प्रकृति संरक्षण का संदेश देती भारतीय परम्पराओं को फिर से अपनाना होगा - सत्यकीर्ति दीक्षित

दिंनाक: 05 Jun 2018 15:36:46


भोपाल(विसंके). पंच प्रकृतियाँ, पंच महाभूतों (क्षितिज, जल, पावक, गगन और समीर) तत्व से मिलकर बनी है, इनमें. जल तत्व की अहम महत्ता है | पृथ्वी का 71 प्रतिशत भूभाग जल से आच्छादित है। भारतीय दर्शन की मान्यता के अनुसार जल से ही धरती की उत्पत्ति हुई है। मानव सभ्यता का विकास उन्हीं क्षेत्रों में सर्वाधिक हुआ जहाँ जलस्रोत (नदियों) की उपलब्धता थी। हमारे 12 ज्योतिलिंग  किसी न किसी पवित्र नदी या सागर के तट पर स्थित हैं। जो पूर्णतः वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बनाए गए हैं। इसी प्रकार पुरातनकाल में सभी तीर्थस्थल व प्राचीन नगर किसी न किसी जलाशय या जलस्त्रोत को ध्यान में रखकर विकसित किये गए थे |


       हमारे पूर्वजों ने प्रकृति के संरक्षण के लिए ऐसी परंपराएं विकसित की जिससे हम प्रकृति का दोहन नहीं बल्कि कृतज्ञ भाव से उनका सदुपयोग कर सकें। पुराणों में वृक्षों की महिमा वर्णित करते हुए उनके रोपने की विधियाँ,  उनके लिए विशेष अनुष्ठानों, बगीचों व तालाबों के निर्माण की प्रणालियों आदि का विस्तार से वर्णन मिलता है। जल व वनस्पति में चेतना की अनुभूति, वनस्पति और जल का परस्पर घनिष्ठ संबंध रहा है, इन बातों से आधुनिक पर्यावरणविदों की भी सहमति रही है।

       अग्निपुराण में भी कहा गया है कि जो मनुष्य एक भी वृक्ष की स्थापना करता है वह 30 हजार इन्द्रों के काल तक स्वर्ग में वास करता है। जितने वृक्षों का रोपण करता है अपने पहले और पीछे की उतनी ही पीढ़ियों को वह तार देता है। मत्स्य पुराण में भी वृक्ष महिमा के प्रसंग में यहाँ तक कहा गया है कि 10 कुओं के समान एक बावड़ी, दस बावड़ियों के समान एक तालाब, 10 तालाबों के समान एक पुत्र का महत्व है, एवं दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष को स्थान दिया गया है।

       आधुनिक युग में भारतीय कर्मकांड या पूजन पद्धति की परंपराएं भले ही गैरजरूरी या तिथि बाह्य (आउट ऑफ़ डेट) हो चुकी हों, परंतु यह प्राचीन भारत के लोकचित्त में हमेशा विद्यमान रही हैं एवं किसी व्यापक पर्यावरणीय संवेदना का आभास भी कराती है। पेड़ों को देवताओं के प्रतीक रूप में स्थापित कर श्रद्धाभाव से उनकी विधिवत पूजा अर्चना, जल चढ़ाने से लेकर सुरक्षा के जो नियम शास्त्रीय परंपराओं से जोड़कर पर्यावरण संरक्षण के रूप में प्रचलन में लाए गए हैं उनका महत्व आज भी विद्यमान है | नवग्रह में से हर ग्रह को किसी न किसी वनस्पति से जोड़ा गया है। जैसे सूर्य का वनस्पति आक है, चन्द्रमा की पलाश,  मंगल की खैर, तुलसी विष्णु प्रिया है, केला वृहस्पति का रूप है, बरगद में शिव का निवास है, नीम में देवी का वास है, पीपल विष्णु का प्रतिरूप है आदि मान्यताएं एक प्रकार से इन प्राणवायु उत्सर्जित करने वाली उपयोगी वनस्पतियों को नष्ट करने से रोकती हैं। इसी प्रकार हिन्दू रीति रिवाजों में देखा जाए तो किसी भी शुभकार्य को करने जैसे विवाह से पूर्व कुआं, नल आदि जलाशयों को पूजने की प्रथा आज भी प्रचलन में है। पूजन में जल का कलश रखना नदियों जैसे गंगा, यमुना, नर्मदा, क्षिप्रा आदि को देवी को रूप में पूजने के पीछे भी इनके दिव्य गुण हैं। जिनके आधार पर इन्हें देवी के तुल्य आस्था भाव दिया गया है। इसके लिए इनके प्रति कृतज्ञता प्रदर्शन ही इन्हें देवी सदृश मानने का मुख्य ध्येय रहा होगा । जल स्रोतों व वनस्पतियों के अलावा चीटियों को गुड़, मछलियों व चिड़ियों को दाना खिलाने और गर्मियों में पशु-पक्षियों के लिए पानी रख देने की सहज प्रवृत्तियां प्रचलित रही हैं। प्राचीनकाल से वनस्पति पशु-पक्षियों आदि को देवताओं के साथ जोड़कर जैव-विविधता को अनायास ही संरक्षित किया गया है। गरूण, मोर, सिंह, उल्लू, कछुआ, सर्प, तोता, मूषक आदि को किसी न किसी देवता के वाहन के रूप में कल्पित किया गया है और सबसे उपयोगी पशु गाय को माता कहा गया है |

