हरियाणा के राखीगढ़ी में हुई पुरातात्विक खोज ने आर्यों के आक्रमण का सिद्धांत खारिज किया |

दिंनाक: 25 Jun 2018 16:48:09


भोपाल(विसंके). आर्यों के आक्रमण की बात करने वाला सिद्धांत कहता है कि बेहतर ज्ञान, कौशल वाले और हथियारों से लैस मध्य एशिया से आए घुमंतू लोगों ने उस वक्त की बस्तियों पर हमला किया और भारत में ज्यादा आधुनिक सभ्यता की नींव रखी। इस सिद्धांत के मुताबिक, आर्यों ने मूल निवासियों को दक्षिणी हिस्से की ओर धकेल दिया।


राखीगढ़ी हरियाणा के हिसार के पास है। वहां हड़प्पाकालीन बसावट के अवशेष 300 हेक्टेयर में फैले मिले हैं। इसे हड़प्पा काल की चुनिंदा बड़ी बसावटों में शामिल किया जाता है। यहां 6000 साल पहले लोग रहा करते थे। यहां की बसावट हड़प्पा काल के उन्नत दौर की मानी जाती है।

राखीगढ़ी से मिले मानव डीएनए से साफ पता चल रहा है कि उसमें लोकल एलिमेंट यानी माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए बहुत मजबूत है। कुछ मामूली विदेशी अंश है, जिससे बाहर की विदेशी आबादी से कुछ मिक्सिंग का पता चलता है, लेकिन डीएनए साफ तौर पर लोकल है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि आर्यों के कथित आक्रमण के सिद्धांत में कोई दम नहीं है। 

- प्रोफेसर वसंत शिंदे, राखीगढ़ी में उत्खनन की अगुआई कर रहे पुरातत्वविद  अनुभूति विश्नोई (ईटी), नई दिल्ली 

क्या भारतवर्ष में वैदिक काल जैसा समृद्ध दौर आर्यों की बदौलत आया, क्या आर्य विदेशी थे, क्या उन्होंने भारत पर आक्रमण किया था | ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका आज तक कोई पुष्ट जवाब नहीं ढूंढा जा सका है। ऐसे में पुरातत्वविद इनका जवाब तलाशने के लिए पुरातात्विक अवशेषों की खोज और अध्ययन में आज तक जुटे हैं। हाल में हरियाणा के हिसार के पास राखीगढ़ी में हड़प्पाकालीन बसावट के अवशेषों के अध्ययन के दौरान एक नई बात सामने आई जिसने आर्यों के आक्रमण के सिद्धांत को ही खारिज कर दिया है। नई खोज में क्या पता लगा है, जानते हैं : 

लोकल डीएनए ही मिला 

राखीगढ़ी में मिले अवशेषों के डीएनए सैंपल की जांच में ऐसा कोई पुरातात्विक या जेनेटिक सबूत नहीं मिला जो आर्यों के आक्रमण से जुड़े बहुचर्चित सिद्धांत की पुष्टि करता हो। उलटा राखीगढ़ी में मिले कंकालों में मुख्य रूप से लोकल डीएनए होने का संकेत मिला, जो बताता है कि वैदिक काल पूरी तरह स्वदेशी था और इसका बाहरी संपर्क मामूली था। राखीगढ़ी से मिले पुरातात्विक अवशेषों का जिनेटिक अनैलिसिस यह संकेत भी दे रहा है कि हड़प्पा के लोगों के जिनेटिक स्ट्रक्चर में मध्य एशियाई या स्टेपी इलाके का कोई अंश नहीं था, लेकिन ईरानी नस्ल के अंश पाए गए हैं। जेनेटिक पूल में एकमात्र विदेशी अंश भी विभिन्न सभ्यताओं के बीच लोगों के सामान्य आवागमन के जरिए शामिल हुआ। इस पूरी स्टडी से यह संकेत मिल रहा है कि भारतीय सभ्यता में पिछले कम से कम 10000 वर्षों में बहुत बड़ी संख्या में लोगों का एक से दूसरी जगह जाना नहीं हुआ था। राखीगढ़ी में उत्खनन कार्य की अगुआई करने वाले पुरातत्वविद और डेक्कन कॉलेज पुणे के वाइस चांसलर प्रोफेसर वसंत शिंदे जांच के नतीजों को जल्द प्रकाशित करने वाले हैं। ये नतीजे हड़प्पा काल के लोगों की आनुवंशिक संरचना और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को समझने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। इस काम में डेक्कन कॉलेज के अलावा लखनऊ के डॉ बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोबॉटनी, हैदराबाद के सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी और सोल नेशनल यूनिवर्सिटी के कॉलेज ऑफ मेडिसिन के शोधकर्ता भी शामिल हैं। जुटाए गए सैंपल की डीएनए सिक्वेंसिंग में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की एनशिएंट डीएनए लैबोरेटरी सहयोग कर रही है। 


किसी आक्रमण का संकेत नहीं

शिंदे ने कहा कि राखीगढ़ी में उत्खनन से ऐसी संरक्षित सभ्यता का पता चला है, जिसमें किसी बड़े युद्ध या आक्रमण का कोई संकेत नहीं है। ऐसी कोई 'विदेशी' सामग्री भी नहीं मिली है, जिसे कोई हमलावर बाहर से वहां ले गया हो।  राखीगढ़ी में मिले बर्तनों के प्रकार, निर्माण कार्य में उपयोग होने वाली ईंटों और वहां मिले कंकालों के जरिए तब रहने वालों की सेहत के स्तर के आकलन से एक विकसित व्यवस्था का पता चलता है जो ऋग्वैदिक काल से निरंतरता बनाते हुए और विकसित हुई। लखनऊ के डॉ बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोबॉटनी की एनशिएंट डीएनए लैबोरेटरी के हेड डॉ. नीरज राय राखीगढ़ी से मिली जेनेटिक जानकारी का विश्लेषण कर रहे हैं। डॉ राय ने कहा कि अब तक के सभी सबूत एक स्वदेशी संस्कृति होने का इशारा दे रहे हैं, जो खुद व खुद दूसरे इलाकों तक फैली और इसे आर्यों के किसी भी आक्रमण के कारण विस्थापित नहीं होना पड़ा था।

साभार- नवभारत टाइम्स समाचार पत्र, दिल्ली संस्करण, पृष्ठ 12, दिनांक 21/6/2018

       (आर्य समाज की वाल से)