17 जुलाई-/-पुण्य-तिथि – रज्जू भैया के विश्वस्त सहायक श्री शिवप्रसाद जी

दिंनाक: 17 Jul 2018 16:17:50


संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री शिवप्रसाद जी का जन्म 1926 ई. में ग्राम टेंडवा अल्पी मिश्र (जिला बहराइच, उ.प्र.) में हुआ था। उनके पिता श्री सियाराम गौड़ कपूरथला रियासत में जिलेदार अर्थात राजस्व अमीन थे। उनके छोटे भाई श्री दुखहरणनाथ गौड़ बेसिक शिक्षा परिषद में प्राचार्य रहे।


गांव में इस परिवार की काफी अच्छी खेतीबाड़ी थी। प्राथमिक शिक्षा के बाद शिवप्रसाद जी ने महराज सिंह इंटर कॉलिज, बहराइच से प्रथम श्रेणी में माध्यमिक शिक्षा उत्तीर्ण कर पुरस्कार पाया। इसके बाद तालुकेदार इंटर कॉलिज, लखनऊ से उन्होंने इंटर और फिर लखनऊ वि.वि. से स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की। तालुकेदार इंटर कॉलिज में उन दिनों प्रायः जमीदारों और नवाबों के बच्चे ही पढ़ते थे। इससे उनके परिवार की सम्पन्नता का पता लगता है।

उन दिनों व्यापारी अपना हिसाब उर्दू में ही रखते थे। शिवप्रसाद जी का उर्दू पर अच्छा अधिकार था। अतः उन्हें लखनऊ में बाजार निरीक्षक की सरकारी नौकरी मिल गयी। उनका विवाह बचपन में ही ग्राम रीवान, जिला सीतापुर के जमींदार श्री त्रिवेणी सहाय की एकमात्र संतान विद्योत्तमा देवी से हो गया था। विवाह के बाद ससुर जी अपनी सारी सम्पत्ति उन्हें देना चाहते थे, पर उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया। विवाह से उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई; पर वह शीघ्र ही चल बसा। कुछ समय बाद उनकी पत्नी की भी मृत्यु हो गयी।

लखनऊ में पढ़ते समय शिवप्रसाद जी स्वयंसेवक बने थे। उनकी इच्छा भी प्रचारक बनने की थी; पर गृहस्थी की जिम्मेदारी इसमें बाधक था। लेकिन बेटे और पत्नी की मृत्यु से यह बंधन टूट गया। उन्होंने पुनर्विवाह का विचार न करते हुए नौकरी छोड़ दी और 1947 में प्रचारक बन गये।

प्रचारक जीवन में वे बस्ती, मेरठ, फरुखाबाद और सीतापुर में जिला प्रचारक और फिर सीतापुर में विभाग प्रचारक रहे। आपातकाल में शिवप्रसाद जी सीतापुर में एक सभा में बोलते समय गिरफ्तार हुए और जेल भेज दिये गये। वहां से वे आपातकाल के बाद ही छूटे। कन्नौज निवासी शरद जी को उन्होंने ही कानपुर में श्री अशोक सिंहल से मिलवाया था। इसके बाद दोनों में घनिष्ठता हो गयी और फिर शरद जी प्रचारक बने। जनवरी, 1993 में मध्यभारत के प्रांत प्रचारक रहते हुए मुख कैंसर से शरद जी का निधन हुआ।

शिवप्रसाद जी का कार्यक्षेत्र अब तक उत्तर प्रदेश ही रहा था। रज्जू भैया प्रयाग में प्राध्यापक रहते हुए उ.प्र. का संघ कार्य देखते थे। अतः दोनों में बहुत निकटता थी। आपातकाल के बाद रज्जू भैया पर सहसरकार्यवाह और फिर सरकार्यवाह की जिम्मेदारी आयी। उनका केन्द्र भी दिल्ली हो गया। अतः 1980 में रज्जू भैया ने अपने सहायक के नाते उन्हें दिल्ली बुला लिया। वर्ष 2000 तक वे दिल्ली कार्यालय प्रमुख रहे। रज्जू भैया को वि.वि. से मिलने वाली पेंशन तथा उनके आयकर आदि का हिसाब भी वे ही रखते थे। अत्यधिक श्रद्धा के कारण रज्जू भैया का चित्र वे सदा अपनी मेज पर रखते थे।

जब रज्जू भैया सरसंघचालक की जिम्मेदारी से निवृत्त होकर पुणे चले गये, तो शिवप्रसाद जी भी दिल्ली से लखनऊ के ‘भारती भवन’ कार्यालय पर आ गये। यहां उन्होंने कार्यालय सम्बन्धी कई काम भी संभाल लिये। स्वास्थ्य ढीला रहने के बावजूद वे प्रतिदिन भारती भवन की प्रातः शाखा में उपस्थित रहते थे। उनका कमरा भूतल पर था। अतः शाखा का ध्वज भी वहीं रहता था।

एक दिन प्रातः जब उनका कमरा नहीं खुला, तो सबको चिन्ता हुई। काफी आवाज देने के बाद धक्का देकर दरवाजा खोला गया, तो देखा कि वे धरती पर गिरे हुए हैं। तुरंत उन्हें अस्पताल ले जाया गया। वहां वे दो-तीन दिन भर्ती रहे; पर कुछ लाभ नहीं हुआ और 18 जुलाई, 2002 को अस्पताल में ही उनका निधन हो गया।

(संदर्भ : श्री कृष्णानंद शुक्ल, बहराइच एवं पांचजन्य)