हम क्यों खोते जा रहे हैं अपने शब्दों को, ऐसे तो विलुप्त हो जाएंगे हमारे शब्द - डॉ. मनमोहन वैद्य जी

दिंनाक: 27 Jun 2018 18:01:22


अपनी भाषा, बोली और अपने शब्दों का उपयोग न करने या उन्हें प्रचलन में न रखने पर वे मृत हो जाते हैं. ‘भाषा किसी भी व्यक्ति एवं समाज की पहचान का एक महत्वपूर्ण घटक तथा उसकी संस्कृति की सजीव संवाहिका होती है.’ आज विविध भारतीय भाषाओं व बोलियों के चलन तथा उपयोग में आ रही कमी, उनके शब्दों का विलोपन तथा विदेशी भाषाओं के शब्दों से प्रतिस्थापन एक गंभीर चुनौती बन कर उभर रही है. अनेक भाषाएं व बोलियां विलुप्त हो चुकी हैं और कई अन्य का अस्तित्व संकट में है. यह कितना विदारक है!


मैंने देखा है एक शब्द को मरते हुए. कुछ वर्ष पहले की बात है. मैं उत्तर प्रदेश में एक हिंदीभाषी परिवार में भोजन करने गया था. कॉलेज में पढ़ने वाली उनकी बेटी हमें भोजन परोस रही थी. मां गरम-गरम रोटियां बना रही थीं. मैंने उस बिटिया से कहा कि मां से कहना कि भोजन बहुत स्वादिष्ट बना है. फिर हाथ धो कर वापस लौटा तो मां से मिलना हुआ. नमस्कार आदि के बाद जब मैंने पूछा कि बिटिया ने कुछ कहा क्या? तब पता चला कि बिटिया ने तो उनसे कुछ कहा ही नहीं. कारण, उसे ‘स्वादिष्ट’ का अर्थ पता ही नहीं था. उसे ‘टेस्टी’ शब्द तो मालूम था, पर ‘स्वादिष्ट’ शब्द की जानकारी नहीं थी.

अभी हिमाचल प्रदेश के प्रवास के दौरान एक कार्यकर्ता की बेटी से परिचय हुआ. उसके गालों पर सुंदर गड्ढे पड़ते थे, जिसे अंग्रेजी में ‘डिम्पल’ कहते हैं. ‘डिम्पल’ के लिए मुझे मराठी और गुजराती शब्द तो पता था, पर हिंदी में क्या कहते हैं, यह नहीं जानता था. मैंने उस बेटी की मां से पूछा तो उन्होंने कहा कि हिंदी में भी इसे ‘डिम्पल’ ही कहते हैं. मैंने कहा कि ‘डिम्पल’ तो अंग्रेजी शब्द है. हिंदी में इसे क्या कहते हैं? उन्होंने अनभिज्ञता जताई. तब मैंने उस बेटी को ही गूगल में ढूंढने को कहा. उसने ढूंढ कर बताया कि हिंदी में ‘डिम्पल’ को हिलकोरे कहते हैं. इसके बाद हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश आदि हिंदी भाषी प्रदेशों में अनेक स्थानों पर लोगों, विद्वानों, हिंदी में पीएचडी अध्यापकों से पूछा, लेकिन सभी ने इसमें असमर्थता जताई. सभी ने यही कहा कि हिंदी में भी इसे ‘डिम्पल’ ही कहते हैं. बार-बार पूछने पर कहा कि ‘गड्ढा’ कहते हैं. मैंने कहा कि इतनी सुंदर चीज के लिए ‘गड्ढा’ जैसे नीरस शब्द का प्रयोग कैसे हो सकता है, तो सभी मौन हो गए. तब मुझे इस वर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रतिनिधि सभा द्वारा पारित प्रस्ताव का स्मरण हुआ. इसमें कहा गया है कि अपनी भाषा, बोली और अपने शब्दों का उपयोग न करने या प्रचलन में न रखने पर वे मृत हो जाती है. इसके साथ अपनी संस्कृति भी मृत हो जाते हैं. प्रस्ताव में कहा गया है, ‘‘भाषा किसी भी व्यक्ति एवं समाज की पहचान का एक महत्वपूर्ण घटक तथा उसकी संस्कृति की सजीव संवाहिका होती है.’’ आज विविध भारतीय भाषाओं व बोलियों के चलन तथा उपयोग में आ रही कमी, उनके शब्दों का विलोपन तथा विदेशी भाषाओं के शब्दों से प्रतिस्थापन एक गंभीर चुनौती बन कर उभर रही है. अनेक भाषाएं व बोलियां विलुप्त हो चुकी हैं और कई अन्य का अस्तित्व संकट में है. यह कितना विदारक है!

क्या हम हर घर, हर परिवार में ऐसा एक प्रयोग कर सकते हैं कि सप्ताह में कम से कम एक दिन सभी लोग आपस में आधा घंटा अंग्रेजी के एक भी शब्द का प्रयोग किए बिना केवल अपनी मातृभाषा में बात करें? यदि मातृभाषा का शब्द याद नहीं है तो किसी अन्य भारतीय भाषा का समानार्थी शब्द चलेगा, पर अंग्रेजी नहीं. क्या यह संभव है? मोबाइल या इंटरनेट जैसे शब्द आधुनिक हैं, इन्हें इसी रूप में प्रयोग करने में आपत्ति नहीं हो सकती. पर ‘हिलकोरे’ तो अंग्रेजों के भारत में आने के पहले से पड़ते थे. भोजन तो पहले से ही स्वादिष्ट होता था. वह ‘टेस्टी’ क्यों हो रहा है, ‘डिम्पल’ कब से पड़ने लगे, विचार करना चाहिए.

डॉ. मनमोहन वैद्य

सह सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

साभार – पाञ्चजन्य