पर्यावरणीय चिंता की आवश्यकता - रीतेश दुबे

दिंनाक: 18 Jul 2018 16:19:44


भोपाल(विसंके). पिछले कई वर्षों से मानसून की भविष्यवाणियां सटीक नहीं बैठ पा रही जहां बारिश हो रही है वहां लगातार बाढ जैसे हालात बन रहे है और जहाँ पानी नहीं गिर रहा है वहां सूखे का अंदेशा है। कुछ बरस पहले तक जुलाई माह के पहले पखवाड़े में देश भर में मानसून छा जाता था, लेकिन इस साल तो मध्य भारत में भी पूरी तरह मानसून का आगाज नहीं हुआ है। मौसम विभाग के पूर्वानुमान अकसर असफल होते नजर आते है ,निसंदेह मौसम चक्र में परिवर्तन के लिये ग्लोबल वार्मिंग जिम्मेदार है। पर्यावरणीय चेतना के प्रति मानव की उदासीनता इसका कारण प्रतीत हो रही है। 


पर्यावरण शब्द का निर्माण दो शब्दों से मिल कर हुआ है। पर्या जो हमारे चारों ओर हैं, और ‘‘आवरण‘‘ जो हमें चारों ओर से घेरे हुए है। पर्यावरण उन सभी भौतिक, रासायनिक एवं जैविक कारकों की सम्मलित इकाई है जो किसी जीवधारी या परितंत्रीय आबादी को प्रभावित करते हैं।सामान्य अर्थों में यह हमारे जीवन को प्रभावित करने वाले सभी जैविक और अजैविक तत्वों, तथ्यों, प्रक्रियाओं और घटनाओं के समच्चुय से निर्मित इकाई है। यह हमारे चारों ओर व्याप्त है और हमारे जीवन की प्रत्येक घटना इसी के अन्दर घटती है और हम इंसान अपनी समस्त क्रियाओं से इस पर्यावरण को भी प्रभावित करते है।

मानव द्वारा आर्थिक उद्देश्य और अपनी विलासिता को पूरा करने के लिये प्राकृति के साथ व्यापक छेड़छाड़ कर प्राकृतिक पर्यावरण का संतुलन नष्ट किया है ,जिससे प्राकृतिक व्यवस्था या प्रणाली के अस्तित्व पर ही संकट उत्पन्न हो गया है। इस तरह की समस्याएँ पर्यावरणीय अवनयन कहलाती हैं।

ज्यादातर पर्यावरणीय समस्याएँ पर्यावरणीय अवनयन और मानव जनसंख्या और इंसान द्वारा संसाधनों के उपभोग में वृद्धि से जुडी है। पर्यावरणीय अवनयन के अर्न्तगत पर्यावरण में होने वाले वे सारे परिवर्तन आते है जो अवांछनीय है। और किसी क्षेत्र विशेष में या पूरी पृथ्वी पर जीवन को खतरा उत्पन्न करते है। इसके अर्न्तगत प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का क्षरण और प्राकृतिक आपदाएं इत्यादि शामिल की जाती है। पर्यावरणीय अवनयन के अलावा जनसंख्या में तेजी से हो रही वृद्धि और मानव द्वारा उपभेाग के बदलते तरीके लगभग सारी पर्यावरणीय समस्याओं के मूल कारण है।

मनुष्य द्वारा अपने आर्थिक लाभ के लिये इतनी तेजी से प्राकृति का दोहन किया जा रहा है ,कि उस अनुपात में पुनर्भरण संभव नहीं है । प्राकृतिक संसाधन क्षरण के लिये जनसंख्या के दबाब ,तेज वृद्धि दर और लोगों के उपभोग को जिम्मेवार माना जा रहा है।

संसाधनों को दो वर्गों में बांटा जाता है नवीकरणीय संसाधन और अनवीकरणीय संसाधन ,इसके अलावा कुछ संसाधन इतनी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है कि उनका क्षय नहीं हो सकता उन्हें अक्षय संसाधन कहते है जैसे सौर उर्जा अनवीकरणीय संसाधनों का तेजी से दोहन उनके भण्डार को खत्म कर देगा ,जिससे मानव जीवन के लिये मुश्किल हो जायेगी।

कोयला ,पेट्रेालियम और धातुओं, खनिजों के भण्डारों का निर्माण में कई हजार साल लगते है और जिस तेजी से इंसान इन का दोहन कर रहा है ये एक न एक दिन समाप्त हो जायेंगे। वहीं दूसरी ओर कुछ नवीकरणीय संसाधन भी मनुष्य द्वारा इतनी तेजी प्रयोग में लाये जा रहे हैं कि उनका प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा पुनर्भरण उतनी तेजी से संभव नहीं और इस प्रकार वे भी अनवीकरणीय संसाधन की श्रेणी में आ जायेंगे।

