मोक्ष क्या है ?

दिंनाक: 25 Jun 2018 16:54:15


भोपाल(विसंके). प्रत्येक मनुष्य की ही नहीं अपितु प्राणी मात्र की यही कामना बनी रहती है कि कभी अपने जीवन में लेश मात्र भी दुःख को प्राप्त न करे किन्तु सदा सुख ही सुख से युक्त रहे। कोई भी प्राणी सदा दुःख को दूर करके नित्य व स्थायी रूप में सुखी रहना चाहता है। जिस स्थिति की कामना करता हुआ मनुष्य चेष्टा विशेष करता है, चाहे जितना भी अन्वेषण कर लेवें परन्तु वह इस पुरे संसार में तो प्राप्त कर पाना कभी सम्भव ही नहीं है । जब तक हम इस शरीर में रहेंगे अथवा इस संसार में रहेंगे तब तक दुःख तो भोगना ही पड़ेगा। संसार में तीन प्रकार का दुःख प्राप्त होता ही रहेगा, जैसे कि आध्यात्मिक दुःख, आधिभौतिक दुःख और आधिदैविक दुःख। जब हमें अपनी गलती के कारण शारीरिक अथवा मानसिक रोग आदि हो जाते हैं तो उसको अध्यात्मिक दुःख कहते हैं। जब कोई हिंसक, विषधर, क्रूर, चोर, डाकू, आतंकवादी आदि प्राणियों के माध्यम से हमें दुःख प्राप्त होता है, उसको आधिभौतिक दुःख कहा जाता है । जब बाढ़, भूकम्प, सुनामी, अकाल इत्यादि प्राकृतिक आपदाओं से हमें दुःख प्राप्त होता है, उसको आधिदैविक दुःख कहा जाता है। इन तीन प्रकार के दुखों से अत्यन्त निवृत्ति का नाम ही मोक्ष है । जैसे कि सांख्यकार महर्षि कपिल मुनि जी ने कहा है कि “अथ त्रिविधदुःखात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्तपुरुषार्थः” (सांख्य.1.1.) अर्थात् इन सभी दुखों से नितान्त छुट जाना ही मानव जीवन की सफलता है, यही सभी मनुष्यों का चरम लक्ष्य है । 


योग दर्शन के प्रणेता महर्षि पतंजलि जी ने भी इस मोक्ष का स्वरुप निरूपण करते हुए कहते हैं कि ऐसी स्थिति की प्राप्ति के लिए तो एक ही उपाय है कि शरीर से ही रहित हो जाएँ या फिर संसार से ही अलग हो जाएँ। इसी को ही मोक्ष, मुक्ति, अपवर्ग, निःश्रेयस, परम-गति, परम-पद अथवा निर्वाण आदि भिन्न-भिन्न नामों से कहा जाता है, जहाँ न शरीर रहता है और न ही किसी प्रकार का ताप, दुःख, बन्धन। जिसकी कामना से सृष्टि की आदि से लेकर अब तक अनेक ऋषि-मुनि, विद्वान्-आचार्य, योगी-महात्माओं ने घोर तपस्या की तथा सम्पूर्ण जीवन इसी के लिए समर्पित कर दिया, उसकी प्राप्ति के लिए कुछ विशेष योग्यता भी होनी चाहिए और वह योग्यता प्राप्त होती है अष्टांगयोग का अनुष्ठान करने से । इसमें यम-नियम आदि से लेकर ध्यान, समाधि तक की स्थिति को प्राप्त करके सर्व प्रथम प्रकृति के स्वरुप को जान कर फिर अपने आत्म स्वरुप का प्रत्यक्ष करके ईश्वर साक्षात्कार पूर्वक समस्त क्लेशों को जले हुए बीज की भांति नष्ट कर देना होता है । 

आत्मा का साक्षात्कार करने के लिए भी योग्यता अपेक्षित है और वह है  पहले अपर-वैराग्य को प्राप्त करें, उसके पश्चात् ही आत्म-साक्षात्कार होना सम्भव हो पाता है। आत्मा के प्रत्यक्ष के पश्चात् भी आत्मा और ईश्वर के मध्य में व्यवधान रह जाता है अर्थात् ईश्वर साक्षात्कार के पूर्व एक पर-वैराग्य को प्राप्त करना भी आवश्यक होता है । ईश्वर का दर्शन तब होता है जब योगाभ्यासी पर वैराग्य को प्राप्त कर लेता है । फिर आगे जाकर ईश्वर का प्रत्यक्ष पूर्वक  अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश आदि पञ्च-क्लेशों को सर्वथा नष्ट कर देना होता है और जब हमारे समस्त क्लेश व अविद्या जन्य समस्त संस्कार जले हुए बीज की भांति उत्पत्ति सामर्थ्य से रहित हो जाते हैं, उसके पश्चात् ही जीवात्मा मोक्ष-द्वार में प्रवेश करने के योग्य बनता है। 

इनमें से जब अविद्या नष्ट हो जाती है, तब जीव के सब दोष नष्ट हो जाते हैं और वह जीव अपने शुद्ध-स्वरुप में स्थित हो जाता है, तभी उसको मोक्ष प्राप्त हो जाता है तब व्यक्ति एक निर्दिष्ट काल तक सब दु:खों से सर्वथा रहित होकर ईश्वर के आनन्द से युक्त रहता है। वह निर्दिष्ट काल कुछ इस प्रकार परिगणित होता है। एक सृष्टि का काल 4 अरब 32 करोड़ वर्ष का होता है और उतना ही काल प्रलय का भी होता है। यह सृष्टि और प्रलय 36 हजार बार होने तक अर्थात् 31 नील, 10 खरब, 40 अरब वर्ष तक जीवात्मा शरीर और संसार से पृथक रहते हुए ईश्वर के आनन्द का ही उपभोग करता रहता है और उसके मध्य में कभी संसार में आना नहीं होता, जन्म-मरण के चक्र से पृथक होता है, इसी का नाम ही मोक्ष है। हम प्रतिदिन के व्यवहोरों में देखते हैं कि जब हम भोजन आदि कोई अल्पकालिक सुख मात्र के लिए इतना अधिक पुरुषार्थ करते रहते हैं तो इतना बड़ा अधिक सुख की प्राप्ति के लिए भला कौन बुद्धिमान प्रयत्न नहीं करना चाहेगा। अतः हम सबको उचित है कि मोक्ष के स्वरूप को ठीक-ठीक समझें और उसके लिए प्रयत्नशील हो।