असम में जाति माटी भेटी की विजय - प्रवीण गुगनानी

दिंनाक: 31 Jul 2018 13:52:07


भोपाल(विसंके). प्लेटो के शिष्य व सिकंदर के गुरु अरस्तु ने कहा था – “राज्य से पृथक व्यक्ति का कोई अस्तित्व नहीं होता” यही एनआरसी का सार है. राजनीति में ऐसा तब ही संभव हो पाता है जब एक शुद्ध राजनैतिक संगठन के पीछे एक विशुद्ध वैचारिक व सांस्कृतिक संगठन खड़ा हुआ हो. राजनैतिक दल के रूप में प्रत्येक दल की प्राथमिकता अपने जनसमर्थन को बढ़ाने की ही रहती है. अतः कोई भी राजनैतिक दल बांग्लादेशी घुसपैठियों जैसे मुद्दों पर या तो उनके स्पष्ट समर्थन में आयेगा या अधिकतम उन्हें मौन देकर अपनी मतदान शक्ति को बढ़ाने का जुगाड़ करना ही पसंद करेगा. किंतु यदि किसी भी राजनैतिक दल की निर्णय प्रक्रिया में या उसके थिंक टैंक में आर एस एस जैसा घोर राष्ट्रवादी व चिंतन प्रधान संगठन सम्मिलित रहेगा तो वह राजनैतिक दल वैसा ही निर्णय करेगा जैसा कि भाजपा ने बांग्लादेशी घुसपैठियों के संदर्भ में किया है, फिर भले ही उसे  बड़ी संख्या में उन वोटर्स की नाराजगी क्यों न झेलनी पड़े. प्रमुखतः असम के साथ साथ कुछ अन्य पूर्वोत्तर के राज्यों सहित भारत के अन्य राज्यों में बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या पर भाजपा की सख्त रणनीति का यह देश निस्संदेह स्वागत ही करेगा.  नागरिकता के संदर्भ में और घुसपैठ के संदर्भ में स्वतंत्रता के बाद से अब तक पड़ोसी देशों ने भारत को अब तक एक लचर-पचर, अस्थिर व तदर्थ व तुष्टिकरण की नीति को अपनाते ही देखा है. हाल ही में रोहिंग्या और अब  बांग्लादेशी मामलें में केंद्र की नमो सरकार के सख्त, स्पष्ट व लक्ष्यबद्ध व्यवहार ने पड़ोसी देशों की नजरों में देश की छवि को स्पष्ट कर दिया है.

       असम में एनआरसी ने अपनी फाइनल लिस्ट जारी कर दी है. इसमें 40 लाख लोगों को भारतीय नागरिकता नहीं मिली है. वहीं 2.89 लाख लोगों को राज्य में भारतीय नगरिक माना गया है. असम में वैध नागरिकों की पहचान के लिए नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस (एनआरसी) ने यह दूसरा ड्राफ्ट जारी किया है. सबसे बड़ी बात यह कि देश एक स्पष्ट नीति व लक्ष्य के साथ, सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में, इस  विषय में एक बेहद सख्त, निष्पक्ष  व पारदर्शी कार्यवाही को 20 हजार सैन्यबलों व राज्य सरकार के हजारों कर्मचारियों की चौकस निगरानी में बड़ी ही पवित्रता के साथ क्रियान्वित होते देख पा रहा है. nrc ड्राफ्ट भी सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में ही तैयार किया गया है. हैरानी है कि विपक्ष ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर भी  भरपूर राजनीति करते दिखा. राज्य में 25 मार्च, 1971 के पूर्व से  निवासरत लोगों को इस सूची में सम्मिलित किया गया है. यद्दपि यह दुखद ही है कि- इतना सब होने के बाद भी यह आश्वासन दिया गया है कि जो लोग राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में दर्ज नहीं हैं उन्हें निर्वासित नहीं किया जाएगा, तथापि इन लोगों की विधिसम्मत पहचान हो जाने से देश में घुसपैठिया समस्या स्पष्ट भी होगी और भविष्य में निर्णायक होकर आगामी घुसपैठ को रोकने में सफल भी हो पाएगी यह विश्वास तो देश में जागृत हो ही गया है. 

