जम्मू-कश्मीर, भाजपा और देश भक्ति

दिंनाक: 23 Jun 2018 17:09:10


भोपाल(विसंके). बीजेपी के साथ गठबंधन सरकार बनाते वक्त जिस साझा विकास के एजेंडे पर चलकर राज्य को देश के अन्य राज्यों की तरह ही विकास की मुख्यधारा में लाने का वादा किया था, वह उससे इतर अपने ही साम्प्रदायिक और राष्ट्रद्रोही लक्ष्य पर चलती रही हैं, जिससे न केवल देश को अपने अनेक जांबाज सैनिक गंवाने पड़े, बल्कि महबूबा सरकार के रहते विकास की बात दूर की कौड़ी साबित हुई।
ध्यान देने वाली बात है, आखिर देशभर में तमाम विरोध झेलने के बाद भी इस राज्य में वैचारिक रूप से धुर विरोधी पार्टी के साथ सरकार बनाने के लिए बीजेपी राजी क्यों हो गई थी। उत्तर इसका सीधा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जम्मू-कश्मीर का पूरा विकास चाहते हैं। बीजेपी के साथ सभी राष्ट्रवादियों का मानना है कि राज्य में सिर्फ कश्मीर घाटी क्षेत्र के विकास पर ही ध्यान केंद्रित न करते हुए जम्मू और लद्दाख क्षेत्र के विकास पर ध्यान देते हुए पूरे जम्मू-कश्मीर का समग्र विकास होना चाहिए। यह एक विडम्बना है कि राज्य में सबसे अधिक राजस्व देने वाला क्षेत्र जम्मू है, किंतु सुविधाओं के स्तर पर देखें तो यह कश्मीर के मुकाबले बुरी हालत में है। जनसंख्या घनत्व में जम्मू का इलाका कश्मीर से ज्यादा है, किंतु विधानसभा की सीटें कश्मीर में अधिक हैं। यानि कुल मिलाकर जो समग्र विकास इस राज्य का होना चाहिए था, वह कहीं न कहीं इस्लामिक मानसिकता के कारण अभी तक नहीं हो सका है। ऐसा इसलिए भी कहा जा रहा है, क्योंकि देश के किसी भी राज्य के मुकाबले जम्मू-कश्मीर में मुस्लिम आबादी का अनुपात सबसे अधिक है। यहां करीब दो-तिहाई आबादी मुस्लिम है। शेष तिहाई हिस्सा हिंदुओं, सिखों और बौद्धों का है। यहीं से भारत में इस्लाम का आगमन हुआ। यहां लद्दाख बौद्ध धर्म के क्रियाशील रहने का सर्वोच्च स्थान है, किंतु विकास में पिछड़ा हुआ है।

आजादी के बाद सरकार किसी की भी रही हो, विकास के एजेंडे को पूरा करने में सभी का ध्यान सबसे अधिक कश्मीरी क्षेत्र पर ही रहा है। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि इसी कश्मीर में अलगाववाद भी आजादी के बाद से ही विकसित होता रहा है। सेना पर पत्थर बरसाने वाले, आतंकवादी वारदातों को अंजाम देने वाले, खुले तौर पर पाकिस्तानी झंडा लहराने वाले, मस्जिदों और घरों में आतंकवादियों को पनाह देने वाले नौजवान और अन्य लोग जम्मू या लद्दाख से नहीं आते, वे इसी कश्मीर घाटी क्षेत्र के ही होते हैं। ऐसे में एक उम्मीद की किरण शायद बीजेपी की ओर से देखी गई थी कि विकास के समग्र एजेंडे पर चलकर समूचे राज्य का विकास पीडीपी के साथ राजनीतिक गठबंधन करने से संभव हो जाए। पिछले तीन सालों तक बीजेपी ने गंभीरता से इसके लिए अपना धैर्य भी बनाए रखा, आज नहीं तो कल महबूबा मुफ्ती इस बात को गंभीरता से समझेंगी, यह आशा भी बनाए रखी। लेकिन, यहां इस गठबंधन के साथ यह आशा व्यर्थ साबित हुई।

