्हें भस्म कर दो, नष्ट कर दो।, उन्हें अपनी अग्नि में भस्म कर दो। अर्थात् जब हम यज्ञ करते हैं तो इस में डाली जाने वाली सामग्री में एसे पदार्थ डाल कर इसे करते हैं, जिन की ज्वाला निकलने वाली गैसों से यह रोग के कीटाणु स्वयमेव ही नष्ट हो जाते हैं। यदि कोई कीटाणु बच भी जाता है तो यज्ञ की इस अग्नि में जल कर नष्ट हो जाता है।

यज्ञ से रोगाणुओं का नाश होता है, हमारे अन्दर समय समय पर अनेक कारणों से रोगाणु पैदा होते रहते हैं. जब यह रोगाणु हमारे शरीर की शक्तियों से कहीं अधिक शक्तिशाली हो जाते हैं । इन की शक्ति हमारे अन्दर की शक्तियों से अधिक हो जाती हैं तो इस का परिणाम जो हम जानते हैं वही होता है अर्थात् हम रुग्ण हो जाते हैं । हम जानते हैं कि शल्य सदा कमजोर पर अथवा शक्ति विहीन पर ऐसा भयंकर आक्रमण करता है , राक्षसी वृति के लोगों के सम्बन्ध में भी कुछ ऐसा  ही कहा जाता है कि जब वह सामने वाले को कमजोर पाते हैं, तो वह उस पर चारों और से ऐसा  भयंकर आक्रमण करते हैं कि सामने वाला जब तक उसे कुछ समझ में आता है और वह संभलने की सोचता है, तब तक वह राक्षसों से इस प्रकार घिर जाता है कि उससे निपट पाना उसके लिए कठिन हो जाता है , उनका प्रतिरोध उस की शक्ति में रहता ही नहीं । इस कारण वह या तो नष्ट हो जाता है और या फिर आत्म समर्पण कर देता है कि हमारा शरीर इस कष्ट से तप्त हो जाता है । कुछ ऐसी ही अवस्था शरीर में पल रहे रोगाणुओं की, जैसे ही यह शरीर को कमजोर पाते हैं तो वह इस शरीर पर ऐसा आक्रमण करते हैं कि हम संभल ही नहीं पाते ।

 इनके दिए ताप से तप्त होकर हम स्वयं को शक्ति विहीन सा अनुभव करते हैं और शीघ्र ही शिथिल होकर बिस्तर को पकड़ लेते हैं । अनेक बार तो यह रोग हमारी मृत्यु का कारण भी बनते हैं । इसलिए रोग की जो तापक शक्ति होती है , उससे बचने के लिए जब हम यज्ञ करते हैं तो यज्ञ करते हुए इस के साथ हम यज्ञ देव से यह प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हे अग्निदेव ! उस को तूं नष्ट करके हमें स्वस्थ कर अर्थात् हे यज्ञाग्नि इन रोगाणुओं की तापक शक्ति को नष्ट कर हमें स्वस्थ बना । 

इस सब का भाव यह है कि यह यज्ञ की अग्नि रोग की तापक शक्ति को नष्ट कर देता है। इस अग्नि के तेज से रोग के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं तथा जो जन प्रतिदिन दोनों समय यज्ञ करते हैं अथवा जो लोग यज्ञ स्थल के समीप निवास करते हैं, यह यज्ञ की अग्नि उनके अन्दर बस रहे रोग के कीटाणुओं का भी नाश कर देती हैं । इस प्रकार उसके शरीर के अन्दर के कीटाणुओं के नष्ट होने से वह निरोग हो जाता है। इस यज्ञ से उस के अन्दर इतनी प्रतिरोधक शक्ति आ जाती है कि रोग के कीटाणु भयभीत हो कर इस शरीर से दूर भागने लगते हैं और अब रोग के यह कीटाणु किसी रोग की उत्पति के लिए यज्ञकर्ता पर आक्रमण करने का साहस ही नहीं कर पाते। इससे धीर धीरे यह रोग ओझल ही हो जाता है। इस सब से यह तथ्य सामने आता है कि यज्ञ और इसकी अग्नि हमारे शरीर को सदा स्वस्थ रखने का एक बहुत बड़ा साधन है । स्वास्थ्य लाभ के लिए हम प्रतिदिन दो काल उतम सामग्रियों से यज्ञ करें.