आजादी के बाद की सोमनाथ गाथा - जूनागढ़ और सरदार पटेल

दिंनाक: 11 Jul 2018 15:21:52


भोपाल(विसंके). आजादी के बाद जूनागढ़ रियासत का नबाब महाबत खां चाहता था कि उसकी रियासत का विलय पाकिस्तान के साथ हो | अपने प्रमुख सलाहकार व प्रधान मंत्री एस.एन. भुट्टो (बेनजीर भुट्टो के दादा) की सलाह पर उसने पाकिस्तान को यह सूचना भी लिख भेजी कि जूनागढ़ रियासत का विलय पाकिस्तान में किया जाए | प्रत्युत्तर में उसे जिन्ना का वधाई सन्देश भी प्राप्त हो गया | इतना ही नहीं तो 15 अगस्त 1947 को नबाब ने गजट नोटिफिकेशन द्वारा यह घोषणा भी कर दी कि जूनागढ़ अब पाकिस्तान का अंग है | 


किन्तु सरदार पटेल जानते थे कि न केवल राजनैतिक वल्कि धार्मिक द्रष्टि से भी यह कितना गंभीर विषय है | देश की आंतरिक सुरक्षा के मद्देनजर भी यह होने देना अपने हाथों अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा था | स्थानीय जनता भी जूनागढ़ के भारतीय गणराज्य में विलय की ही पक्षधर थी | 13 सितम्बर को प्रजा मंडल के आव्हान पर एक विशाल आम सभा का वहां आयोजन हुआ, जिसमें लगभग 30 हजार लोग सम्मिलित हुए | अंततः स्थिति यह बनी कि जनता के संभावित विद्रोह से भयभीत नबाब 24 अक्टूबर 1947 को जूनागढ़ छोडकर प्लेन द्वारा पाकिस्तान भाग गया | वह कितना भयभीत था, इस का अंदाज इस बात से लगता है कि वह जल्दबाजी में अपनी नौ बेगमों से दो को जूनागढ़ में ही भूल गया | नवम्बर आते आते भारतीय सेना ने समूचे जूनागढ़ को अपने कब्जे में ले लिया | ब्रेगिडियर गुरुदयाल सिंह ने इस समूचे अभियान का सञ्चालन किया | 

बाद में सरदार पटेल द्वारा जूनागढ़ के भारतीय गणराज्य में विलय के निर्णय को विश्व मान्यता दिलवाने के लिए 20 फरवरी 1948 को जूनागढ़ रियासत में वोट डालकर जनमत संग्रह भी करवाया गया | उस समय के जनता के उल्लास का तो अद्भुत मंजर था | आखिर यह स्वतंत्र भारत का पहला चुनाव जो था | वोट डालने के लिए दो पेटियां रखी गई थीं | भारत के लिए लाल पेटी और पाकिस्तान के लिए हरी पेटी | जैसे ही यह ज्ञात हुआ कि भारत की पेटी लाल है, तो महिलायें लाल साड़ी पहिनकर मतदान के लिए आईं, तो पुरुष भी लाल पगड़ी और लाल कपडे पहिनकर रास्ते भर लाल गुलाल उड़ाते हुए पहुंचे | दुनिया भर के पत्रकार इस चुनाव को कवर करने के लिए जूनागढ़ आये हुए थे | एक लाख नब्बे हजार छः सौ अठासी वोट भारत के साथ विलय के पक्ष में तथा केवल इन्क्यानवे वोट विरोध में पड़े | सोचिये कि अगर जूनागढ़ का विलय पाकिस्तान में हो गया होता, तो क्या सोमनाथ मंदिर का निर्माण संभव हुआ होता ? 

12 नवम्बर 1947 को जब सरदार वल्लभ भाई पटेल जूनागढ़ पहुंचे तो वहां सोमनाथ मंदिर के ध्वंसावशेष देखकर उन्होंने ठान लिया कि यहाँ सोमनाथ के भव्य मंदिर का पुनर्निर्माण करवाना ही है | अगले ही दिन 13 नवम्बर को वहां सम्पन्न हुई आम सभा में उन्होंने अपने विचार को सार्वजनिक करते हुए कहा कि सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण हमारा कर्तव्य है | मंदिर निर्माण की जिम्मेदारी दी गई प्रख्यात लेखक व साहित्यकार राजनेता तथा केंद्र सरकार में तत्कालीन कृषि मंत्री कन्हैय्यालाल माणिकलाल मुंशी को | 

 

सौराष्ट्र के मुख्यमन्त्री उच्छंगराय नवल शंकर ढेबर ने 19 अप्रैल, 1940 को यहां उत्खनन कराया था, जिसमें एक ब्रह्मशिला प्राप्त हुई थी । इस शिला पर ही सौराष्ट्र के पूर्व राजा दिग्विजय सिंह ने 8 मई, 1950 को मंदिर की आधार शिला रखी | पटेल द्वारा महात्मा गांधी की सहमति लेकर मंदिर निर्माण प्रारम्भ तो करवा दिया गया, किन्तु प्रधानमंत्री नेहरू इस निर्णय से अप्रसन्न बने रहे | गांधी और पटेल के देहावसान के बाद तो उनकी बेरुखी अपमानजनक ढंग से बढ़ गई | किन्तु धुन के पक्के मुंशी ने मंदिर निर्माण कार्य चालू रखा, तथा 1951 में वह अवसर आ गया जब मंदिर में शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा होना थी | 

मुंशी ने इस निमित्त तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से पधारने का अनुरोध किया, जिसे राष्ट्रपति महोदय द्वारा स्वीकार भी कर लिया गया | किन्तु जैसे ही नेहरू जी की जानकारी में यह तथ्य आया उन्होंने तुरंत राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को ख़त लिखकर मना किया कि मेरे विचार से आपको सोमनाथ मंदिर के लोकार्पण कार्यक्रम में नहीं जाना चाहिए, किन्तु इसके बाद भी राजेन्द्र बाबू कार्यक्रम में सम्मिलित हुए | और अंततः 11 मई 1951 को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की उपस्थिति में शिवलिंग की मंदिर में पुनः प्राण प्रतिष्ठा हुई | 

ख़ास बात यह कि मंदिर निर्माण कार्य पूर्णतः जन सहयोग से ही हुआ था | इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं थी | यह अलग बात है कि इसके बाद भी नेहरू जी नाराज थे, यहाँ तक कि बाद में प्रधानमंत्री से बढ़ते मनमुटाव के चलते मुंशी ने कांग्रेस से त्यागपत्र भी दे ही दिया |

साभार :- क्रांतिदूत