महबूबा शुरू से ही राज्य ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के समकक्ष रखकर संवैधानिक पदों पर आसीन लोगों से सम्मान दिलवाने के लिए आतुर दिखीं। मार्च 2015 में इस बाबत आदेश भी जारी कर दिया गया, लेकिन बीजेपी के विरोध और आक्रामक रुख के कारण उन्हें अपना आदेश वापस लेना पड़ा। सेना पर पत्थर बरसने वाले 11 हजार नौजवानों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले महबूबा ने वापस ले लिए, जिसके कारण पत्थरबाजों के हौसले देशद्रोह की राह पर चलने के लिए अभी भी बुलंद बने हुए हैं। बीफ बैन और गोवंश की हत्या के खिलाफ कानून के अनुपालन को लेकर कभी भी इस्लाम परस्त पीडीपी इसके समर्थन में नहीं आई, जबकि उसे सनातनी हिन्दू समाज की भावनाओं के आदर के लिए इसके समर्थन में होना चाहिए था। इस विषय पर महबूबा की बेशर्मी यह है कि गठबंधन समाप्त होने के बाद इस मु्द्दे पर वह कह रही हैं कि गोरक्षकों के आतंक को समाप्त करने का काम उन्होंने सरकार में रहते हुए किया है। महबूबा सरकार से बाहर होने के बाद कह रही हैं कि हमने अनुच्छेद 370 का संरक्षण किया है और अनुच्छेद 35ए को भंग करने की कोशिशों को नाकाम बनाया है। किंतु देश क्या चाहता है? बीजेपी के साथ अधिकांश देशभक्तों का मानना यही है कि इन दोनों धाराओं को अतिशीघ्र हटा देना चाहिए, यहां अलगाववाद की जड़ का एक बड़ा कारण ये धाराएं हैं। इसीलिए पिछले साल 35ए को भंग करने के लिए न्यायालय में याचिका तक दायर की गई। मामला अदालत में विचाराधीन है। रोहिंग्या शरणार्थियों को राज्य की शांति और कानून व्यवस्था के लिए खतरा बताए जाने के बावजूद इस्लाम के आधार पर पीडीपी ने इन लोगों को राज्य से बाहर करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए।

जम्मू में राष्ट्रवादी लोग आंदोलन करते रहे, लेकिन बीजेपी को छोड़ कश्मीर में अलगाववादियों के स्वर में स्वर मिलाते अन्य दलों द्वारा शुरू की गई राजनीति और मुस्लिम कार्ड खेले जाने पर पीडीपी भी रोहिंग्या के समर्थन में दिखाई दी। इतना ही नहीं, महबूबा केंद्र की मोदी सरकार पर बार-बार पाकिस्तान व अलगाववादियों से बातचीत करने के लिए दबाव बनाने का प्रयत्न करती रहीं, जबकि वे जानती थीं कि पाकिस्तान व अलगाववादी किस हद तक आतंकवाद को राज्य में प्रश्रय दे रहे हैं। इसके अतिरिक्त महबूबा के दबाव में ही रमजान के दौरान संघर्ष विराम के लिए केंद्र सरकार तैयार हुई। वास्तव में यह झुकाव इसलिए था कि शायद सीजफायर के बाद अलगाववादियों का मन बदले और वे देश की मुख्यधारा का हिस्सा बनने के लिए आगे आएं। किंतु हुआ क्या? पूरी दुनिया ने देखा कि रमजान के पवित्र महिने के दौरान कश्मीर में आतंकवादी वारदातें बढ़ गईं। पत्थरबाजों के हौसले बुलंद होते गए। हमारे कई सैनिक शहीद हो गए। यहां तक कि देशहित की बात करने वाले पत्रकार सुजात बुखारी की श्रीनगर में सरेआम हत्या कर दी गई।

कहना होगा कि महबूबा और उनकी पार्टी पीडीपी ने यहां सत्ता में रहकर अपनी ताकत ही बढ़ाई है और बीजेपी के हाथों कुछ नहीं लगा, जिस राष्ट्रीय सोच को लेकर बीजेपी ने यहां पीडीपी के साथ गठबंधन कर सरकार बनाई थी, उसके उलट घाटी में आतंकवाद, कट्टरवाद बढ़ा है और आम लोगों के अधिकारों पर खतरा मंडराता नजर आया है। ऐसे में बीजेपी का गठबंधन से दूर होने का कदम एक सही फैसला कहा जा सकता है। जहां तक इसको लेकर हो रही आलोचनाओं का प्रश्न है, तो राजनीति हमेशा भविष्य के आशावाद और प्रयोगवाद पर विश्वास करती आई है। कहना होगा कि बीजेपी का गठबंधन भी यहां इसी सोच पर आधारित रहा है, इसलिए उसके लिए चिंता की कोई बड़ी बात नहीं।जब तक नीयत साफ है सब ठीक है।