प्रदूषण, पर्यावरण में किसी अवांछनीय पदार्थ के प्रवेश को कहते है। ये  पदार्थ  चाहे  किसी भी रूप में हो सकता है जिसमें ठोस, द्रव, गैस, आवंछनीय, ऊष्मा, अवांछनीय ध्वनि या रेडियोधर्मिता इत्यादि शामिल है ।

प्रदूषण का वर्गीकरण प्रदूषक के प्रकार, स्त्रोत अथवा परितंत्र के जिस हिस्से में उसका प्रवेश होता है ,के आधार पर किया जाता है । उदाहरण के तौर पर वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, इत्यादि प्रकार इस आधार पर निश्चित किये जाते हे। वहीं दूसरी ओर रेडियोधर्मी प्रदूषण, प्रकाश प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण इत्यादि प्रकार प्रदूषक के खुद के प्रकार पर आधारित है।

पर्यावरण प्रदूषण के कुछ दूरगामी दुष्प्रभाव हैं जो अत्याधिक घातक है ,जैसे आण्विक विस्फोटों से रेडियोधर्मिता का आनुवांशिक प्रभाव नागासीका और हिरोशिमा इसके उदाहरण है इसके अतिरिक्त, वायुमण्डल का तापमान बढना, ओजोन परत की हानि,  भूक्षरण इत्यादि ऐसे घातक दुष्प्रभाव है। प्रत्यक्ष दुष्प्रभाव के रूप में जलवायु, तथा परिवेश का दूषित होना एवं वनस्पतियों का विनष्ट होना, मानव का अनेक नये रोगों से आक्रान्त होना इत्यादि देखे जा रहे है।

अपने पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए हमें सबसे पहले अपनी मुख्य जरूरत जल को प्रदूषण से बचाना होगा। कारखानों का गंदा पानी, घरेलू गंदा पानी, नालियों में प्रवाहित मल, सीवर लाइन का गंदा पानी नदियों के जल को विषाक्त कर देता है, परिणामस्वरूप जलचरों के जीवन को संकट का सामना करना पडता है।

आज वायु प्रदूषण ने भी हमारे पर्यावरण को बहुत हानि पहुंचाई है। जल प्रदूषण के साथ ही वायु प्रदूषण भी मानव के सम्मुख एक चुनौती है। माना कि आज मानव विकास के मार्ग पर अग्रसर है परंतु वही बडे बडे कल कारखानों की चिमिनियों से लगातार उठने वाला धुंआ, रेल व नाना प्रकार के डीजल व पेट्रोल से चलने वाले वाहनें के पाइपों से और इंजनों से निकलने वाली गैसों तथा धुआं, जलाने वाला हाइकोक, एसी इन्वर्टर, जेनरेटर इत्यादि से कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन, सल्फयूरिक एसिड, नाइट्रिक एसिड प्रतिक्षण वायुमंडल में घुलते रहते है। वस्तुतः वायु प्रदूषण सर्वव्यापक हो चुका है।

जहां गांवों को विकसित करके नगरों से जोडा गया है। वहीं मोटर साइकिल व वाहनों की चिल्ल पों महानगरों के शोर को भी मुंह चिढती नजर आती है। औद्योगिक संस्थानों की मशीनों के कोलाहल ने ध्वनि प्रदूषण को जन्म दिया है। इससे मानव की श्रवण शक्ति क्षय हो रही है। ध्वनि प्रदूषण का मस्तिष्क पर भी घातक प्रभाव पड़ता है।

भारतीय संस्कृति में पर्यावरण को विशेष महत्तव दिया गया है। प्रचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में पर्यावरण के अनेक घटकों जैसे वृक्षों को पूज्य मानकर उन्हें पूजा जाता है। पीपल के वृक्ष को पवित्र माना जात है। जल ,वायु,अग्नि को भी देव मानकर उनकी पूजा की जाती है। ,गंगा,सिंधु ,यमुना ,गोदवारी ,नर्मदा जैसी नदियों को पवित्र मानकर उनकी पूजा की जाती है। इसलिए हमारा भी कर्तव्य है कि हम इनकी स्वच्छता प्रति जागरूक रहे नदियों में कपडे धोना ,कचरा फेंकना जैसे काम न करें।

कुल मिलाकर भारतीय सनातन चिति में पर्यावरण की चिंता को हर मनुष्य का दायित्तव बताया गया है ,अगर हम मूल सनातन संस्कृति की दृष्टि से पर्यावरण के प्रति जागरूक रहे तो मौसम चक्र में परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग से बचा जा सकता है।