प्रख्यात गीतकार, पद्मश्री और पद्म भूषण से सम्मानित कवि गोपालदास नीरज का निधन

दिंनाक: 20 Jul 2018 16:12:19


भोपाल(विसंके).  सांसों की डोर के आखिरी मोड़ तक बेहतहरीन नगमे लिखने के ख्वाहिशमंद मशहूर गीतकार और पद्मभूषण से सम्मानित कवि गोपालदास नीरज का गुरुवार शाम दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में निधन हो गया.

वह 93 वर्ष के थे. शाम 7:35 बजे पर उनका निधन हुआ. परिजनों ने बताया कि उन्हें बार-बार सीने में संक्रमण की शिकायत हो रही थी.

महफिलों और मंचों की शमां रोशन करने वाले नीरज को कभी शोहरत की हसरत नहीं रही. उनकी ख्वाहिश थी तो बस इतनी कि जब ज़िंदगी दामन छुड़ाए तो उनके लबों पर कोई नया नगमा हो, कोई नई कविता हो.

उनके पुत्र शशांक प्रभाकर ने बताया कि आगरा में प्रारंभिक उपचार के बाद उन्हें बीते मंगलवार को दिल्ली के एम्स में भर्ती कराया गया था लेकिन डॉक्टरों के अथक प्रयासों के बाद भी उन्हें नहीं बचाया जा सका.

उन्होंने बताया कि उनकी पार्थिव देह को पहले आगरा में लोगों के अंतिम दर्शनार्थ रखा जाएगा और उसके बाद पार्थिव देह को अलीगढ़ ले जाया जाएगा जहां उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा.

नीरज ने एक साक्षात्कार के दौरान कहा था, ‘अगर दुनिया से रुख़सती के वक़्त आपके गीत और कविताएं लोगों की ज़बान और दिल में हो तो यही आपकी सबसे बड़ी पहचान होगी. इसकी ख्वाहिश हर फनकार को होती है.’

उनकी बेहद लोकप्रिय रचनाओं में ‘कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे’ रही:

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से,
लुट गए सिंगार सभी बाग के बबूल से,

और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे.
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पांव जब तलक उठें कि ज़िंदगी फिसल गई

वे पहले शख्स हैं जिन्हें शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में भारत सरकार ने दो-दो बार सम्मानित किया. 1991 में पद्मश्री और 2007 में पद्मभूषण पुरस्कार प्रदान किया गया. 1994 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान ने ‘यश भारती पुरस्कार’ प्रदान किया. गोपाल दास नीरज को विश्व उर्दू पुरस्कार से भी नवाजा गया था.

उनके एक दर्जन से भी अधिक कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं.

उनकी प्रमुख कृतियों में ‘दर्द दिया है’ (1956), ‘आसावरी’ (1963), ‘मुक्तकी’ (1958), ‘कारवां गुज़र गया’ (1964), ‘लिख-लिख भेजत पाती’ (पत्र संकलन), पंत-कला, काव्य और दर्शन (आलोचना) शामिल हैं.

गोपाल दास नीरज के लिखे गीत बेहद लोकप्रिय रहे. हिन्दी फिल्मों में भी उनके गीतों ने खूब धूम मचायी. 1970 के दशक में लगातार तीन वर्षों तक उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार प्रदान किया गया. उनके पुरस्कृत गीत हैं, काल का पहिया घूमे रे भइया! (वर्ष 1970, फिल्म: चंदा और बिजली), बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं (वर्ष 1971, फिल्म: पहचान), ए भाई! ज़रा देख के चलो (वर्ष 1972, फिल्म: मेरा नाम जोकर).

अपने करिअर के शुरुआती दिनों में नीरज ने कुछ समय के लिए मेरठ कॉलेज, मेरठ में हिंदी प्रवक्ता के पद पर भी काम किया. कॉलेज प्रशासन द्वारा उन पर कक्षाएं न लेने व रोमांस करने के आरोप लगाए गए जिससे नाराज़ होकर नीरज ने स्वयं ही नौकरी से त्यागपत्र दे दिया.

उसके बाद वे अलीगढ़ के धर्म समाज कॉलेज में हिंदी विभाग के प्राध्यापक नियुक्त हुए. इस दौरान ही उन्होंने अलीगढ़ को अपना स्थायी ठिकाना बनाया. यहां मैरिस रोड जनकपुरी में आवास बनाकर रहने लगे.

कवि सम्मेलनों में बढ़ती नीरज की लोकप्रियता ने फिल्म जगत का ध्यान खींचा. उन्हें फिल्मी गीत लिखने के निमंत्रण मिले जिन्हें उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया. फिल्मों में लिखे उनके गीत बेहद लोकप्रिय हुए. इनमें ‘देखती ही रहो आज दर्पण न तुम, प्यार का यह मुहूरत निकल जाएगा’ शामिल है.

इसके बाद उन्होंने मुंबई को अपना ठिकाना बनाया और यहीं रहकर फिल्मों के लिए गीत लिखने लगे. उनके गीतों ने फिल्मों की कामयाबी में बड़ा योगदान दिया. कई फिल्मों में सफल गीत लिखने के बावजूद उनका जी बंबई से कुछ सालों में ही उचट गया. इसके बाद वे मायानगरी को अलविदा कह वापस अलीगढ़ आ गए.

साभार:- समय धारा