आज दिशाओं के बारे में बताना चाहूंगी कि, कौन सी दिशा कितनी महत्वपूर्ण है - अंशुल उपाध्याय

दिंनाक: 07 Jul 2018 16:23:57


भोपाल(विसंके). बातो ही बातों में एक दिन मैंने अपने पिता जी से पूछ लिया की सूर्य पूर्व से निकलता है। तो क्या पूर्व दिशा ही सबसे बड़ी है चारो दिशाओं में?? तब पिता जी ने जो कहा वह बताती हूँ। उन्होंने कहा नहीं पूर्व सबसे बड़ी नहीं है मैंने पूछा क्यों उन्होंने कहा ऊपर देखो आसमान में सप्तऋषि उगे है मैंने कहा हां, दिख तो रहे है। वो बोले सप्तऋषि किसका चक्कर लगाते है पता है? मैंने कहा नहीं। उन्होंने बताया सप्त ऋषि धुर्व तारे का चक्कर लगाते है।और धुर्व तारा उत्तर दिशा में उगता है।हमारे ग्रंथो का आधार सप्त ऋषि है। इसलिए धुर्व को और उनको उत्तर दिशा में स्थान मिला क्योंकि उत्तर दिशा को शिव जी का स्थान कहा जाता है।

अब बात आई पूर्व की पूर्व से सूर्य उगता है जो जीवन देता है ऊर्जा देता है। बिना गर्मी जीवन संभव नहीं।इसलिए वहाँ देवी देवताओं का स्थान मानते है कि देवो की पूजा के बहाने हम पूर्व की तरफ मुह करके बैठेंगे तो सूर्य की लालिमा किरणों से हमारे शरीर की बहोत सी व्याधियां दूर हो जाएंगी और हुमें सकारात्मक ऊर्जा भी मिलेगी इसी कारण  सुबह सुबह पूजा पाठ करने का नियम बनाया गया है। अब यदि बात करे पछिम दिशा की तो सूर्य पछिम में अस्त होता है इस हिसाब से पशिम का भी उतना ही महत्त्व है जितना पूर्व का है क्योंकि, दिन भर तेज़ देने के बाद जब सूर्य पछिम में समाँता है तो मस्तिष्क को ठंडक मिलती है और वातावरण को थोड़ी उमस जो की बारिश में सहायक है। इसलिए कुछ सम्प्रदाओं में पछिम की तरफ मुह करके प्रार्थना करने का विधान है। खासकर रेतीली जगहों में जहा बारिश कम होती है। अब बात दक्षिण दिशा की तो दक्षिण दिशा में हमारे पूर्वजो का निवास माना गया है। जिनसे हमको संस्कार मिले है। अब, अगर उत्तर में पर्वत अर्थात शिव है तो दक्षिण में पाताल अर्थात विष्णु का निवास है। जो पालनकर्ता है। अब बताओ बेटा की कौन सी दिशा ज्यादा महत्वपूर्ण है?? तब मेरी समझ में आया कि, सभी दिशाओं का अपना महत्त्व होता है। सभी एक दूसरे की पूरक है। सुबह उठ कर सूर्य को अर्क देना हो चाहे संध्या को दीपक जलाना। भगवान की पूजा करना हो या चाँद की पूजा सभी बातों का कोई न कोई  वैज्ञानिक कारण अवश्य है। हमारे ग्रंथो में जो लिखा है वह भी आदि काल में हुए ऋषि मुनियों के वैज्ञानिक ज्ञान का पर्याय ही था जिसे धीरे धीरे कुरीतियों ने घेर लिया। सुबह नहाना हो या गऊ की सेवा और दक्षिण दिशा में पैर न करना हो चाहे पूर्व की तरफ सर करके सोना सबकुछ उस चुम्बक की सुई भांति कार्य करता है जिसे किसी भी दिशा में रख दो तो उसका लाल हीस्सा केवल उत्तर दिखाता है। हमारा शरीर भी पञ्च तत्वों से मिलकर बना है इसलिए हमको भी सूर्य, चंद्र, विष्णु, शिव,और प्राण वायु अर्थात स्वास की आवश्यकता होती है। जीने के लिए हमारे मष्तिष्क में थोड़ी गर्मी, पाँव के तलवों में थोड़ी ठंडक, पेट में जल की पर्याप्तता और ह्रदय में आती जाती वायु में कभी रूकावट नहीं आनी चाहिए। तो शरीर सदा स्वस्थ रहेगा।। कुल मिलाकर सब दिशाएं महत्वपूर्ण है। किसी को बड़ा या छोटा नहीं कहा जा सकता।। एक की भी अवेल्हना करने पर दुःख अवश्य प्राप्त होता है और शरीर को कष्ट भी होता है।