किसान संकट में आंदोलन की नहीं समाधान की दरकार - भरतचन्द्र नायक

दिंनाक: 07 Jun 2018 15:34:17


भोपाल(विसंके). भारतीय समाज में कुछ श्रेष्ठ परम्पराएं रही हैं। कहते हैं कि यज्ञोपवीत के तीन धागे देखकर देवराज इन्द्र ऐरावत हाथी से उतर कर विप्रदेव को प्रणाम करते थे। बदलते परिवेश में आज सामाजिक प्राथमिकताओं में विप्र देव कहां पर है यह कुछ दिनों से समाज को आंदोलित कर रहा है। इसी तरह अन्नदाता किसान ने समाज के संगोपन का जो दायित्व संभाला पीढ़ी दर पीढ़ी व्यवसाय तो चल रहा है लेकिन अन्नदाता किसान आर्थिक सर्वेक्षण अनुसार किसान परिवार की मासिक औसत आय 6426रू. है। जिसमें खेती से होने वाली आमदनी 3081रू. माह है। इससे लगभग नब्बे प्रतिशत किसान, खेतिहर गरीबी में गुजारा कर रहे हैं। शादी, विवाह उत्सव तभी कर पाता है जब उसे कर्ज मिलता है और उस कर्ज का ब्याज चुकाना उसके लिए टेढ़ी खीर है। लिहाजा ऋणग्रस्त जीवन बिताना उसका शौक नहीं लाचारी है। 


