असम की 40 लाख आबादी को कौन देगा शरण ? - कृष्णमोहन झा

दिंनाक: 17 Aug 2018 15:02:25


भोपाल(विसंके). असम में अवैध रूप से रह रहे विदेशी घुसपैठियों का पता लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजन (एनआरसी) बनाने के निर्देश दिए थे तब कोर्ट की निगरानी में दो मसौदे तैयार किए गए। पहला मसौदा विगत वर्ष 31 दिसंबर को जारी किया गया था, जिसमे 1 करोड़ 90 लाख लोगो के नाम ही राज्य के वैद्य नागरिक के रूप में शामिल किए गए थे। तत्पश्चात दूसरा मसौदा अभी हाल ही में जारी किया गया है जिसमे अपना नाम शामिल कराने के लिए लगभग तीन करोड़ तीस लाख लोगो ने आवश्यक दस्तावेजों के साथ आवेदन किए थे। इनमे से 40 लाख लोगो का नाम उसमे शामिल नही किया गया है।


 

असम एनआरसी मुख्यालय में फाइनल मसौदा जारी करते हुए भारत के रजिस्ट्रार जनरल ने कहा कि यह केवल मसौदा है और अंतिम सूची बाद में घोषित की जाएगी। इस अंतिम मसौदे में जिनके नाम नहीं है ,उन्हें अपना दावा और आपत्ति पेश करने का एक और अवसर मिलेगा। मामले को लेकर संसद में भारी हंगामा हुआ। इस हंगामे के बीच गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने यह बताया कि यह एनआरसी का केवल फ़ाइनल ड्राफ्ट है। फ़ाइनल एनआरसी बाद में जारी की जाएगी। उन्होंने भरोसा दिलाया कि जिन लोगो के नाम रह गए है ,उन्हें  आवश्यक दस्तावेजों के साथ एक बार फिर आवेदन करने का मौका दिया जाएगा। 

 

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का कहना है कि उनकी पार्टी पर ये आरोप गलत लगाए जा रहे है कि वह एनआरसी का राजनीतिक लाभ ले रही है। 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ही घोषणा की थी कि देश की धरती पर एक भी घुसपैठिये को रहने नहीं दिया जाएगा। उसके बाद 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने ही इस बाबत एनआरसी तैयार करने हेतु समझौता किया था, परन्तु कांग्रेस की सरकारों ने राजनीतिक कारणों से इस दिशा में आगे बढ़ने का साहस नहीं किया। हमने साहस दिखाया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस इसे वोट के रूप में देखती है और भाजपा राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे के रूप में देख रही है। 

 

गौरतलब है कि एनआरसी को लेकर कांग्रेस एवं तृणमूल कांग्रेस ने मुखर विरोध किया है।तृणमूल सुप्रीमों ममता बनर्जी ने तो धमकी दी है कि एनआरसी की पहल दूसरे राज्यों में भी की गई तो देश में गृह युद्ध जैसे हालात हो जाएंगे। आश्चर्य की बात यह है कि जो ममता आज एनआरसी का विरोध कर रही है ,उन्होंने ही 2005 संप्रग की सरकार के कार्यकाल में इस मुद्दे को संसद में जोरशोर से उठाया था। ममता ने बंगाल में घुसपैठियों की बढ़ती संख्या को लेकर बयान देना चाहा था ,किन्तु अनुमति नहीं मिलने पर रोष में आकर पीठासीन अधिकारी की कुर्सी पर अपने हाथ के कागज उछाल दिए थे। तत्कालीन समय में वाम मोर्चा के सोमनाथ चटर्जी लोकसभा अध्यक्ष थे तथा बंगाल में वाम की ही सरकार थी, लेकिन वही ममता उन्हें आज शरणार्थी मान रही है। बंगाल में अब ममता का राज है और ये घुसपैठिए अब उनके वोटबैंक बन गए है। यहाँ यह विशेष उल्लेखनीय है कि असम से ज्यादा घुसपैठिए बंगाल में रह रहे है। इसे देखते हुए भाजपा ने बंगाल में भी एनआरसी लागू करने की घोषणा कर दी है, जिसके बाद से ही ममता मुखर हो गई है। 

 

असम में एनआरसी के मुद्दे पर तृणमूल के समान ही कांग्रेस ने भी यु टर्न ले ले लिया है। कांग्रेस पहले एनआरसी के फाइनल ड्राफ्ट का विरोध कर रही थी, अब उसका पक्ष ले रही है। कांग्रेस ने यह सोचकर अपना रुख बदला है कि जो काम उसने शुरू किया है उसका श्रेय कही भाजपा के खातें में न चला जाए। कांग्रेस को अब यह भी डर है कि भाजपा एनआरसी के बहाने हिन्दू वोटो के ध्रुवीकरण न कर ले। विपक्ष बार- बार यही आरोप लगा रहा है कि सरकार के निशाने पर केवल अल्पसंख्यक है। कांग्रेस द्वारा एनआरसी पर अपना रुख बदले जाने पर ममता अब अलग- थलग पड़ गई है। इधर कांग्रेस ने ममता को एनआरसी का सीधा विरोध करने से बचने की सलाह दी है। इसके बाद ही ममता की आक्रामकता में कमी आ गई है। 

 

