10 जुलाई-पुण्य-तिथि / पारदर्शी व्यवस्था के प्रेमी मिश्रीलाल तिवारी

दिंनाक: 10 Jul 2018 15:42:36


भोपाल(विसंके). श्री मिश्रीलाल तिवारी ने संघ की प्रेरणा से कार्यरत ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ के काम को बहुत गहराई तक पहुंचाया। उनका परिवार मूलतः मध्य प्रदेश में मुरैना जिले के ग्राम तवरघार का निवासी था; पर तीन पीढ़ी पहले उनके पूर्वज मध्य प्रदेश के शाजापुर में बस गये।


वहीं फागुन शुक्ल 14 (मार्च 1916 ई.) को श्री कुंदनलाल तथा श्रीमती रुक्मणीबाई के घर में उनका जन्म हुआ। श्री दिगम्बर तिजारे के सम्पर्क में आकर 1938 में वे स्वयंसेवक बने।

उनका विवाह हो चुका था और वे उज्जैन में जिला शिक्षा अधिकारी के कार्यालय में काम कर रहे थे। संघ के संपर्क से उन्हें हिन्दू संगठन का महत्व पता लगा। अतः वे अपना अधिकाधिक समय इसमें ही लगाने लगे।

उज्जैन में खाराकुआं स्थित उनका घर संघ की गतिविधियों का केन्द्र बन गया। सब लोग हंसी में उसे ‘डिब्बा’ कहते थे। उनकी साइकिल भी शाखा के काम में ही अधिक आती थी। संघ कार्य के लिए जो चाहे उसे ले जाता था। उनके पुत्र की बहुत छोटी आयु में ही मृत्यु हो गयी। इसके कुछ समय बाद पत्नी तथा फिर दस वर्षीय पुत्री भी चल बसी। मिश्रीलाल जी ने इसे प्रभु-इच्छा समझ कर फिर विवाह नहीं किया और 1946 में प्रचारक बन गये। उन दिनों उज्जैन की शाखा में केवल बाल व शिशु स्वयंसेवक ही आते थे; पर मिश्रीलाल जी ने नगर के युवा तथा प्रौढ़ लोगों को भी संघ से जोड़ा।

अपने नाम को सार्थक करते हुए वे सबसे बहुत प्रेम से मिलते थे। उनके सामने कार्यकर्ता अपना दिल खोल देता था। वे भी उसकी समस्या का समुचित समाधान करते थे। कभी-कभी कार्यकर्ताओं में मतभेद हो जाते थे। ऐसे में मिश्रीलाल जी से उनकी भेंट रामबाण दवा सिद्ध होती थी। अतः उनका प्रवास जहां भी होता, वहां उत्साह का वातावरण बन जाता था।

मिश्रीलाल जी उज्जैन नगर, गुना जिला और ग्वालियर विभाग प्रचारक के बाद कुछ वर्ष भोपाल में प्रांतीय कार्यालय प्रमुख रहे। 1967 में स्वामी विवेकानंद शिला स्मारक के धनसंग्रह का हिसाब उन पर था। उन्होंने वह बहुत निपुणता से किया। वह काम हड़बड़ी की बजाय पूरी तैयारी से करते थे। वे काम की सूची बनाते थे तथा जो काम हो जाता, उसे काटते रहते थे। उनके प्रिय वाक्य थे, ‘पूर्वाताप’ कर लो, तो ‘पश्चाताप’ नहीं करना पड़ेगा तथा ‘रहा काम तो रावण से भी पूरा नहीं हो सका।’

गांव में उनके हिस्से की पुश्तैनी जमीन पर खेती होती थी। वे प्रचारक रहते हुए भी गुरुदक्षिणा तथा अपने निजी व्यय उसकी आय से करते थे। 1968 में उन्हें मध्यभारत प्रांत में वनवासी कल्याण आश्रम का काम दिया गया। 1979 में वे कल्याण आश्रम के महामंत्री तथा 1997 में उपाध्यक्ष बने। उनके व्यवस्थित कार्य से धर्मान्तरण पर रोक लगी तथा परावर्तन को बल मिला। आपातकाल में वे पूरे 18 मास तक इंदौर जेल में बंद रहे।

मिश्रीलाल जी का हृदय मातृवत वात्सल्य से परिपूर्ण था। 1979 में जशपुर में प्रधानमंत्री श्री मोरारजी देसाई तथा कई केन्द्रीय मंत्री आये थे। संघ के भी कई वरिष्ठ पदाधिकारी वहां थे। मिश्रीलाल जी उनके साथ अपने बीमार रसोइये ‘मामा’ की भी चिन्ता कर रहे थे। भोपाल गैस कांड के बाद क्षतिपूर्ति के रूप में प्राप्त 15,000 रु. से उन्होंने अपने आध्यात्मिक गुरु खाचरौद (मंदसौर) के स्वामी स्वतंत्रानंद जी की जीवनी छपवाकर निःशुल्क वितरित की।

दाहिने पैर में पक्षाघात के कारण वे विशेष प्रकार का जूता पहनते थे। 1987 में उनकी 71वीं वर्षगांठ पर उन्हें समर्पित सात लाख रु. की श्रद्धानिधि उन्होंने कल्याण आश्रम को ही दे दी। प्रवास में कठिनाई होने पर उन्होंने सब दायित्वों से मुक्ति ले ली। समाज को अपना आराध्य मानने वाले मिश्रीलाल जी का 10 जुलाई, 2001 को कल्याण आश्रम के केन्द्र जसपुर में ही देहांत हुआ।

(संदर्भ : मध्यभारत की संघगाथा/हमारे महान वननायक)