थोड़ा सा श्रम, समय और पैसे बचने के चक्कर में हम स्वाद और पौष्टिकता गँवा रहे हैं. फिर भोजन में बचता क्या है....?

दिंनाक: 19 Jul 2018 15:33:25


भोपाल(विसंके). हाल ही में एक पुराने दोस्त ने अपने घर पर नया खाना खिलाने की दावत दी. नया अर्थात ऐसा भोजन, जो देसी व्यंजनों को नए वैश्विक अवतार में प्रस्तुत करने के प्रयास में विकसित हो रहा है. या यों कहिये किया जा रहा है. वहां जो कुछ परोसा गया, वह देखने लायक तो जरूर था, पर पेट भरना तो दूर चखने-चटखारे लेने तक के काम का नहीं था. अनायास बातचीत का सिलसिला इस और मुड़ गया कि हमारा पारंपरिक खानपान कितना बदल गया है. और इससे हमारी जिंदगी पर क्या असर पड़ रहा है.


 सबसे पहले यही बात खटकने वाली है कि अधिकांश भारतीयों ने रसोई में जमीन पर बैठकर खाना छोड़ दिया है. इसके साथ ही गरमागरम रोटियां हमारी जिंदगी से नदारद  हो गयीं हैं. थाली- कटोरी की जगह प्लेट ने ले ली है. कांटे - छुरी का संक्रमण भले ही हर जगह अभी नहीं हुआ है, पर चमचों का सामराज्य निरंतर फैलता जा रहा है. हमें यह सोचने की फुर्सत ही कहाँ है कि इस सब की वजह से हमने क्या कुछ गँवा दिया है. आलती-पालथी मरकर जमीन पर पटले- चौके चटाई या फर्श पर बैठकर हाथ से खाने का आनंद कई तर्कसंगत बातों पर आधारित था. रसोई वाले स्थान को शुद्ध रखने के हठ से खाने के प्रदुषण के आसार न्यूनतम रहते थे. गरमागरम सीधे तवे या पतीली हंडिया से थाली तक पहुंचा खाना भी संक्रामक कीटाणुओं की रोकथाम का पुख्ता प्रबंध करता था. बैठने का आसन- मुद्रा पाचन प्रक्रिया में सहायक होते थे. हाथ से खाने के पहले हाथ धोना लाजिमी था. और निवाला तोड़ के मुंह तक ले जाने से खाने के तापमान, उसके कुरकुरेपन सख्त या मुलायम स्वरुप का अनुमान हो सकता था. स्वाद का पूर्वाभास लुकमा जीभ तक पहुँचने के पहले ही होने लगता था. दूसरा दर्दनाक बदलाव मौसमी कुदरती खाने से विमुख होना है. मौजूदा पीढ़ी के लिए मिक्सी और फ्रिज ऐसे उपकरण हैं. जिनके बिना काम नहीं चल सकता. बचा खाना दोबार कम में लान, एक साथ दो तीन वक्त का बना लेना, बड़े पैमाने पर साग-सब्जी की खरीद, इनके पीछे तर्क कई हैं. किफ़ायत, समय और मेहनत की बचत, सुविधा. प्रेशर कुकर को ईंधन बचाने का असरदार माध्यम अवश्य कहा जा सकता है, पर क्या वास्तव में मिक्सी सिलबट्टे का विकल्प हैं. क्या यह सच नहीं की अधिकतर घरों में मसाले मिक्सी में नहीं पीसे जाते, पकैट बंद खरीदे जाते हैं. ब्रांड के ठप्पे को हम गुणवत्ता की गारंटी मान लेते हैं. जबकि सच यह है कि हल्दी , धनिया हो या जीरा-मिर्च, इनकी महक, जायका रंगत ताजा पीसे जाने पर आधारित है. इनके उड़नशील तेलों का जादू मशीनी पिसाई के बाद बचा नहीं रह सकता. अब तो हाल यह है कि परंपरा के पुजारी दक्षिण भारतीय सांबर मसाला के प्रेमी भी इसे मनपसंद ब्रांड के पैकेट में खरीदने लगे हैं. यही बाद इडली  दोसे के लिए पिसे खमीर चढ़े चावल, उड़द दाल के घोल पर लागू होती है. गरमाओं और खाओ वाले उत्पादों को ही स्वाद और गुणवत्ता की प्रमाणिक कसौटी माना जाने लगा है.

 घर पर बना आचार खाने को उन सभी को तरसना पड़ता है, जो इसका जायका और तासीर पहचानते हैं. चटनियाँ- हरा धनिया, पुदीने , अमिया की या सोंठ सरीखी अब दुर्लभ हो चुकी है, बस टमाटर का सदाबहार सॉस हर मौके पर रंग जमाता दिखलाई देता है. देसी मुरब्बे तो बहुत पहले मैदान छोड़ चुके हैं. शरबत- मिठाइयों के सन्दर्भ में तो यह बात बहुत पहले जगजाहिर हो चुकी थी. कि घर पर इन्हें बनाने और खिलाने पिलाने का हठ पालने दकियानूस और घनघोर जाहिल ही हैं. ठंडाई हो या आम का पना, खस, गुलाब का शरबत हो या और कोई परिचित शरबत, जब मुलाकात  होती है, तो कृत्रिम स्वाद, रंग और खुशबु के कारण मजा किरकिरा हो जाता है.

बेमौसमी सब्जियों और फलों के फायदे दिल बहलाने के लिए हैं. हकीकत यह है कि इनसे आदत ही खराब होती है. स्वाद का सत्यानाश ही होता है. मटर हो या टमाटर, फूलगोभी हो या मशरूम पनीर अथवा मकई कोल्ड स्टोर या आयत की खाद्य सामग्री हम ललचाकर खरीद लाते हैं. बारम्बार यह मोहभंग होने पर भी कि इनका मजा और तासीर मौसमी पैदावार जैसी नहीं होती है हम इस भ्रम के मारे हैं कि यह विकल्प सस्ता- सुलभ है. पर स्वाद और पौष्टिकता? हम लकीर के फ़कीर नहीं, पर स्वाद के मुरीदों से हमारी विनती है कि कुछ भी मुंह में डालने से पहले कुदरती बनाम कृत्रिम मौसमी और कोल्ड स्टोरेज या आयत के बारे में तनिक सोचें. जिस परंपरा के आप उत्तराधिकारी हैं, उस पर महज अहंकार से पहले उससे परिचय बढ़ाने का प्रयास करें. हमारे पारंपरिक खानपान की नींव देशकाल व्यक्ति के अनुसार जनविज्ञान पर आधारित है. उधर की आधुनिकता की घुसपैठ से उसे और अपनी सेहत को बर्बाद न करें.

साभार :- सेवा प्रेरणा

पुष्पेश पन्त (मधुरिमा से साभार)