एनआरसी का अंतिम मसौदा जारी होने के बाद यह सवाल पूछा जा रहा है कि असम में यह कवायद क्यों कि गई। देश मे बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा काफी समय से राजनीतिक रूप से रंगा है। असम ही नही देश के अन्य हिस्सों में भी ये घुसपेठिये रह रहे है। असम को छोड़कर बाकि राज्यों में 2011 की जनगणना के आधार पर नेशनल पापुलेशन रजिस्टर दो वर्ष पूर्व ही अपडेट किंग जा चुका है। सीमावर्ती राज्य होने कारण1947 से ही असम में तात्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के लोगो ने राज्य में आना शुरू कर दिया था। धीरे धीरे इनकी आबादी मूल असम निवासियों पर भारी पड़ने लगी। उन्हें कही न कही ये लगने लगा है कि उनके हक मारे जा रहे है। इसे देखते हुए असम गण परिषद ओर असम स्टूडेंट यूनियन नामक दो संगठनों ने इसके विरोध में आंदोलन चलाया। यह आंदोलन 1985 में  इतना लोकप्रिय हो गया कि इसकी गूंज दिल्ली तक सुनाई देने लगी। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को उनसे बातचीत की पहल करनी पड़ी। इस बातचीत में यह समझौता हुआ कि 1971 के बाद जो लोग बांग्लादेश से असम में घुस आए है ,उन्हें शरणार्थी नही अवैध माना जाए। इसका पता लगाने के लिए एनआरसी तैयार की जाएगी, जिसमे 1971 से पहले के दस्तावेज जिन लोगो के पास होंगे, उन्हें ही यहां रहने की इजाजद दी जाएगी।

एनआरसी का काम तेज गति से प्रारंभ तब हुआ जब असम में भाजपा की सरकार बनी। सुप्रीम कोर्ट को इसके लिए निर्देशित तक करना पड़ा। एनआरसी को तैयार करने में 1200 करोड़ रुपये खर्च किए गए। कांग्रेस का आरोप है कि इतनी भारी भरकम राशि खर्च करने के बाद भी इसमे कई खामियां रह गई है।इसमे उन लोगो के नाम भी छूट गए है जो 1971 से पहले से यहां रह रहे है। यह आरोप पूरी तरह गलत भी नही है। जिन लोगो के नाम इसमे नही है वे परेशान है एवं आंदोलित हो रहे है ,इसलिए असम में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए करीब 22 हजार अर्धसैनिको की तैनाती की गई है। कई जिलों में धारा 144 लागु की गयी है, ताकि लोग आंदोलित न हो सके। 

 

इतना तय कि एनआरसी की फाइनल रिपोर्ट तक पहुंचना आसान नहीं है। इसकी खामियों का निराकरण करना सरकार के लिए भी चुनौती है। 40 लाख लोगो में ऐसे लोगो के नाम भी शामिल है ,जो पीडियों से यहां रह रहे है।पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के परिजनों के नाम भी इस मसौदे में नहीं है जिनमे से एक परिजन भाजपा के टिकट पर चुनाव तक जीते चुके है। आश्चर्य कि बात यह कि प्रतिबंधित संगठन उल्फा का नाम तो इसमें शामिल है ,लेकिन सेना में सेवा दे चुके कुछ लोगो के नाम इसमें नहीं है। सरकार का कहना है कि जो इससे अभी बाहर है वह न भारतीय है न गैर भारतीय।  40 लाख लोगो में से सबसे घबराए तो वो लोग है ,जो बांग्लाभाषी मुसलमान है। इनमे ऐसे लोग भी शामिल है जिनके पूर्वज वर्षो पहले अन्य राज्यों से आकर असम में बस गए थे। ऐसे लोगो के सामने मूल राज्य से दस्तावेज लाना मुश्किल है। जिन लोगो के नाम सबूत देने के बाद भी अंतिम मसौदे में शामिल नहीं हुए वे ज्यादातर हिन्दी भाषी थे एवं उनके दस्तावेज उसी भाषा में थे। एनआरसी केंद्रों में उनका सत्यापन करने की जिम्मेदारी जिन लोगो को दी गई थी वे हिंदी पड़ने में ही असमर्थ थे। इसके साथ ही कही न कही रिश्वत मांगने की भी शिकायते सामने आई है। 

 

कुल मिलकर अभी यह कहना मुश्किल है कि एनआरसी की अंतिम सूची आने पर भी लोगो की शिकायते दूर हो जाएगी। सवाल पर सवाल उठ रहे है कि अंतिम सूची में और कितने लोगो को जगह मिल पाएगी। सबसे बड़ा सवाल यह है की जो लोग अवैध घोषित किए जाएंगे, उन्हें बाद में कहा भेजा जाएगा। सरकार कह चुकी है कि उन्हें देश में रहने की अनुमति नहीं मिलेगी वही बांग्लादेश की सरकार भी  कह चुकी है कि वह भी उन लोगो को शरण नही देगी। बांग्लादेश इसे भारत के आंतरिक मामलों के रूप में ही देखता है। वैसे भी 40 लाख लोगो की आपत्तियां एवं दानवे स्वीकार नहीं किए जा सकते है ,इसलिए यह मसला जटिल बना रहेगा तथा इस पर राजनीति में जमकर होती रहेगी।

 (लेखक राजनीतिक विश्लेषक और आईएफडब्ल्यूजे के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं)