मैला प्रथा पर भारतीय संवेदनहीनता : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिंनाक: 29 Jun 2018 14:13:55


भोपाल(विसंके). जिस देश में छोटी-छोटी बातें भयंकर लड़ाई का स्वरूप ले लेती हों और अपमानजनक शब्दों के इस्तेमाल से जहां लोग एक-दूसरे को मारने से लेकर आत्महत्या तक करने के लिए प्रेरित हो उठते हों उस देश में यदि सिर पर मैला उठाने की प्रथा विद्यमान रहे और इसकी प्रतिक्रिया में ना कोई आंदोलन हो तब अवश्य ही यह चिंता का एक बड़ा विषय हो जाता है। वाकई भारत जैसे देश में इसका कई वर्षों से बना रहना बता रहा है कि हम कितने संवेदनहीन समाज में रह रहे हैं। 

वस्‍तुत: यह सच है कि अरब देशों में कबीलाई संस्कृति जिसमें कि महिलाओं के अपहरण व लूट की घटनाओं के कारण घर में ही शौचालय बनाये जाने की प्रथा का आरंभ हुआ था उसके भारत में प्रवेश करते ही उनके क्रियाकलापों से शौचालय साफ करने तथा मैला ढोने की प्रथा यहां शुरु हुई और अरब की विजित जातियों ने भारतीयों को गुलाम बनाकर उनसे अपना और अपनी औरतों का मैला उठवाया जिसने कि कालान्‍तर में एक जाति विशेष के कार्य का रूप ले लिया, लेकिन देश के स्‍वतंत्रता आन्‍दोलन में कोई भी महापुरुष ऐसा नहीं है जिन्‍होंने कि इस प्रथा का विरोध न किया हो। महात्मा गाँधी और डॉ. अम्बेडकर ने जिस तरह से हाथ से मैला ढोने की प्रथा का अपने समय में पुरजोर विरोध किया था, उससे अवश्‍य यह लगा था कि भविष्‍य में अतिशीघ्र आजाद भारत में इस कुप्रथा का पूरी तरह से निर्मूलन हो जाएगा, किंतु ऐसा अब तक हुआ नहीं है, जबकि यह प्रथा संविधान के अनुच्छेद 15, 21, 38 और 42 के प्रावधानों खिलाफ है। आज़ादी के 7 दशकों बाद भी इस प्रथा का जारी रहना देश के लिये शर्मनाक है। 

 

अभी सामाजिक न्याय व आधिकारिता मंत्रालय की इस संदर्भ में एक सर्वे रिपोर्ट में देश के 12 राज्यों की स्थिति का विश्लेषण किया गया है। अन्‍य छह राज्‍यों की रिपोर्ट आना अभी शेष है, यह कुल 18 राज्‍यों का यह व्‍यापक सर्वे है। रिपोर्ट कह रही है कि देश में मैला ढोने वालों की सबसे अधिक आबादी हिन्‍दी क्षेत्र में है। अकेले उत्तर प्रदेश में 28,796 मैला ढोने वाले हैं। मध्यप्रदेश में इनकी तादाद 8016, राजस्थान में 6643 व गुजरात में 146 है। यह आंकड़ा सरकारी है, इसमें संभावना यही है कि वास्‍तविकता में यह संख्‍या इससे कहीं अधिक हो। सामाजिक न्‍याय और अधिकारिता मंत्रालय कह रहा है कि देश में आज भी सिर पर मैला उठानेवालों की तादाद 53 हजार 236  मौजूद है। देशभर के छह सौ जिलों में से मंत्रालय ने इस सर्वे के लिए 121 जिलों का चयन किया और पाया कि देश में इस दृष्‍टि से विसंगतियां इतनी अधिक हैं कि व्‍यापक स्‍तर पर इसकी समाप्‍ती के लिए कार्य किए जाने की आवश्‍यकता है। इस सर्वे में सबसे अधिक गुजरात के आंकड़े हैरान करते हैं, क्योंकि सीवरेज पाइपलाइन में मरने वालों की संख्‍या यहीं सबसे ज्‍यादा है तो वहीं हिन्‍दी प्रदेशों में किस हद तक मानवीय दूरियां हैं और जातिगत समूहों में बटे यह राज्‍य अनुसूचित जाति के साथ कैसे छोटे मन का परिचय देते हैं, यह भी इस सर्वे से ज्ञात होता है। 

 

