अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस्लाम के कई भ्रमित करने वाले कल्पित नैरेटिव

दिंनाक: 08 Jun 2018 17:33:20

भोपाल(विसंके). अंतरराष्ट्रीय समुदाय में सबसे ज़्यादा महत्व इस बात का होता है कि आपने अपने पक्ष में क्या "नैरेटिव" बनाया है और इस्लाम को इसमें महारत हासिल है.

दुनिया की यह एक चौथाई आबादी ख़ुद को "विक्टिम" साबित करने के खेल में हमेशा क़ामयाब रहती है. इराक़ ख़ुद को अमेरिका का, अफ़गानिस्तान ख़ुद को रूस का, फ़लस्तीन ख़ुद को इज़राइल का, कश्मीर ख़ुद को भारत का विक्टिम साबित करने की कोशिशों में क़ामयाब है. गाज़ा पट्टी के मुस्लिम, यूरोप के शरणार्थी, म्यांमार के रोहिंग्या, चीन के उइघर, मध्येशिया के तातार "विक्टिमहुड" का वह खेल खेलना बख़ूबी जानते हैं, जिसके बाद आतंकवादी कार्यवाहियों, घुसपैठ, ज़मीन पर बलात् कब्ज़े, आबादी के असंतुलन जैसी चीज़ों को नज़रअंदाज़ करना आसान रहता है.

"माय नेम इज़ ख़ान" एक सफल नैरेटिव है. एक क़ामयाब ब्रांड. कश्मीर के विस्थापित पंडित एक नाकाम नैरेटिव है, जिसे कोई भी ख़रीदने को तैयार नहीं. 

कश्मीर को लेकर दुनिया में जो आम राय है, उसमें दोष भारत का ही है. जब भारत के प्रथम प्रधानमंत्री स्वयं कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र में ले गए तो उसे एक विवादित क्षेत्र की तरह ले गए. अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने कहा, जब आप ख़ुद ही कश्मीर को "डेस्प्यूटेड टेरेटरी" मान रहे हैं तो हमसे क्या उम्मीद कर सकते हैं? 

आज सच्चाई यही है कि "पाकिस्तान ऑकुपाइड कश्मीर" के बजाय "इंडिया ऑकुपाइड कश्मीर" का नैरेटिव दुनिया में जमा हुआ है. वैसा मानने के पीछे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के भू-राजनीतिक न्यस्त स्वार्थ तो हैं ही, लेकिन अपने पक्ष में भारत की आवाज़ भी तो प्रबल नहीं. लीडिंग पब्लिक इंटेलेक्चुअल दुनिया की यूनिवर्सिटीज़ में जाकर स्पीच देते हैं और इस नैरेटिव का निर्माण करते हैं कि कश्मीर में इंडियन आर्मी मानवाधिकारों का हनन कर रही है, सिक्के का दूसरा पहलू दुनिया को कौन बताएगा?

यूएन में प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री जो स्पीच देते हैं, वह तो एक "यूनिलेटरल स्टेटमेंट" माना जाएगा ना, ऑफ़िशियल स्टैंड. उस पर एक न्यूट्रल व्यू कहां से आएगा, जो कि पब्लिक इंटेलेक्चुअल को देना होता है. 

मीडिया, एकेडमी और लिट्रेचर लोकविमर्श की रंगशालाएं होती हैं. वे ही आपके साथ नहीं. 

भारतीय मुस्लिम ख़ुद को "विक्टिम" और "सबाल्टर्न" की तरह दिखाने में क़ामयाब रहे हैं, यह एक गंभीर मसला है. दादरी और कठुआ को जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय समुदाय हाथों-हाथ लेता है, वह अकारण नहीं है. 

इस्लाम को एक "सबाल्टर्न कैटेगरी" में देखना भ्रामक है. ये भ्रम "अल्पसंख्यक" के पश्चिमी कॉनसेप्ट से पैदा होता है. पश्चिमी देशों में माइनोरिटीज़ जो होती हैं, वो ऑलमोस्ट डिफ़ंक्ट स्पेशीज़ होती है, विलुप्त होती कोई प्रजाति. जबकि इंडिया में ये "सो कॉल्ड माइनरिटी" इतनी तादाद में है, जितनी अनेक यूरोपियन देशों की कुल आबादी भी नहीं होगी.

आज भारत में अल्पसंख्यक शब्द मुसलमानों का पर्याय बन गया है, यह एक भारी तकनीकी भूल है. मुस्लिमों को "दूसरा सबसे बड़ा बहुसंख्यक वर्ग", "दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी" के रूप में बार बार परिभाषित करना होगा, ताकि विक्टिमहुड की जकड़बंदी टूटे. 

भारतीय मुस्लिमों की "री-ब्रांडिंग" सेकंड लार्जेस्ट मैजोरिटी के रूप में की जाए, यह समय की मांग है! 

दूसरी बात, यह "अन्यीकरण" जो इस्लाम के द्वारा दुनिया को दिखाया जाता है कि साहब हमें नौकरी नहीं दी जाती, हमें किराए का घर नहीं दिया जाता, हमें चुनावों में सीट नहीं दी जाती आदि इत्यादि, यह एक दूसरा पॉपुलर नैरेटिव है. 

