अमरनाथ यात्रा पर इस्लामी कहर का भय : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिंनाक: 29 Jun 2018 15:13:01


भोपाल(विसंके). हम लोकतांत्रिक देश में रहते हैं। हमारा संविधान प्रत्येक भारतवासी को कुछ मौलिक अधिकार देता है। यह अधिकार इस बात की घोषणा करते हैं कि सभी भारतीय एक समान हैं और उनके बीच कानून, धर्म, लिंग के आधार पर, लोक नियोजन के अवसरों में तथा अस्पृश्यता के स्तर पर किसी प्रकार का कोई भेद नहीं किया जाएगा। इस संदर्भ में हम अनुच्छेद 14 से 18 तक समता के अधिकार को देख सकते हैं। अनुच्छेद 14 में कहा गया है कि विधि के समक्ष समता का अधिकार प्रत्येक भारतीय को समान रूप से दिया गया है। अनुच्छेद 15 कहता है कि धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर किसी के साथ भेदभाव करना निषेध है। अनुच्छेद 16 लोक नियोजन के विषय में अवसर की समानता की बात कहता है। अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता के अंत की घोषणा करता है और अनुच्छेद 18 में समानता के अधिकार के अंतर्गत उपाधियों के अंत की बात की गई है। 
इसी प्रकार अनुच्छेद 19 से 22 तक संविधान सभी को बोलने की स्वतंत्रता देने के साथ शांतिपूर्ण बिना हथियार के एकत्र होने, सभा करने, अपना संघ बनाने, देश के किसी भी क्षेत्र में आवागमन की स्वतंत्रता प्रदान करता है। यहां अनुच्छेद 21 प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण की बात कहता है इसके अलावा जो विशेष महत्व की बात संविधान में अनुच्छेद 25 से लेकर 28 तक की गई है, वह धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की है। यहां स्पष्ट लिखा हुआ है कि भारत में जन्म लेने वाला कोई भी व्यक्ति अंतःकरण से धर्म अपने स्तर पर मानने, आचरण और प्रचार करने के लिए स्वतंत्र होगा। किंतु संविधान में कही हुई यह सभी बातें तब असहज लगने लगती हैं जब प्रत्यक्ष यह दिखाई देता है कि भारत जैसे देश में संविधान से इतर जाकर पंथ और संप्रदाय के आधार पर दूसरों को उनकी धार्मिक भावनाओं के आधार पर आचरण करने से बल पूर्वक रोकने का प्रयास किया जाता है। यह एक बड़ा प्रश्न है कि क्यों देश विभाजन के बाद भी सर्वपंथ सद्भाव का सहज रूप भारत में उत्पन्न नहीं हो सका है। 

विभाजन के समय कुछ मुस्लिम नेताओं ने इस बात को मुखरता से उठाया था कि हिन्दू-मुस्लिम दो धार्मिक-पांथिक विचारधाराएं हैं, जो एक साथ नहीं रह सकतीं। इसलिए मुसलमानों के लिए अलग देश पाकिस्तान बनना चाहिए। एतिहासिक तथ्य है कि मुस्लिम लीग की यह मांग डायरेक्ट एक्शन के नाम पर निरीह हिंदुओं के कत्लेआम के साथ और प्रबल हो गयी। अकेले कोलकाता में 72 घंटों के दौरान 4 हजार लोग मारे गए और करीब एक लाख से अधिक लोग बेघर हुए। समूचे भारत में इससे प्रभावित होनेवालों का आंकड़ा कई लाखों में है। यह ऐतिहासिक सत्य देश विभाजित होने के बाद के सालों में भी बना रहा। पाकिस्तान से आने वाले हिन्दू शरणार्थियों की आपबीती रोंगटे खड़े कर देने वाली थी। किंतु उसके बाद क्या होना चाहिए था? भारत में जो शेष मुस्लिम और हिंदू हैं उन्हें क्या मिलजुल कर साझा सांस्कृतिक विरासत के साथ आगे नहीं बढ़ना चाहिए था ? दुर्भाग्य है आज भी हिंदू-मुसलमानों में धर्म आधारित वैमनस्यता बनी हुई है। हालात ये हैं कि देश का कोई भी राज्य या क्षेत्र जहां मुस्लिम बहुसंख्यक हैं, आज भी वहां हिन्दू सनातनी एवं अन्य धर्म, पंथ, संप्रदाय के लोग सबसे अधिक प्रताड़ित किए जा रहे हैं। आश्चर्य यह है कि इस मुद्दे पर हमारी अधिकांश संवैधानिक संस्थाएं चुप हैं। 