         हमारे पूर्वज सुबह उठते समय भी धरती पर पैर रखने मात्र के लिए उसे सचेतन सा मानते हुए क्षमा याचक मुद्रा में रहते थे उनसे पर्यावरण के किसी प्रदूषण का अपराध हो यह कल्पना से परे है। ऐसी परंपरा में यह स्वाभाविक है कि प्रकृति पर विजय प्राप्त करने या उसके निर्मम दोहन का भाव भी हमारे चिंतन को अस्वीकार रहा है। भारतीय दर्शन इसीलिए भौतिकवाद में विश्वास नहीं रखता | आज की स्थिति देखी जाए तो एक तरफ आधुनिक युग 21वी सदी में हम भौतिक रूप से काफी उन्नति कर रहे हैं। लेकिन वातावरण के साथ-साथ प्राकृतिक संपदाओं का ह्रदयहीन असंतुलित दोहन भी कर रहे है और इस तरह प्राकृतिक आपदाओं को आमंत्रण भी दे रहे हैं | आज भौतिक संसाधनों का निश्चित रूप से विकास हुआ है- जैसे सिचाई व जल उपलब्धता के साधन बढ़े पर उसके साथ-साथ जल का दुरूपयोग, पाश्चात्य उपकरणों के उपयोग के कारण बढ़ गया है फलस्वरूप जमीन के भीतर पानी का जलस्तर निरंतर घटता जा रहा है अनावश्यक पानी हर घर में बहाया जाता है। एक समय था, जब गाँव-गाँव में बावड़ी, तालाब, कुएँ आदि उपलब्ध थे जो वर्षा के पानी को अनावश्यक बहने से रोकते भी थे और प्रथ्वी का जलस्तर भी सही बना रहता था जिसके कारण प्यासे को पानी खरीदना नहीं पड़ता था। लेकिन आज पीने का पानी भी मोल बिक रहा है एवं अशुद्ध हो चुका है। वहीं दूसरी ओर शुद्ध प्राणवायु तक के लिए हम मोहताज हो गए हैं। गांव-गांव में पशुधन की कमी आ चुकी है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी पास के शहरों से कृत्रिम दूध के पैकेट भेजे जाते हैं। प्राचीन काल में प्रत्येक घर में नियमित यज्ञ किया जाता था जिससे पर्यावरण में व्याप्त कीटाणु स्वत: ही नष्ट हो जाते थे | ऐसी उच्च जीवनशैली से उन्नत परम्पराओं के देश में पर्यावरण प्रदूषण व प्राकृतिक संसाधनों का विलुप्त होना चिंतनीय है | हमारी सभी मान्यताएं भी प्रकृति संरक्षण का संदेश देती हैं। अतः हमें अपनी परम्पराओं को अपनाना होगा |