सच्चाई यह है कि यह अन्यीकरण भारत देश ने इस्लाम पर नहीं थोपा है, यह इस्लाम ने ख़ुद पर "सुपरइम्पोज़" किया है. वे ही भारत के सुविख्यात "कल्चरल मिक्स" का हिस्सा बनने को तैयार नहीं, वे ही घुलने-मिलने को राज़ी नहीं, वे ही अपनी अलग बस्तियों में मुतमईन. वे कहीं ना कहीं इस श्रेष्ठताबोध से उपजी कुंठा से भी ग्रस्त कि 600 सालों तक हमने इस मुल्क़ पर राज किया था, और उनके दिमाग़ में यूटोपिया का कॉन्सेप्ट यही है कि भारत पर फिर से इस्लाम का परचम फहराए!

इस्लाम को विक्टिम के नज़रिए से देखना दिखाना बहुत बड़ी भूल है. इन फ़ैक्ट, इंडिया जो है, वह इस्लाम की विक्टिम है, भारतीय मुस्लिम यहां की हुक़ूमत के विक्टिम नहीं हैं. ऐसा वे प्रिटेंड करते हैं. इस नैरेटिव को उलटना ज़रूरी है. 

दुनिया में ऐसा कई बार हुआ है कि एक क़ौम ने दूसरे मुल्क़ पर धावा बोला हो और उस पर कब्ज़ा जमा लिया हो, जैसे रोमनों ने ग्रीस पर, स्पेनीयार्ड ने लैटिन अमेरिका पर, अंग्रेज़ों ने एबोरिजिनल्स पर, और कथित रूप से, जैसा कि वामपंथी नैरेटिव है, आर्यों ने अनार्यों पर. 

लेकिन दुनिया के इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण दूसरा नहीं मिलता कि ऐसी कोई "इनवेडिंग ट्राइब" एक सीमा के बाद उस मुल्क में आबादी के आधार पर अपना एक पृथक हिस्सा मांग ले. भारत से पाकिस्तान और बांग्लादेश की मांग करना और यह दोनों इस्लामिक मुल्क हासिल कर लेने के बावजूद भारतीय मुख्यधारा का हिस्सा बनने से इंकार करना एक ऐसी हद दर्ज़े की ढिठाई है कि उसका कोई मुक़ाबला दुनिया में दूसरा नहीं है

यह लगातार कहा जाता है कि हमको इस्लाम को "मोनोलिथिक स्ट्रक्चर" के रूप में नहीं देखना चाहिए और उसके भीतर जो शिया और अहमदी कम्युनिटी के धड़े हैं, उनके प्रति सदाशय होना चाहिए. लेकिन मेरा मानना यह है कि यह ज़िम्मेदारी उनकी ज़्यादा है, बनिस्बत हमारी. इतिहास के सबक़ अगर भारतीय बहुसंख्या को सशंक करते हैं तो इसमें उसका दोष नहीं है. इस संशय का उन्मूलन "सो कॉल्ड अल्पसंख्यक कम्युनिटी" की ज़िम्मेदारी है. उसको आगे आना होगा, उसको हिंदुस्तान के साथ मिक्स अप होना होगा, उसको इंडियन मेनस्ट्रीम में शामिल होने की तमाम कोशिशें करना होंगी. उसको यह संकेत देना होंगे कि अब वह इंडियन कांस्टिट्यूशन के आधार पर चलने के लिए तैयार है, अपनी दक़ियानूसी किताब के आधार पर नहीं. 

गालियां इलाज नहीं हैं. धमकियां जवाब नहीं है. बलप्रयोग से बात बिगड़ जाती है. ख़ून बहने से तो उल्टे "विक्टिमहुड" का नैरेटिव पुख़्ता होता है, जैसे गुजरात के बाद हुआ था. 

ज़रूरत दो मोर्चों पर काम करने की है-

पहला, अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने भारत का पक्ष स्पष्ट रूप से रखा जाए और वैसे पब्लिक इंटेलेक्चुअल्स को आगे बढ़ाया जाए, जो आपका नैरेटिव सामने रख सकें. क्योंकि आज की दुनिया में पॉपुलर नैरेटिव की जीत ही सबसे बड़ी जीत होती है. 

दूसरा, अल्पसंख्यक समुदाय के लिबरल और भारत-समर्थक धड़े को यह संदेश दिया जाए कि अगर भारत के विकास रथ का हिस्सा बनने के लिए आप तैयार हैं तो स्वागत है. समान नागरिक संहिता को अपनाकर, जन्मदर नियंत्रण के लिए सक्रिय पहल करके और उदार सांस्कृतिक समावेश का परिचय देकर भारतीय मुस्लिम यह कर सकते हैं. 

सवाल तो यह है कि फ़र्ज़ी मातम और छातीकूट को त्यागकर क्या वे ऐसा करने के लिए तैयार हैं?

 

साभार :- सुशोभित (सोशल मीडिया से)