किसान के उत्पाद का बढ़ा हुआ मूल्य दिये जाने का जब मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा तब पूर्ववर्ती केंद्र सरकार ने मूल्य बढ़ाने में अपनी लाचारी बताते हुए कहा था कि मूल्य वृद्धि से बाजार में विकृति पैदा होने की आशंका है। महंगाई न बढ़े और उद्योगों के लिए कच्चा माल सुगमता से मिलता रहे इसलिए मूल्यों में स्थिरता लाजमी है। इसके अलावा सरकार विश्व स्पर्धा और विश्व व्यापार संगठन की शर्तों की भी पाबन्द है। बाजारवादी व्यवस्था में किसान का चेहरा ओझल कर दिया गया। बाजार व्यवस्था में समरथ को नहीं दोष भुलाई की कहावत चरितार्थ होती है। बाजार में विकृति पैदा न हो इसका मतलब किसान का लूट का शिकार बना रहना उसकी नियति है।
खेती के साथ कुछ विरोधाभास भी जुड़े हैं। जब रबी और खरीफ फसल पक जाती है और उत्पादन की पूर्ति मांग से अधिक हो जाती है किसान को उसका लागत मूल्य मिलना भी परेशानी हो जाती है। किसान के बारे में राजनैतिक दलों का रवैया सियासी रहा है। उनने किसानों की व्यथा पर आंसू बहाकर वोट हासिल किये लेकिन धरातल पर अपेक्षित कुछ की नहीं किया। संसद और विधानसभाओं में किसान की बदहाली पर आंसू बहाने का रिवाज चल पड़ा लेकिन किसी दल ने किसान की त्रासद स्थिति पर विचार करने के लिए संसद और विधानसभा का विशेष अधिवेशन बुलाने की मांग नहीं की। पहली जून से किसानों के समर्थन में देश के सवा सौ राजनैतिक दलों संगठनों ने आंदोलन का ऐलान किया। टनों दूध और सब्जियां सड़कों पर उड़ेल दी गयी लेकिन सियासत के अलावा ठोस पहल का संकेत नहीं दिया। सियासी उग्रता ही इस बात का सबूत देती है कि जो दल और संगठन आज किसानों के रहबर बनकर सुर्खियां बटोर रहे है। उनके जेहन में किसान की समस्या के समाधान का कोई रोड मैप तक नहीं है। नब्बे के दशक में अटलजी की सरकार बनी थी। श्री राजनाथ सिंह कृषि मंत्री थे। उन्होंने किसानों के कर्जग्रस्त होने पर बहस आरंभ की और खेती के कर्ज पर सस्ते ब्याज का सोच आरंभ हुआ बाद में अटलबिहारी वाजपेयी ने किसान आयोग बनाने के प्रस्ताव को आगे बढ़ाया और 2004 में डाॅ. स्वामीनाथन आयोग का गठन हुआ। डाॅ. स्वामीनाथन आयोग ने 2006 में अपनी रिपोर्ट केन्द्र सरकार को सौंप दी। अटल सरकार का अवसान हो चुका था। डाॅ. मनमोहन सिंह सरकार ने रिपोर्ट को ठंडे बस्तें में डाल दिया। 2014 में जब लोकसभा चुनाव हुए भाजपा चुनाव अभियान समिति के शिल्पकार श्री नरेन्द्र मोदी ने ऐलान किया कि किसानों के हित में स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों पर अमल होगा। किसान को फसल की लागत पर 50 प्रतिशत लाभांश मिलाकर समर्थन मूल्य दिया जायेगा। श्री नरेन्द्रमोदी सरकार ने इसे अमली जामा पहनाते हुए 2022 तक किसान की आय दोगुना करने की व्यूह रचना भी की है। सवाल उठता है कि राजनैतिक दल ने 2004 से 2014 तक किसान के हित में अंगडाई तक नहीं ली वह आज किसान के संकट के लिए मोदी सरकार पर ठीकरा किस आधार पर फोड़ सकती है। किसान आंदोलन की आड़ में किसान के कंधे पर बंदूक रखकर भारतीय जनता पार्टी को निशाना बनाना कहां तक न्याय संगत है। 
दरअसल किसान का आर्थिक संकट तीन दशक पुराना है। इस दरम्यान तीन लाख से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके है। साबित है कि कांग्रेस अपने सिर का पाप दूसरों के माथे पर डालकर सियासत कर रही है। पचपन साल तक देश पर एक छत्र राज करने वाली कांग्रेस नरेन्द्र मोदी से 4 साल का हिसाब मांग रही है। यह कहां तक उचित है ? ध्यान देने की बात है कि कृषि केन्द्र और राज्य दोनों का विषय है। कांग्रेस बार बार किसानों में मतिभ्रम फैला रही है और कर्ज माफ करने के लिए दबाव बना रही है, लेकिन देश में अर्थशास्त्रियों, कृषिविदों के गले कर्ज माफी की मांग उतर नहीं रही है। उनका कहना है कि किसान की त्रासदी का सबसे बड़ा कारण उन्हें उनकी फसल का वाजिब मूल्य न मिल पाना है। जिस पर मोदी सरकार ने स्पष्ट नीति की घोषणा के साथ अमल आरंभ कर दिया है और फसल की लागत में किसान उसके परिवार तक के श्रम की गणना कर अर्थशास्त्र को विकास के पक्ष में ला दिया है। देश में सिंचाई क्रांति तेज हुई है। मोदी सरकार ने अपने 2018-19 के बजट में ही लागत मूल्य पर 50 प्रतिशत लाभांश देने की घोषणा की है। यूरिया को नीम कोटेड बनाकर यहां यूरिया का संकट समाप्त कर दिया है, वही किसान को मिलने वाली सब्सिडी उसके खाते में जमा करने का पुख्ता इंतजाम कर दिया है। इससे संकेत मिलता है कि 2022 तक किसान की आय दोगुना हो जायेगी और किसान याचक की मुद्रा में मुक्त होकर अपने पैरों पर खड़ा होगा।
जहां तक किसान की खुशहाली का सवाल है, कोई भी दल किसान परस्ती से मंुह नहीं मोड़ता, लेकिन वास्तविक उपाय करने का श्रेय भारतीय जनसंघ को ही दिया जायेगा। भारतीय जनता पार्टी की सरकारों ने अपने सूबों में किसानों को विविध प्रकार के प्रोत्साहन दिए। ताजा उदाहरण मध्यप्रदेश है, जहां कृषि कर्मण सम्मान से मध्यप्रदेश पांच बार नवाजा जा चुका है। समर्थन मूल्य पर बोनस, बाजार में मंदी आने पर मूल्य स्थिरीकरण कोष से मदद, भावांतर भुगतान योजना, डिफाल्टर किसानों को जीरो प्रतिशत ब्याज की पात्रता दिलाने के लिए समाधान योजना का श्रेय मध्यप्रदेश और मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चैहान को ही है। श्री नरेन्द्र मोदी सरकार ने काश्तकारों को प्रोत्साहन साधन सुविधाएं देकर देश की कृषि विकास दर 4 प्रतिशत पहंुचायी है। सवाल उठता है कि सिर्फ कृषि उत्पादन बढ़ने से किसान की आय तो नहीं बढ़ रही है। इससे किसान को क्या लाभ हुआ। देश की खाद्य सुरक्षा मजबूत हुई है। किसान के आर्थिक सशक्तिकरण की अपेक्षा पूरी की जाना चाहिए। 
नरेन्द्र मोदी सरकार के किसान हित में किए जा रहे सात सूत्रीय कार्यक्रम पर अमल से वांछित लाभ की उम्मीद बंधी है। इस कार्यक्रम में खेत की मिट्टी की सेहत का हर वर्ष परीक्षण हो रहा है, इससे खाद के उपयोग में मितव्ययिता बढी है। फसल को पहंुचने वाली क्षति को रोकने के लिए फसल बीमा, मंडियों, ग्रामों में गोदाम, कोल्ड स्टोरेज की श्रृंखला का निर्माण स्टोरेज में फसल रखने पर किसान को कर्ज की व्यवस्था, ग्रामों में निवेश कर खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की इकाईयों की स्थापना पर भरपूर सब्सिडी, प्रोत्साहन, मार्गदर्शन, फसल का मूल्य संवर्धन, राष्ट्रीय कृषि बाजार और मंडी को जोड़ने पर कार्य किया जा रहा है। किसान क्रेडिट कार्ड की तरह पशुपालकों को भी पशुपालन क्रेडिट कार्ड देकर उनकी साख सुविधा सुनिश्चित कर दी गयी है। कृषि के पूरक उद्योगों को लाभकारी बनाने का महत्वाकांक्षी कार्यक्रम हाथ में लिया जा चुका है। किसान आज आंदोलित है। आक्रोश में है। लेकिन उसे आंदोलन की नहीं समाधान की आवश्यकता है जिसकी राह बन चुकी है।
श्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों के अमल की चर्चा हो रही है। इससे समय चक्र घूमा है। कहा जाता था कि किसानों की चर्चा खूब होती है, लेकिन नीति निर्धारण में किसान कहांॅ रहता है। केन्द्र और मध्यप्रदेश सरकार ने इस स्थिति को पलट दिया है। मोदी जी ने अन्नदाता सुखी भव कहा था। लगता है वह समय दूर नहीं है। देश में पंचायत से पार्लियामेंट तक किसान का हित चिंतन की धुरी बन चुका है। गांव, गरीब, किसान, मजदूर सरकारों के नियोजन का केंद्र बिन्दु बन चुके हैं। आने वाले समय में जनादेश भी उसी को मिलेगा जो इनका संवर्धन करेगा।