           इस निर्णय को लागू करने हेतु जिला उपायुक्तों एवं पुलिस अधीक्षकों को कड़ी सतर्कता बरतने के लिए कहा गया है. सात जिलों - बारपेटा, दरांग, दीमा, हसाओ, सोनितपुर, करीमगंज, गोलाघाट और धुबरी - धारा 144 के तहत निषेधाज्ञा लगा दी गई है. असम एवं पड़ोसी राज्यों में सुरक्षा चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए केंद्र ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल की 220 कंपनियां असम में तैनात की गई हैं. असम में यह स्पष्ट है कि NRC सूची पर आधारित किसी मामले को विदेश न्यायाधिकरण को नहीं भेजा जाएगा व जिनके नाम इस रजिस्टर में नहीं होंगे उनके दावों की पर्याप्त जांच की जायेगी. यह स्पष्ट कहा गया है कि अगर वास्तविक नागरिकों के नाम दस्तावेज़ में मौजूद नहीं हों, तो वे घबराएं नहीं व विधिवत कानूनी प्रक्रिया को अपनायें, यह प्रक्रिया सितम्बर, 18 तक चलेगी.

            असम की भाजपा सरकार का यह निर्णय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 22  फरवरी, 2014 को असम के सिलचर की जनसभा में दिए गए वचन का क्रियान्वयन ही है. तब मोदी ने कहा था-         “अगर हमारी सरकार बनती है तो हम बांग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने के साथ ही घुसपैठियों को यहाँ से बाहर खदेड़ने का भी वादा करते हैं.” भाजपा ने असम में लोकसभा व वि धानसभा दोनों चुनावों में “जाति, माटी, भेटी” यानि जाति, जमीन और अस्तित्व की रक्षा करने के नाम पर वोट मांगे थे. इसके बाद 19 जुलाई 2016 को नमो सरकार के गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में ‘नागरिकता (संशोधन) विधेयक,2016’ पेश किया. यह विधेयक 1955 के ‘नागरिकता अधिनियम’ में बदलाव के लिए था.इस विधेयक में प्रावधान था कि अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पकिस्तान से आने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन,पारसी और ईसाई लोगों को”अवैध प्रवासी” नहीं माना जाएगा. इसका सीधा सा अर्थ ये था कि इसके जरिए बांग्लादेशी हिंदुओं को भारत की नागरिकता दी जानीथी.1971 के दौर में लगभग 10लाख बांग्लादेशी घुसपैठियेअसम में ही बस गए. 1971 के बाद भी बड़े पैमाने पर बांग्लादेशियों का असम में आना जारी रहा. बांग्लादेश के लोगों की बढ़ती जनसंख्या ने  असम के स्थानीय लोगों में भाषायी, सांस्कृतिक व सामाजिक असुरक्षा कीस्थितियां उत्पन्न कर दी. घुसपैठिये असम में नाना प्रकार से अशांति, अव्यवस्था, अपराध  व उत्पात  मचाने लगे. 1978 में असम के मांगलोडी लोकसभा क्षेत्र के उपचुनाव के दौरान चुनाव आयोग के ध्यान में आया कि इस चुनाव में वोटरों की संख्या में कई गुना वृद्धि हो गई है. चुनावी गणित व तुष्टिकरण की नीति के चलते सरकार  ने 1979 में बड़ी संख्या में अवैध बांग्लादेशियों को भारतीय नागरिक बना लिया. असम में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) और असम गण संग्राम परिषद के नेतृत्व में बांग्लादेशी घुसपैठियों पर  सरकारी नीति के विरोध में आन्दोलन हुआ और असम भड़क  गया. इन मुद्दों पर आसू व अगप को असम की जनता ने बहुत प्यार व समर्थन दिया. छात्र संगठन आसू ने असम आंदोलन के दौरान ही 18 जनवरी 1980 को केंद्र सरकार को एक NRC अपडेट करने हेतु ज्ञापन दिया. इस बड़े व हिंसक आन्दोलन की परिणति 1985 में“असम समझौते” के रूप में हुई. 1999 में वाजपेयी सरकार ने इस समझौते की समीक्षा की और 17 नवंबर 1999 को तय किया गया कि असम समझौते के तहत NRC को अपडेट किया जाना चाहिए. एक लंबे घटनाक्रम के बाद असम के वर्तमान मुख्यमंत्री  सर्वानंद सोनोवाल ने 2013 में बांग्लादेश के घुसपैठ के मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट मेंउठाया और न्यायालय ने NRC 1951 को अपडेट करनेका आदेश दिया जिसमें 25 मार्च,1971 से पहले बांग्लादेश से भारत में आने वाले लोगों को स्थानीय नागरिकमाने जाने की बात कही गईथी और उसके बाद के असममें पहुंचने वालों को बांग्लादेश वापस भेजने के आदेश दे दिए गए थे. भाजपाई मुख्यमंत्री सोनोवाल के द्वारा दायर याचिका पर   सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के बाद ही NRC की समीक्षा व अपडेशन का कार्य प्रारम्भ हुआ.

          आशा है कि अवैध पाए गाये घुसपैठिये प्रधानमंत्री मोदी के वचन के अनुसार शीघ्र ही देश से बाहर खदेड़ दिए जायेंगे और देश इस समस्या से मुक्ति पा सकेगा.