इस संदर्भ में वस्‍तुत: देखें तो मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने का पहला कानून देश में मैनुअल स्कैवेंजर्स का रोज़गार और सूखे शौचालय निर्माण (निषेध) अधिनियम, 1993 में पारित हुआ था।  इस अधिनियम के अंतर्गत लोगों के मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोज़गार पर प्रतिबंध लगा दिया गया। अर्थात् यह अधिनियम हाथ से मैला ढोने को रोज़गार के तौर पर प्रतिबंधित करता है। इस अधिनियम में हाथ से मैला साफ कराने को संज्ञेय अपराध मानते हुए आर्थिक दंड और कारवास दोनों ही आरोपित करने का प्रावधान किया गया तथा यह अधिनियम सूखे शौचालयों के निर्माण को भी प्रतिबंधित करता है। 

 

इसके बाद मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोज़गार का निषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम 2013 आया जो स्‍पष्‍ट रूप से कहता है कि मैनुअल स्कैवेंजर्स के तौर पर किये जा रहे किसी भी कार्य या रोज़गार का निषेध है।यह हाथ से मैला साफ करने वाले और उनके परिवार के पुनर्वास की व्यवस्था भी करता है और यह ज़िम्मेदारी राज्यों पर आरोपित करता है। इस अधिनियम के अंतर्गत मैनुअल स्कैवेंजर्स को प्रशिक्षण प्रदान करने, ऋण देने और आवास प्रदान करने तक की व्यवस्था है। इसके बाद 27 मार्च 2014 को इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का एक महत्त्वपूर्ण निर्णय सामने आया जिसमें कि इसमें कार्यरत बहुत बड़ी तादात को चिन्‍हित किया गया और मैला ढोने की परिभाषा को बढ़ाया गया। किंतु केंद्र एवं न्‍यायालय स्‍तर पर इतना सभी कुछ होने के बाद भी सीवर श्रमिकों की सुरक्षा स्थितियों में सुधार को लेकर खतरनाक कामकाजी परिस्थितियां इसके लिए अभी भी बनी हुई हैं जिसके कारण से हमें सीवर श्रमिकों की मृत्यु की खबर नियमित रूप से सुनाई देती हैं।  यहां समझ लेना होगा‍कि किसी व्यक्ति द्वारा स्वयं के हाथों से मानवीय अपशिष्टों की सफाई करने या सर पर ढोने की प्रथा को मैनुअल स्कैवेंजिंग कहते हैं।

 

वैसे सिद्धान्‍तया देखें तो मैला ढोने के विभिन्न रूपों को समाप्त करने की आवश्यकता को लेकर देश में एक व्यापक सहमति है किन्तु दुर्भाग्यवश हम इस व्यापक स्वीकृत उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल नहीं हो सके हैं और कई महत्त्वपूर्ण प्रावधानों की मौजूदगी और अनेक पहलों के बावज़ूद भारत में हाथ से मैला ढोने की प्रथा आज भी जारी है। दरअसल, यह प्रथा एक जाति विशेष से जुड़ी हुई है, जबकि संविधान का अनुच्छेद 46 कहता है कि राज्य समाज के कमज़ोर वर्गों मुख्य रूप से  अनुसूचित जाति और जनजाति की सामाजिक अन्याय से रक्षा करेगा और उन्हें हर तरह के शोषण का शिकार होने से बचाएगा। किंतु इसी के साथ जुड़ा यह एक कड़वा सच है कि अमानवीय प्रथा हज़ारों लोगों की आजीविका का साधन भी है। बहुत से मैनुअल स्कैवेंजर्स इस डर से यह काम नहीं छोड़ना चाहते कि कहीं उनकी आजीविका ही संकट में न पड़ जाए। वास्‍तव में सामुदायिक भागीदारी और जागरूकता के अभाव में यह  अमानवीय प्रथा अब तक समाप्त नहीं हो सकी है। जिसके लिए कि केंद्र सरकार के साथ सभी स्‍वयंसेवी संस्‍थाओं को इस विषय को लेकर सामाजिक जागरूकता के लिए आगे आना होगा नहीं तो देश पर यह कलंक आगे भी सदियों तक बना रहेगा। इससे साथ ही जाति आधारित पेशा जैसे विचारों को खत्म करना भी वर्तमान की आवश्‍यकता है हमें एक ऐसे वातावरण का निर्माण करना होगा जिसमें कि मैला ढोने से कहीं अधिक संवेदना के स्‍तर पर वह लोग अपने में आत्‍मग्‍लानी महसूस करें जो इस कार्य को अपने ही भारतीय लोगों से करवाते हैं।