अधर्म के लक्षण

दिंनाक: 28 Jun 2018 18:04:15


भोपाल(विसंके). वेद एक ऐसा महान् दिव्य ग्रन्थ है कि जिसमें मनुष्य मात्र की सर्वांगीण उन्नति हेतु, समस्त लौकिक सुख से लेकर मोक्ष सुख की प्राप्ति तक का विधि-विधान और क्या कर्तव्य है, क्या अकर्तव्य है सब प्रकार का ज्ञान-विज्ञान मन्त्र रूप में वर्णित है । वेद के आधार पर जिस प्रकार महर्षि मनु महाराज ने दश-लक्षणों वाले धर्म के स्वरुप का प्रतिपादन किया है ठीक वैसा ही अधर्म का भी लक्षण या स्वरुप बताया हुआ है जो कि हमें जानना अत्यन्त आवश्यक है । क्योंकि धर्म और अधर्म के स्वरुप वा लक्षणों को समझे बिना अपने जीवन में धर्म का ठीक-ठीक पालन और अधर्म का त्याग कर पाना सम्भव ही नहीं है । धर्म का पालन और अधर्म का त्याग किये बिना जीवन में दुःख की निवृत्ति और सुख की प्राप्ति संभव ही नहीं है, जो कि मनुष्य मात्र का अंतिम लक्ष्य है । यह धर्म किसी जाति या सम्प्रदाय-विशेष के लिए नहीं है, अपितु सारे मानव-समाज के लिए उपदिष्ट है । धर्म के स्वरुप को समझना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक अधर्म के स्वरुप को भी समझना है, अतः इसे ठीक-ठीक समझना, व ग्रहण करना हमारा परम कर्तव्य है ।    

 

हम मनुष्यों को कर्म करने हेतु ईश्वर के द्वारा प्रदत्त साधनों में से हम मुख्य रूप से मन, वाणी और शरीर रूपी साधन-त्रय के माध्यम से ही कर्म करते हैं, चाहे हम इन साधनों से धर्म का आचरण करें या फिर अधर्म का । मनुस्मृति में जहाँ षष्ठ अध्याय में धर्म के दस लक्षण बताए गए हैं वहाँ मनुस्मृति के बारह अध्याय में अधर्म के भी दस लक्षण बताए गए हैं :-

 

सर्व प्रथम तीन मानसिक अधर्म के विषय में बताया कि – 

 

"परद्रव्येषु अभिध्यानं मनसानिष्टचिन्तनम् । वितथाभिनिवेशश्च त्रिविधं कर्म मानसम् ।। (मनु.12.5) 

 अर्थात् दूसरे के धन-संपत्ति अथवा अन्य पदार्थों को अपने अधिकार में ले लेने का विचार या ध्यान करना, मन से अनिष्ट चिन्तन करना अर्थात् किसी दूसरे का बुरा करने का सोचना और तथ्य के विपरीत किसी मिथ्या विचार, संकल्प या सिद्धान्तों को स्वीकार करना, निवेश करना – ये तीन मानसिक दुष्कर्म हैं।

 

इस प्रकार दूसरा वाचनिक अधर्म का स्वरुप चार प्रकार से कहते हैं –

 

पारुष्यमनृतं चैव पैशुन्यं चापि सर्वशः । असम्बद्ध प्रलापश्च वाङ्मयं स्याच्चतुर्विधम् ।। (मनु.12.6)

अर्थात् कठोर वा कटु वचन बोलकर किसी को कष्ट पहुँचाना, झूठ बोलना, किसी भी प्रकार की चुगली करना, तथा असम्बद्ध प्रलाप करना अथवा सम्बन्ध न होते हुए भी किसी पर दोषारोपण करना  – ये चार वाचिक दुष्कर्म अथवा अधर्म कहलाते हैं।

 

ठीक इसी प्रकार शारीरिक अधर्म तीन प्रकार से कहते हैं –

 

अदत्तानामुपादानं हिंसा चैवाविधानतः। परदारोपसेवा च शारीरं त्रिविधं स्मृतम् ।। (मनु.12.7) 

अर्थात् किसी वस्तु के आधिकारिक स्वामी के द्वारा न दी गई अर्थात् अप्रदत्त वस्तु को ले लेना (यथा चोरी, छीना-झपटी, अपहरण अथवा डाका इत्यादि द्वारा ले लेना), असंवैधानिक अथवा शास्त्र के अनुसार अविहित हिंसा करना (यथा क़ानून अपने हाथ में लेते हुए निर्दोषों की हत्या इत्यादि करना) और दूसरे की  स्त्री का सेवन (यथा छेड़छाड़, अपहरण, शारीरिक सम्बन्ध अथवा बलात्कार इत्यादि) करना – ये तीन प्रकार के शारीरिक दुष्कर्म या अधर्म हैं।

इस प्रकार तीन मानसिक, चार वाचनिक और तीन शारीरिक मिलाकर कुल दस दुष्कर्म या अधर्म के लक्षण हैं। 

 

इस प्रकार न्याय-दर्शन के भाष्यकार वात्सायन मुनि जी दोषों की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि 

"दोषै: प्रयुक्त: शरीरेण प्रवर्तमानो हिंसास्तेयप्रतिषिद्धमैथुनानि आचरति, वाचाऽनृतपरुषसूचनाऽसम्बद्धानि, मनसा परद्रोहं परद्रव्याभिप्सां नास्तिक्यं चेति । सेयं पापात्मिका प्रवृत्तिरधर्माय ।। अर्थात् व्यक्ति राग-द्वेष से युक्त होकर शरीर के माध्यम से हिंसा, चोरी, व्यभिचार करना, वाणी के माध्यम से झूठ बोलना, कठोर बोलना, निन्दा करना, और असम्बद्ध वा व्यर्थ बातें करना, तथा मन के माध्यम से दूसरे के साथ द्रोह करना, स्पृहा अर्थात् दूसरे की संपत्ति की इच्छा करना, तथा नास्तिकता का भाव होना इत्यादि पाप स्वरुप वाली प्रवृत्तियाँ अधर्म के लिये होती हैं ।

 

हम जितनी-जितनी मात्रा में अधर्माचरण करते रहेंगे उतनी ही मात्रा में हमें दुःख ही भोगने पड़ेंगे । यदि हमें दु:खों से किसी भी प्रकार से बचना है और सुख से युक्त होना है तो हमें चार चीजों को जानना अत्यन्त आवश्यक है । वे चार हैं - 1. हेय, 2. हेयहेतु, 3. हान और  4. हानोपाय अर्थात् दुःख और दुःख का कारण तथा सुख और सुख का उपाय । दुःख के साथ-साथ इन दु:खों के कारणों को भी ठीक ढंग से समझना होगा और उन कारणों को दूर करना होगा । क्योंकि कारण के होने से ही कार्य होता है और कारण के न होने से कार्य पदार्थ भी नहीं होता । अतः यदि हम कारण को नष्ट कर देंगे तो कार्य भी नष्ट हो जायेगा । बुरे कर्म को या अधर्म आचरण को यदि हम छोड़ देते हैं तो दुःख भी स्वयं छूट जायेगा और हमारे जब हम सुख के स्वरुप को तथा सुख के उपायों को ठीक-ठीक जान लेते हैं और उपायों को अपनाते हैं तो जीवन में स्वतः सुख का पदार्पण हो जाता है । 

 

लेख - आचार्य नवीन केवली