प्रिय पाकिस्तान – विजय मनोहर तिवारी

दिंनाक: 16 Aug 2018 15:51:14


भोपाल(विसंके). 14 अगस्त को आजादी का जश्न मनाते हुए तुम्हें देखता हूं तो कई सवाल जेहन में उतर आते हैं। तुम यह जश्न क्यों मनाते हो? तुम किससे आजाद हुए? तुम थे कहां जो आजाद हुए? मनाना ही है तो अपना जन्मदिन मनाओ। उम्र के साल गिनो। आजादी के जश्न से लगता है कि किसी ने तुम्हें गुलाम बना रखा था। गुलाम तो जरूर बनाया था, अंग्रेजों ने। लेकिन तुम्हें नहीं। भारत को। आजादी की दस्तक के साथ पैदा हुए तुम। जानते हो तुम्हारी प्रसव पीड़ा से इस देश को कितने जख्म मिले?


 अपना सब कुछ गंवाकर आए उन हतभाग्य लोगों को भलीभांति याद है कि लाहौर की शाम कैसी गुजरा करती थी और कराची की गलियों में किस तरह बचपन बीता? वे हजारों लोग आज भी जीवित हैं, जिन्होंने विभाजन की भयानक पीड़ा झेली। उन्हें यह भुलाए नहीं भूलता कि एक दिन मजहब को सामने रखकर कैसे मुल्क के बटवारे की बात की गई। लगता है तुम सब भूल गए। तुम्हें यही याद नहीं कि तुम थे कब? अपनी पैदाइश को अपनी आजादी मानकर बैठे हो।

 कभी सोचो तुम्हारी कहलाने वाली जमीन में दफन क्या है? वहां कहीं भी मंदिर या स्तूपों के अवशेष ही मिलेंगे। सर जॉन मार्शल ने 1921 के आसपास सिंधु घाटी की खुदाई में दुनिया को क्या दिखाया? जब यहां मोहनजोदड़ो-हड़प्पा फलफूल रहे थे तब तो उस दीन का ही कोई अता-पता तक नहीं था, जिसकी बुनियाद पर तुम पैदा हुए। आंखें खोलकर देखो कराची, पेशावर, लाहौर और काबुल के म्युजियम में क्या रखा है?

 लाखों मुसलमान जो जिन्ना के बहकावे में सरहद पार गए उन्हें मुहाजिर कहकर दुत्कारा गया। कराची जाने वाले किसी से पूछो पाकिस्तानी हो? वे चहककर कहते कि नहीं वे दिल्ली वाले हैं, बनारसवाले हैं, लखनऊ वाले हैं। कभी सोचो मजहब की बुनियाद पर मुल्क बनाने से कौन सी बेहतरी हुई? क्या सुकून हासिल किया? कहां है वो इस्लाम की जन्नत जो पाकिस्तान के हसीन ख्वाब में दिखाई गई थी? सच तो यह है कि वे कभी न खत्म होने वाली नफरत की आग में झोंक दिए गए। अब वे उस जिन्ना को ढूंढने कहां जाएं…

 गरम रेत के रेगिस्तानों में हरा रंग सुकून देने वाला था। चांद-सितारे ठंडक देते थे। लेकिन भारत में न रेगिस्तान थे, न रेत। यहां सूरज सदियों से रोशनी और ताकत देता रहा। सूरज के उगने पर आसमान का रंग एक प्रतीक रहा, जिसे भगवा कहकर गालियां देते लोगों की बड़ी जमात है। कुदरत ने भरपूर हरियाली दी यहां। लेकिन मजहब के फैलाव में बाहरी प्रतीकों को बिना सोचे-समझे ओढ़ लिया गया…

 खलीफा मंसूर ने हिंदुस्तान से कई ज्योतिषियों और इल्म के जानकारों को बगदाद बुलाया था। भारत की कई पुरानी किताबों का तर्जुमा कराया। उसके बाद खलीफा हारूं रशीद ने भी गणित और आयुर्वेद के कई जानकार बुलाए। इस तरह भारत से गणित, ज्योतिष और इलाज की तालीम अरब पहुंची। एचजी वेल्स ने फरमाया है कि जब यूरोप में अशिक्षा का अंधकार छाया हुआ था तब अरब में ज्ञान का दीया रोशनी दे रहा था और अरबों ने इस इल्म को भारत से हासिल किया था। मगर इसकी एवज में अरब और यूरोप ने भारत को क्या दिया?

  क्रिकेटर इमरान खान ने अपनी किताब इंडस जर्नी में लिखा है कि मुलतान शहर में कभी एक शानदार सूर्य मंदिर हुआ करता था, जिसे औरंगजेब ने जमींदोज कर उसे मस्जिद की शक्ल दे दी थी। काश इमरान मियां इधर दिल्ली, अयोध्या, मथुरा, बनारस, विदिशा, अजमेर, धार, मांडू, उज्जैन और देवगिरि भी आए होते। सिंधु नदी को इमरान ने पाकिस्तान की रीढ़ कहा। प्यारे, कभी इस रीढ़ को टटोलकर तो देखो। यह तुम्हें अपनी असली बल्दियत से वाकिफ कराएगी।