वस्तुत: भारत ने विभाजन से कोई सबक नहीं लिया। बहुसंख्यक हिन्दू अपने ही देश में भय के साए में अपने आराध्य के दर्शन करने को मजबूर हैं। आखिर क्यों हिन्दू मत मानने वाले कृष्ण जन्मस्थली, विश्वनाथ, वैष्णोदेवी और अमरनाथ में देव दर्शन सेना की मौजूदगी में करने के लिए विवश हैं? कश्मीर में शायद ही कोई वर्ष ऐसा होगा, जब सेना के जवानों की आवश्यकता बर्फानी बाबा के दर्शन करने के लिए हिन्दुओं को न पड़ी हो। यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजाद और धर्मनिरपेक्ष भारत में आज भी इस्लामिक कट्टरपंथ मौजूद है। अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा को लेकर सरकार कितनी गंभीर है, यह पता इससे भी चलता है कि स्वयं रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण घाटी पहुंचकर हालात का जायजा लेती हैं। जम्मू से लेकर अमरनाथ शिवलिंग तक सुरक्षा का पूरा बाहरी घेरा सेना ने बनाया है। पेट्रोलिंग पार्टी को हाईअलर्ट पर रखा गया है और खुद सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत इस यात्रा की सुरक्षा का मुआयना कर रहे हैं। 

एक तरह से देखा जाए तो कश्मीर घाटी से कश्मीर की मूल संस्कृति के प्रतीक कश्मीरी पंडितों के बलात् निष्कासन के बाद इस्लामी कट्टरवादियों को यह हजम नहीं हो रहा है कि घाटी के ‘काफिर मुक्त’ होने के बाद भी उनका यह प्रमुख आराध्य स्थल अभी भी जीवंत क्यों है और इस ‘कुफ्र’ के प्रतीक को कैसे हटाया जाए। पिछले दिनों जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग मुठभेड़ में जिंदा पकड़े गए आतंकी ने जो खुलासे किए, उससे भी यह पता चला है कि किस हद तक इन्हें इस्लामिक जिहाद की शिक्षा दी गई है, जिसमें वे अपने पंथ के अलावा किसी अन्य धर्म-संप्रदाय के अस्तित्व को स्वीकारने को तैयार नहीं हैं। वे हर उस इबादतगाह को भस्मीभूत कर देना चाहते हैं, जिससे इस्लाम को कोई मतलब नहीं है। पिछले साल भी अमरनाथ यात्रियों पर हमला हो चुका है, जिसमें आठ श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी। इसके पहले लंगर वालों और घोड़े वालों के बीच हुए तथाकथित संघर्ष में टैंटों में आग लगा दी गई और सामान लूटकर तीर्थयात्रियों को मारा-पीटा गया। इसके विपरीत दूसरी तस्वीर उस भारत क्षेत्र की है, जहां बहुसंख्या में हिन्दू रहते हैं और वहीं मुसलमानों की प्रमुख इबादतगाह हैं। राजस्थान के अजमेर शरीफ में हर साल लाखों जायरीन आते हैं। दिल्ली में हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह है। मुंबई में हाजी अली की दरगाह है। उत्तराखंड में कलियर शरीफ, तमिलनाडु में नागौर दरगाह जैसे कई स्थान हैं, किंतु वहां किसी भी मुसलमान की श्रद्धा को तोड़ने का प्रयास नहीं होता, बल्कि इसके उलट हिन्दू सनातनी भी उतनी ही श्रद्धा से इन स्थानों पर जाकर अपना शीश नवाते हैं। 

प्रश्न यह है कि कश्मीर घाटी में मुसलमान बहुसंख्यक हैं, तो क्या वहां देश के अन्य मत वालों को शांति के साथ अपने आराध्य के दर्शन करने का हक नहीं है। उन्हें क्यों भय के साये और सेना की मौजूदगी में दर्शन करना पड़ता है। क्या कभी भारत पंथगत नकारात्मक मानसिकता से बाहर निकल पाएगा? अमरनाथ यात्रा में इस बार भी जो भय हिन्दू तीर्थयात्रियों के लिए बना हुआ है, उसे देखकर यही लगता है कि भारत का संविधान मौलिक अधिकारों की कितनी भी बातें करे, लेकिन पांथिक कट्टरता से पूर्ण कश्मीर घाटी में यह स्वीकार्य नहीं है। इस पर कि किसी भी चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार का कोई वश नहीं। काश, सरकार यह बात समझे और बिना किसी भय के पंथ आधारित आतंकवाद को समाप्त करने के लिए खुलकर सामने आए। क्योंकि राजनीति सत्य मार्ग पर चल कर देश को सर्वोन्नति पर ले जाने का एक श्रेष्ठ माध्यम है।

(हिन्दुस्थान समाचार)