 जवाहरलाल नेहरू ने डिस्कवरी ऑफ इंडिया में कश्मीर के बारे में बयान किया कि इस्लाम में धर्म परिवर्तन के लंबे समय तक चले प्रयासों के कारण 90 फीसदी जनता मुस्लिम हो गई है। हालांकि उन्होंने अपनी हिंदू परंपराओं को भी नहीं छोड़ा है। 19 वीं सदी के मध्य में काफी मुस्लिम अपनी अतीत की भूल को सुधारते हुए फिर से हिंदू होना भी चाहते थे। मगर काशी के पंडित रास्ते में रोड़ा बन गए। साेचो अगर यह घर वापसी कश्मीर से शुरू हो जाती तो फिर बूढ़े और बेदम हो चुके जिन्ना हो बटवारे की जहमत न करनी पड़ती। वह भी अपनी मूल पहचान में कब के लौट चुके होते।

 तहमीना दुर्रानी की किताब माय फ्युडल लॉर्ड उनके घर में पसरे नर्क की दास्तान है। अपने ही शौहर गुलाम मुस्तफा खार के बाप-दादों की पड़ताल की है।  खार तुम्हारे हिस्से के पंजाब के गवर्नर और मुख्यमंत्री रह चुके हैं। तहमीना ने बताया कि खार खानदान दरअसल भारत के हरियाणा के जाट थे, जिन्होंने बाद में इस्लाम कुबूल कर लिया। ऐसे लाखों नमूने हैं। जरा नामों पर गौर फरमाएं-मुमताज राठौड़, मोहम्मद राणा, नजम सेठी, हामिद भट्टी, जस्टिस अली चौहान, हमीदुल्ला भट्ट, अब्दुर्रहमान बिस्वास। ये राठौड़, राणा, चौहान, भट्ट, भट्टी, सेठी, पटेल, पवार, मेव, मोदी, शाह, मेमन, मलिक, नागौरी, सहगल और बिस्वास अरब या तुर्क में कहां पाए जाते हैं?

 अब आज के दौर में तो बुद्ध किसी कुछ नहीं बिगाड़ सकते। ढाई हजार साल से कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन का यह शहजादा जापान से श्रीलंका तक करोड़ों लोगों के दिलों पर राज कर रहा है। उसके निहत्थे और बेजान बुत भला क्या नुकसान कर सकते हैं। मगर तुम्हारे पैदा किए हुए तालिबानियों ने ही बामियान में उन्हें तोड़ गिराने में बम-बारूद का इस्तेमाल किया। बुद्ध भी तुम्हारी बेअक्ली पर हंसते ही होंगे! अफगानिस्तान की ही एक पीढ़ी ने उनके बुतों को बनाया और आगे की दिशाभ्रष्ट पीढ़ी ने अपने पुरखों के हाथों से बने बुद्ध को खाक में मिला दिया। इससे किसका क्या नुकसान हुआ, कभी सोचो।

 सब छोड़ो, कभी मोहम्मद रफी के गाए भजन सुनो। मजरूह सुलतानपुरी और शकील बदांयूनी की कलम से निकले हैं राम और कृष्ण के ये गुणगान। नौशाद साहब ने धुनों में ढाला है। जयपुर के अपने अहमद हुसैन-मोहम्मद हुसैन की गणेश वंदना सुनो। इनकी रूह में हिंदुस्तान धड़कता है। जरा बनारस के घाट पर बैठकर उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई तो सुनो। और ये अमीर खां, अल्लारक्खा खां, जाकिर हुसैन, अमजद अली खां, तलत महमूद, बेगम अख्तर…। महाराष्ट्र में खुलताबाद की बेनूर कब्र में सोए बादशाहे-हिंदुस्तान औरंगजेब ही बता सकते हैं कि इस्लाम में हराम इन गाने-बजाने वालों के साथ क्या सुलूक किया जाए?

अपने नाम का ही ख्याल करो-पाकिस्तान है न नाम तुम्हारा। तो अपने इरादों को पाक करो। नेक करो। यही पैगाम मजहब का भी है। तुम क्या कर रहे हो? कश्मीर में सत्तर साल से खून की नदियां बहाने में लगे हो। वह भी जिहाद के नाम पर। एक हिस्से पर जबरन अपना झंडा टिका रखा है जबकि तुम्हारा अपना भी तुम्हारे पास क्या है? अपनी अवाम को ही क्या दे पाए तुम?

 तो अब दिल से दिल मिलें। हाथ से हाथ मिलें। यही नई सदी का तकाजा है। ऐसा हो तो कसम ईमान की, दुनिया में हमारी बराबरी का आज भी कोई नहीं है। हम फिर बता सकते हैं कि भारत सोने की चिड़िया आज भी है। हम सिंधु सभ्यता के सच्चे साझे वारिस हैं। कयामत के दिन नेकी का हिसाब तुमसे भी पूछा जाएगा। नफरत के बीज नफरत और खून की फसलों तक ही ले गए हैं। इसमें किसी की भलाई नहीं है…

प्यारे पाकिस्तान कभी ठंडे दिमाग से सोचना और कुछ अच्छा ही करना! अल्लाह तुमको अक्ल अता फरमाए। लिखे का बुरा मत मानना। हमारे इरादे नेक हैं।

इतिहासकार झूठ बोल सकते हैं, इतिहास झूठ नहीं बोलता।